परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है" | अंश 508

परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल शोधन का अनुभव करने के द्वारा ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है" | अंश 508

0 |16 सितम्बर, 2020

यदि लोग शैतान के प्रभाव में आ जाते हैं, तो उनके भीतर परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं रहता, और उनके पिछले दर्शन, प्रेम और संकल्प लुप्त हो जाते हैं। लोग महसूस किया करते थे कि उनसे परमेश्वर के लिए दुःख उठाना अपेक्षित है, परंतु आज वे ऐसा करना निंदनीय समझते हैं, और उनके पास शिकायतों की कोई कमी नहीं होती। यह शैतान का कार्य है; इस बात का संकेत कि मनुष्य शैतान के अधिकार-क्षेत्र में गिर चुका है। यदि तुम्हारे सामने यह स्थिति आ जाए, तो तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और जितनी जल्दी हो सके, उसे उलट देना चाहिए—यह तुम्हें शैतान के हमलों से बचाएगा। कड़वे शुद्धिकरण के दौरान मनुष्य बड़ी आसानी से शैतान के प्रभाव में आ सकता है, इसलिए ऐसे शुद्धिकरण के दौरान तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष रखते हुए और अपना अंतिम समय परमेश्वर को समर्पित करते हुए अपनी इच्छा जगानी चाहिए। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हारा शुद्धिकरण करे, तुम्हें परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने योग्य बनना चाहिए, और परमेश्वर को खोजने और उसके साथ समागम की कोशिश करने की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। ऐसे समय में जितने अधिक निष्क्रिय तुम होओगे, उतने ही अधिक नकारात्मक तुम बन जाओगे और तुम्हारे लिए पीछे हटना उतना ही अधिक आसान हो जाएगा। जब तुम्हारे लिए अपना कार्य करना आवश्यक होता है, चाहे तुम उसे अच्छी तरह से पूरा न करो, पर तुम वह सब करते हो जो तुम कर सकते हो, और तुम उसे पूरा करने में परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम से अधिक किसी चीज़ का प्रयोग नहीं करते; भले ही दूसरे कुछ भी कहें—चाहे वे यह कहें कि तुमने अच्छा किया है, या यह कि तुमने ख़राब किया है—तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम दंभी नहीं हो, क्योंकि तुम परमेश्वर की ओर से कार्य कर रहे हो। जब दूसरे तुम्हें गलत समझते हैं, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह कहने में सक्षम होते हो : "हे परमेश्वर! मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मुझे सहन करें या मुझसे अच्छा व्यवहार करें, न ही यह कि वे मुझे समझें और स्वीकार करें। मैं केवल यह माँगता हूँ कि मैं अपने हृदय से तुझसे प्रेम कर सकूँ, कि मैं अपने हृदय में शांत हो सकूँ, और कि मेरा अंत:करण शुद्ध हो। मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, या मेरा बहुत आदर करें; मैं केवल तुझे अपने हृदय से संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं वह सब करके, जो मैं कर सकता हूँ, अपनी भूमिका निभाता हूँ, और यद्यपि मैं मूढ़ और मूर्ख हूँ, और मुझमें क्षमता की कमी है और मैं अंधा हूँ, फिर भी मैं जानता हूँ कि तू मनोहर है, और मैं वह सब-कुछ तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ जो मेरे पास है।" जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम उमड़ पड़ता है, और तुम अपने हृदय में बहुत अधिक राहत महसूस करते हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। जब तुम इसका अनुभव करोगे, तो तुम दो बार असफल होगे और एक बार सफल होगे, या पाँच बार असफल होगे और दो बार सफल होगे, और जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तो केवल असफलता के बीच ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को देख पाओगे और खोज पाओगे कि तुममें क्या कमी है। जब तुम अगली बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करते हो, तो तुम्हें अपने आपको सावधान करना चाहिए, अपने क़दमों को संतुलित करना चाहिए, और अधिक बार प्रार्थना करनी चाहिए। धीरे-धीरे तुम ऐसी परिस्थितियों में विजय प्राप्त करने की योग्यता विकसित कर लोगे। जब ऐसा होता है, तो तुम्हारी प्रार्थनाएँ सफल होती हैं। जब तुम देखते हो कि तुम इस बार सफल रहे हो, तो तुम भीतर से आभारी रहोगे, और जब तुम प्रार्थना करोगे, तो तुम परमेश्वर को महसूस कर पाओगे, और यह भी कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति ने तुम्हें छोड़ा नहीं है—केवल तभी तुम जानोगे कि परमेश्वर तुम्हारे भीतर कैसे कार्य करता है। इस प्रकार से किया जाने वाला अभ्यास तुम्हें अनुभव करने का मार्ग प्रदान करेगा। यदि तुम सत्य को अभ्यास में नहीं लाओगे, तो तुम अपने भीतर पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित रहोगे। परंतु यदि तुम चीज़ों का, जैसी वे हैं, उसी रूप में सामना करते हुए सत्य को अभ्यास में लाते हो, तो भले ही तुम भीतर से आहत हो, फिर भी पवित्र आत्मा तुम्हारे साथ रहेगा, उसके बाद जब तुम प्रार्थना करोगे तो परमेश्वर की उपस्थिति महसूस कर पाओगे, तुममें परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने का सामर्थ्य होगा, और अपने भाइयों और बहनों के साथ समागम के दौरान तुम्हारे अंत:करण पर कोई बोझ नहीं होगा, और तुम शांति महसूस करोगे, और इस तरह से तुम वह प्रकाश में ला पाओगे, जो तुमने किया है। दूसरे चाहे कुछ भी कहें, तुम परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध रख पाओगे, तुम दूसरों द्वारा विवश नहीं किए जाओगे, तुम सब चीज़ों से ऊपर उठ जाओगे—और इसमें तुम दर्शा पाओगे कि तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कारगर रहा है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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