परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" | अंश 495

25 सितम्बर, 2020

आज, जैसे तुम लोग परमेश्वर को जानने और प्रेम करने की कोशिश करते हो, एक प्रकार से तुम लोगों को कठिनाई और परिष्करण से होकर जाना होगा और दूसरे में, तुम लोगों को एक मूल्य चुकाना होगा। परमेश्वर को प्रेम करने के सबक से ज्यादा कुछ भी गहरा सबक नहीं है और ऐसा कहा जा सकता है कि सबक जो मनुष्य जीवन भर विश्वास करने से सीखते हैं वह परमेश्वर को किस प्रकार से प्रेम करना होता है। अर्थात् यदि तू परमेश्वर पर विश्वास करता है तो तुझे उसे प्रेम करना होगा। यदि तू केवल परमेश्वर पर विश्वास करता है परन्तु उससे प्रेम नहीं करता है, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी परमेश्वर को अपने हृदय से निकलने वाले सच्चे प्रेम से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तेरा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तू परमेश्वर से प्रेम नहीं करता है, तो तू व्यर्थ में ही जी रहा है, और तेरा सम्पूर्ण जीवन सभी जीवन से सबसे निम्न स्तर पर है। यदि, तूने अपने सम्पूर्ण जीवन भर में कभी भी परमेश्वर को प्रेम नहीं किया या संतुष्ट नहीं किया, तो तेरे जीने का क्या अर्थ रहा? और परमेश्वर पर तेरे विश्वास करने का क्या अर्थ हुआ? क्या यह प्रयासों की बर्बादी नहीं है? अर्थात् यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास करना है और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक कीमत अदा करनी होगी। किसी बाहरी तौर पर एक निश्चित तरीके से कार्य करने की कोशिश करने के बजाय, उन्हें अपने हृदय की गहराईयों में असली परिज्ञान की खोज करनी चाहिए। यदि तू गाने और नाचने के बारे में उत्साहित है, परन्तु सत्य को व्यवहार में लाने में अयोग्य है, तो क्या तेरे बारे में कहा जा सकता है कि तू परमेश्वर से प्रेम करता है? परमेश्वर को प्रेम करना उसकी इच्छा को सभी बातों में खोजना है, और तू अपने भीतर गहराई में खोज करता है जब भी तेरे साथ कुछ घटता है, परमेश्वर की इच्छा को समझने की कोशिश करते समय, और यह देखते समय कि इस मामले में परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह क्या चाहता है कि तू हासिल करे, और उसकी इच्छा के प्रति तुझे कितना ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के लिए, ऐसा कुछ होता है जब तुझे कठिनाई सहना है, उस समय तुझे समझना चाहिए कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, और तुझे उसकी इच्छा को किस प्रकार से ध्यान में रखना चाहिए। तुझे स्वयं को संतुष्ट नहीं करना है: तुझे सबसे पहले अपने आप को एक तरफ करना होगा। देह से अधिक अधम कुछ और नहीं है। तुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने की कोशिश करनी होगी और अपने कर्तव्य को पूर्ण करना होगा। इस प्रकार के विचारों के साथ, परमेश्वर इस मामले में तुझ पर अपनी विशेष प्रबुद्धता लाएगा और तेरा हृदय भी आराम प्राप्त करेगा। जब तेरे साथ कुछ घटता है, चाहे वो बड़ा या छोटा, सबसे पहले तुझे अपने आपको एक तरफ रखना होगा और सभी बातों में देह को सबसे निम्न समझना होगा। जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उतना