परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" | अंश 506

परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल पीड़ादायक परीक्षाओं का अनुभव करने के द्वारा ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो" | अंश 506

0 |25 सितम्बर, 2020

आज अधिकाँश लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि दुःख उठाने का कोई महत्व नहीं है, वे संसार के द्वारा त्यागे जाते हैं, उनके पारिवारिक जीवन में परेशानी होती है, वे परमेश्वर के प्रिय भी नहीं होते, और उनकी अपेक्षाएँ काफी निराशापूर्ण होती हैं। कुछ लोगों के कष्ट एक विशेष बिंदु तक पहुँच जाते हैं, और उनके विचार मृत्यु की ओर मुड़ जाते हैं। यह परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें बिलकुल धीरज नहीं होता, वे कमजोर और शक्तिहीन होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, मनुष्य के कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं, और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, मनुष्य के क्लेश उतने अधिक होते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो, तब हर प्रकार के कष्ट तुम पर आएँगे—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए अच्छा चलता रहेगा, और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिमय होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर सब कुछ दुर्गम है, और क्योंकि तुम्हारी क्षमता बहुत कम है, इसलिए तुम्हें शुद्ध किया जाएगा, इसके अलावा तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो और तुम हमेशा महसूस करोगे कि परमेश्वर की इच्छा बहुत अधिक बड़ी है, कि यह मनुष्य की पहुँच से बाहर है। इन सब बातों के कारण तुम्हें शुद्ध किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत निर्बलता है, और ऐसा बहुत कुछ है जो परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में असमर्थ है, इसलिए तुम्हें भीतर से शुद्ध किया जाएगा। फिर भी तुम्हें स्पष्टता से यह देखना आवश्यक है कि केवल शोधन के द्वारा ही शुद्धीकरण प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंतिम दिनों में, तुम्हें परमेश्वर के प्रति गवाही देनी है। इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारे कष्ट कितने बड़े हैं, तुम्हें अपने अंत की ओर बढ़ना है, अपनी अंतिम सांस तक भी तुम्हें परमेश्वर के प्रति विश्वासयोग्य बने रहना आवश्यक है, और परमेश्वर की कृपा पर रहना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही मजबूत और सामर्थी गवाही है। जब शैतान तुम्हारी परीक्षा लेता है तो तुम्हें यह कहना चाहिए: "मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले से ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुझे संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे अपना सर्वस्व परमेश्वर को संतुष्ट करने में लगाना आवश्यक है।" जितना अधिक तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, उतनी अधिक परमेश्वर तुम्हें आशीष देता है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारे प्रेम का सामर्थ्य भी उतना ही अधिक होगा; और इसके साथ-साथ तुममें विश्वास और दृढ़-निश्चय होगा, और तुम महसूस करोगे कि प्रेमी परमेश्वर के साथ बिताए जाने वाले जीवन से बढ़कर कीमती और महत्वपूर्ण और कुछ नहीं है। यह कहा जा सकता है कि अगर मनुष्य परमेश्वर से प्रेम करता है तो वो शोक से रहित होगा। यद्यपि ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारा शरीर निर्बल होता है, और कई वास्तविक परेशानियाँ तुम पर धावा बोलती हैं, इन समयों के दौरान तुम सचमुच परमेश्वर पर निर्भर रहोगे, और अपनी आत्मा में तुम राहत प्राप्त करोगे, और तुम निश्चितता का अनुभव करोगे, और तुम्हारे पास कुछ होगा जिस पर तुम निर्भर होगे। इस रीति से, तुम कई वातावरणों पर विजय प्राप्त कर पाओगे, और इसलिए तुम कष्टों को सहने के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे; तुम गीत गाना, नाचना, और प्रार्थना करना चाहोगे, तुम एकत्रित होना और संगति रखना, परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहोगे, और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर के सब लोग, विषय और बातें जो परमेश्वर के द्वारा निर्धारित की गई हैं वे सब उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हो, तो जिन बातों की ओर भी तुम देखते हो वे सब तुम्हारे लिए दुखदाई होंगी, कुछ भी तुम्हारी दृष्टि में सुहावना नहीं होगा; अपनी आत्मा में तुम आजाद नहीं बल्कि कुचले जाओगे, तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर के बारे में शिकायत करेगा, और तुम सदैव महसूस करोगे कि तुम बहुत अधिक यातना सहते हो, और कि यह बहुत अनुचित है। यदि तुम प्रसन्नता के लिए प्रयास नहीं करते, बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए और शैतान के द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए प्रयास करते हो, तो ऐसे प्रयास तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का बड़ा सामर्थ्य देंगे। मनुष्य वह सब पूरा कर सकता है जो परमेश्वर के द्वारा कहा गया है, और वह सब जो वह करता है वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के योग्य है—वास्तविकता से सम्पन्न होने का अर्थ यही है। परमेश्वर की संतुष्टि का अनुसरण करना, उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए परमेश्वर के प्रति प्रेम का इस्तेमाल करना है; समय की परवाह के बिना—तब भी जब दूसरे लोग बिना सामर्थ्य के हैं—तुम्हारे भीतर अभी भी एक ऐसा हृदय है जो परमेश्वर से प्रेम करता है, जो बड़ी गहराई से परमेश्वर की लालसा करता है, और परमेश्वर को याद करता है। यह वास्तविक क्षमता है। तुम्हारी क्षमता कितनी है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना बड़ा है, इस पर कि क्या तुम परीक्षा के समय स्थिर खड़े रह सकते हो, क्या तुम तब कमजोर पड़ जाते हो जब कोई ख़ास परिस्थिति तुम पर आ पड़ती है, और क्या तुम तब स्थिर रह सकते हो जब तुम्हारे भाई और बहन तुम्हें ठुकरा देते हैं; इन बातों का परिणाम तुम्हें दिखाएगा कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कैसा है। परमेश्वर के अधिकाँश कार्यों से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य से प्रेम करता है, बस मनुष्य की आत्मा की आँखों का पूरी तरह से खुलना अभी बाक़ी है, और वह परमेश्वर के अधिकाँश कार्य को, और परमेश्वर की इच्छा को, और उन बहुत से कार्यों को देखने में असमर्थ है जो परमेश्वर के विषय में मनोहर हैं; मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम बहुत कम है। तुमने इस सारे समय के दौरान परमेश्वर पर विश्वास किया है, और आज परमेश्वर ने बच निकलने के सारे मार्ग बंद कर दिए हैं। वास्तविकता में कहें तो, तुम्हारे पास सही मार्ग को लेने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है, उस सही मार्ग को जिसमें तुम्हारी अगुवाई परमेश्वर के कठोर न्याय और सर्वोच्च उद्धार के द्वारा की गई है। मुश्किलों और शोधन का अनुभव करने के बाद ही मनुष्य जान पाता है कि परमेश्वर मनोहर है। आज तक इसका अनुभव करने के बाद, यह कहा जा सकता है कि मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता के एक भाग को जान गया है—परंतु यह अभी भी पर्याप्त नहीं है, क्योंकि मनुष्य में बहुत सी कमियाँ हैं। उसे परमेश्वर के अद्भुत कार्यों का और अधिक अनुभव करना, और परमेश्वर द्वारा स्थापित कष्टों के शोधन का और अधिक अनुभव करना आवश्यक है। केवल तभी मनुष्य के जीवन की स्थिति बदल सकती है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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