परमेश्वर के दैनिक वचन | "जो परमेश्वर से सचमुच प्यार करते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं" | अंश 491

0 |15 सितम्बर, 2020

परमेश्वर के देह में होने के दौरान, जिस आज्ञाकारिता की वह लोगों से अपेक्षा करता है वह वह नहीं होती है जो लोग कल्पना करते हैं—आलोचना या विरोध नहीं करना। इसके बजाय, वह अपेक्षा करता है कि लोग उसके वचनों को जीवन के लिए अपना सिद्धांत और अपनी उत्तरजीविता की नींव बना लें, कि वे उसके वचनों के सार को पूरी तरह से अभ्यास में ले आएँ, और कि वे पूरी तरह से उसकी इच्छा को संतुष्ट करें। देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करने की लोगों से अपेक्षा करने का एक पहलू उसके वचनों को अभ्यास में लाने को संदर्भित करता है, और दूसरा पहलू उसकी सादगी और व्यावहारिकता का पालन करने में सक्षम होने को संदर्भित करता है। ये दोनों पूर्ण होने चाहिए। जो लोग इन दोनों पहलुओं को प्राप्त कर सकते हैं वे सभी ऐसे हैं जिनके पास परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम वाला हृदय है। ये सभी वे लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, और वे सभी परमेश्वर से उतना ही प्यार करते हैं जितना वे अपने स्वयं के जीवन से प्यार करते हैं। देहधारी परमेश्वर अपने कार्य में सामान्य और व्यावहारिक मानवता दिखाता है। इस तरह, उसका सामान्य और व्यावहारिक मानवता दोनों का बाह्य आवरण लोगों के लिए एक भारी परीक्षा बन जाता है; यह उनकी सबसे बड़ी कठिनाई बन जाता है। हालाँकि, परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से बचा नहीं जा सकता है। उसने समाधान खोजने के लिए हर चीज का प्रयास किया, लेकिन अंत में वह स्वयं को अपनी सामान्य मानवता के बाहरी आवरण से छुटकारा नहीं दिला सका, क्योंकि अंततः, वह परमेश्वर है जो देह बन गया है, न कि स्वर्ग में आत्मा का परमेश्वर। वह ऐसा परमेश्वर नहीं है जिसे लोग देख नहीं सकते हैं, बल्कि परमेश्वर ने सृष्टि में से एक का आवरण पहना है। इस में, अपने आप को अपनी सामान्य मानवता के आवरण से छुटकारा दिलाना किसी भी तरह से आसान नहीं होगा। इसलिए कुछ भी हो जाए, वह अभी भी उस कार्य को करता है जो वह शरीर के परिप्रेक्ष्य से करना चाहता है। यह कार्य सामान्य और व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, तो लोगों का पालन न करना कैसे ठीक हो सकता है? परमेश्वर के कार्यों के बारे में लोग आख़िर क्या कर सकते हैं? वह जो भी करना चाहता है वह करता है; जो कुछ भी जैसा है वह उससे खुश है। यदि लोग आज्ञापालन नहीं करते हैं, तो उनके पास और कौन सी ठोस योजनाएँ हो सकती हैं? अब तक, यह अभी भी आज्ञाकारिता है जो लोगों को बचा सकती है; कोई अन्य चतुर विचार नहीं हैं। यदि परमेश्वर लोगों की परीक्षा लेना चाहता है, तो वे इसके बारे में क्या कर सकते हैं? लेकिन यह सब स्वर्ग के परमेश्वर का विचार नहीं है; यह देहधारी परमेश्वर का विचार है। वह ऐसा करना चाहता है, तो कोई भी व्यक्ति इसे बदल नहीं सकता है। वह जो कुछ करता है, उसमें स्वर्ग का परमेश्वर हस्तक्षेप नहीं करता है, तो क्या लोगों को उसकी आज्ञा का और अधिक पालन नहीं करना चाहिए? यद्यपि वह व्यावहारिक और सामान्य दोनों है, किंतु वह पूरी तरह से देहधारण किया परमेश्वर है। उसके अपने स्वयं के विचारों के आधार पर, वह जो चाहता है वही करता है। स्वर्ग के परमेश्वर ने उसे सभी कार्य सौंप दिए हैं; वह जो भी करता है तुम्हें उसका पालन करना चाहिए। यद्यपि उसमें मानवता है और वह बहुत सामान्य है, यह सब वह है जो उसने जान-बूझकर व्यवस्थित किया है, तो लोग उसे कैसे अस्वीकृति के साथ पूरी आँखें खोल कर देख सकते हैं? वह सामान्य होना चाहता है, तो वह सामान्य है। वह मानवता के भीतर रहना चाहता है, तो वह मानवता के भीतर रहता है। वह दिव्यता के भीतर रहना चाहता है, तो वह दिव्यता में रहता है। लोग इसे जैसा चाहें वैसा देख सकते हैं। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा और लोग हमेशा लोग रहेंगे। कुछ मामूली विवरणों की वजह से उसके सार को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, न ही उसे एक छोटी सी चीज़ के कारण परमेश्वर के "व्यक्ति" के बाहर धकेला जा सकता है। लोगों के पास मानवजाति की आज़ादी है, और परमेश्वर के पास परमेश्वर की गरिमा है; ये एक दूसरे के साथ हस्तक्षेप नहीं करते हैं। क्या लोग परमेश्वर को थोड़ी सी भी स्वतंत्रता नहीं दे सकते हैं? क्या वे परमेश्वर का थोड़ा अधिक लापरवाह होना सहन नहीं कर सकते हैं? परमेश्वर के साथ इतना कठोर मत बनो! हर किसी में एक-दूसरे के लिए सहिष्णुता होनी चाहिए; तब क्या सब कुछ का समाधान नहीं हो जाएगा? क्या तब भी कोई मनमुटाव होगा? यदि कोई इतनी छोटी सी बात को बर्दाश्त नहीं कर सकता है, तो वह एक उदारचरित, एक सच्चा आदमी होने के बारे में कैसे सोच सकता है? यह परमेश्वर नहीं है जो मानवजाति को एक मुश्किल समय दे रहा है, बल्कि मानवजाति परमेश्वर को एक कठिन समय दे रही है। वे हमेशा राई का पहाड़ बनाकर चीजों को सँभालते हैं—वे वास्तव में शून्य में से कुछ चीजें बना लेते हैं, और यह बहुत अनावश्यक है! जब परमेश्वर सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर कार्य करता है, तो वह जो करता है वह मानवजाति का कार्य नहीं होता है, बल्कि परमेश्वर का कार्य होता है। तथापि, लोगों को उसके कार्य का सार दिखाई नहीं देता है—वे हमेशा उसके मानवता के बाहरी आवरण को देखते हैं। उन्होंने इतना बड़ा कार्य नहीं देखा है, लेकिन वे परमेश्वर की साधारण और सामान्य मानवता को देखने पर जोर देते हैं और वे छोड़ेंगे नहीं। इसे परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना कैसे कहा जा सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर अब पृथ्वी के "परमेश्वर" में बदल गया है, और पृथ्वी का परमेश्वर अब स्वर्ग में परमेश्वर है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता यदि उनके बाह्य रूप-रंग एक से हैं या उनका कार्य किस तरह का है। कुल मिलाकर, वह जो परमेश्वर का स्वयं का कार्य करता है वह स्वयं परमेश्वर है। तुम्हें आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए चाहे तुम करना चाहो या नहीं—यह कुछ ऐसा नहीं है जो तुम्हें चुनने के लिए मिलता है! लोगों द्वारा परमेश्वर की आज्ञा का पालन अवश्य किया जाना चाहिए, और लोगों को जरा सा भी ढोंग किए बिना परमेश्वर की आज्ञा का पूर्णतः पालन अवश्य करना चाहिए।