ही अधिक यह सुविधाओं को चाहेगा; यदि तू इस समय इसे संतुष्ट करेगा, तो अगली बार यह तुझसे और अधिक की माँग करेगा और जैसे-जैसे यह बढ़ता जाएगा, तू देह को और भी अधिक प्रेम करने लगेगा। देह की हमेशा से ही असाधारण इच्छाएं रही हैं, और यह हमेशा संतुष्टि को मांगती है, और यह तुझे भीतर से प्रसन्न करता है, चाहे यह खाने की बात हो, पहनने की बात, अत्याधिक क्रोध करने की बात हो, या स्वयं की कमज़ोरी और आलस को बढ़ावा देने की बात हो... जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उसकी इच्छाएं उतनी ही अधिक बढ़ती जाएंगी, और उतनी ही अधिक वह भ्रष्ट बनती जाएगी, जब तक कि वह उस बिन्दु तक न पहुंच जाए जहां पर मनुष्य की देह और भी अधिक गहरी धारणाओं को पालती है, और परमेश्वर की आज्ञा का उल्लंघन करती है और स्वयं को ऊंचा उठाती है और परमेश्वर के कार्यों के प्रति संदेह करती है। जितना अधिक तू देह को संतुष्ट करेगा, उतनी ही अधिक देह की कमज़ोरियां बढ़ती जाएंगी; तू हमेशा महसूस करेगा कि कोई भी तेरी कमज़ोरियों के साथ सहानुभूति नहीं रखता है, तू हमेशा विश्वास करेगा कि परमेश्वर बहुत दूर जा चुका है, और तू कहेगा किः परमेश्वर कैसे इतना अधिक निष्ठुर हो सकता है? वह लोगों को एक मौका क्यों नहीं देना चाहता? जब लोग देह पर बहुत अधिक कृपालु होते हैं, इसका बहुत अधिक ध्यान रखते हैं, तो वे अपने आप को खो बैठते हैं। यदि तू वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करता है और देह को संतुष्ट नहीं करता है, तो तू देखेगा कि परमेश्वर जो कुछ करेगा वह बहुत सही और अच्छा होगा और तेरे विद्रोह के लिए उसका श्राप और तेरी अधार्मिकता पर उसका न्याय उचित ठहरेगा। ऐसे समय होंगे जब परमेश्वर तुझे ताड़ना देगा और अनुशासित करेगा, तुझे तैयार करने के लिए वातावरण बनाएगा, तुझे उसके सामने आने के लिए ज़ोर डालेगा—और तू हमेशा यह महसूस करेगा कि जो कुछ परमेश्वर कर रहा है वह अद्भुत है। इस प्रकार से तू ऐसा महसूस करेगा मानो कोई अत्याधिक पीड़ा नहीं है, और यह कि परमेश्वर बहुत ही प्यारा है। यदि तू देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देता है, और कहता है कि परमेश्वर बहुत दूर चला जाता है तो तू हमेशा ही पीड़ा का अनुभव करेगा और हमेशा ही उदास रहेगा और तू परमेश्वर के सभी कार्य के बारे में अस्पष्ट रहेगा और ऐसे दिखाई देगा कि परमेश्वर मनुष्यों की कमज़ोरियों में कोई सहानुभूति नहीं दिखा रहा है, और मनुष्यों की कठिनाईयों से अनजान है। इस प्रकार से तू दुखी और अकेला महसूस करेगा, मानो तूने अत्याधिक अन्याय सहा है, और इस समय तू शिकायत करना प्रारम्भ कर देगा। इस प्रकार जितना अधिक तू देह की कमज़ोरियों को बढ़ावा देगा, उतना ही अधिक तू महसूस करेगा कि परमेश्वर बहुत दूर चला जाता है, जब तक कि यह इतना भयानक न हो जाए कि तू परमेश्वर के कार्य को इन्कार करने लगे, और परमेश्वर का विरोध करने लगे और पूरी तरह से अनाज्ञाकारिता से भर जाए। इस प्रकार से, तुझे देह के विरोध में विद्रोह करना होगा, और इसको बढ़ावा नहीं देना होगा: तेरा पति, पत्नी, बच्चे, सम्भावनाएं, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता है! तुझे यह संकल्प लेना होगा: "मेरे हृदय में केवल परमेश्वर ही है और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना अथक प्रयास करना होगा और न कि देह को संतुष्ट करना होगा।" यदि तुझमें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तू सत्य को अभ्यास में लाएगा, और अपने आप को अलग कर देगा, तो तू ऐसा करना बहुत ही कम प्रयास के द्वारा कर पाएगा। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने सड़क पर एक सांप देखा जो बर्फ से जमी हुई लकड़ी जैसा था। उसे किसान ने उठाया और अपने सीने से लगा लिया, और सांप ने जीवित होने के पश्चात उसे डस लिया जिससे उस किसान की मृत्यु हो गयी। मनुष्य की देह भी सांप के समान है: इसका सार उनके जीवनों को हानि पहुंचाना है—और जब पूरी तरह से उसकी मनमानी चलने लगती है, तो तू जीवन पर अपना अधिकार खो बैठता है। देह शैतान का होता है। उसके भीतर असाधारण इच्छाएं होती हैं, यह केवल अपने ही बारे में सोचता है, यह आराम पसंद करता है और फुरसत में मज़ा लेता है, सुस्ती और आलस्य में धंसता चला जाता है और इसे एक निश्चित बिन्दु तक संतुष्ट करने के बाद तू अंततः इसके द्वारा खा लिया जाएगा। अर्थात् यदि तू इसे आज संतुष्ट करेगा, तो वह अगली बार तुझसे और अधिक की मांग करेगा। उसकी हमेशा असाधारण इच्छाएं और नई मांगें रहती हैं और तेरे देह को दिए गए बढ़ावे का फायदा उठाकर तुझसे यह और भी अधिक पोषित करवाएगा और इसके सुख में रहेगा—और यदि तू इस पर विजय प्राप्त नहीं करता है, तो तू अंततः स्वयं पर अधिकार खो देगा। तू परमेश्वर के सामने जीवन प्राप्त कर सकता है या नहीं, और तेरा अंतिम अंत क्या होगा, यह इस पर निर्भर करता है कि तू देह के प्रति अपना विद्रोह कैसे करता है। परमेश्वर ने तुझे बचाया है, और तुझे चुना है और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तू उसे संतुष्ट करने की इच्छा नहीं करता है, तो तू सत्य को अभ्यास में लाने के इच्छुक नहीं है, तुझमें अपनी देह के विरूद्ध एक ऐसे हृदय के साथ विद्रोह करने की इच्छा नहीं है जो सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता है, अंततः तू अपने आप को समाप्त कर देगा, और इस प्रकार से अत्याधिक कष्ट सहेगा। यदि तू हमेशा अपनी देह को बढ़ावा देता है, शैतान तुझे भीतर से धीरे-धीरे खा जाएगा, और तुझे बिना जीवन के, या बिना आत्मा के स्पर्श के छोड़ देगा, जब तक कि वह दिन न आ जाए जब तू अपने भीतर पूरी तरह से अंधकार से न भर जाए। जब तू अंधकार में रहेगा, तू शैतान के कब्ज़े में रहेगा, तेरे पास परमेश्वर नहीं होगा, और उस समय तू परमेश्वर के अस्तित्व को इंकार करेगा और उसे छोड़ देगा। इस प्रकार से, यदि तू परमेश्वर से प्रेम करने की इच्छा रखता है, तो तुझे पीड़ा का मूल्य चुकाना पड़ेगा और कठिनाई को सहना पड़ेगा। यहां पर बाहरी उत्सुकता और कठिनाईयों को सहने, अधिक पढ़ने और इधर-उधर और भागने की आवश्यकता नहीं है; इसके बजाय, तुझे अपने भीतर की चीज़ों को एक तरफ रखना होगा: असाधारण विचार, व्यक्तिगत हित और तेरे स्वयं के विचार, धारणाएं और प्रेरणाएँ। यही परमेश्वर की इच्छा है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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