लोगों का समूह जिन्हें देहधारी परमेश्वर आज प्राप्त करना चाहता है वे लोग हैं जो उसकी इच्छा के अनुरूप हैं। लोगों को केवल उसके कार्य का पालन करने की, न कि हमेशा स्वर्ग के परमेश्वर के विचारों से स्वयं को चिंतित करने, अस्पष्टता के भीतर रहने, या देहधारी परमेश्वर के लिए चीजें मुश्किल बनाने की आवश्यकता है। जो लोग उसकी आज्ञा का पालन करने में सक्षम हैं, वे ऐसे लोग हैं जो पूर्णतः उसके वचनों को सुनते हैं और उसकी व्यवस्थाओं का पालन करते हैं। ये लोग इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते हैं कि स्वर्ग का परमेश्वर वास्तव में किस तरह का है या स्वर्ग का परमेश्वर वर्तमान में मानवजाति में किस प्रकार का कार्य कर रहा है, लेकिन पृथ्वी के परमात्मा को पूर्णतः अपना हृदय दे देते हैं और वे उसके सामने अपना समस्त अस्तित्व रख देते हैं। वे अपनी स्वयं की सुरक्षा का कभी विचार नहीं करते, और वे देहधारी परमेश्वर की सामान्य स्थिति और व्यावहारिकता पर कभी भी उपद्रव नहीं करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं वे उसके द्वारा पूर्ण बनाए जा सकते हैं। जो लोग स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करते हैं वे कुछ भी प्राप्त नहीं करेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह स्वर्ग का परमेश्वर नहीं, बल्कि पृथ्वी का परमेश्वर है जो लोगों को वादे और आशीषें प्रदान करता है। लोगों को स्वर्ग के परमेश्वर की ही हमेशा प्रशंसा नहीं करनी चाहिए और पृथ्वी के परमेश्वर को एक औसत व्यक्ति के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह अनुचित है। स्वर्ग का परमेश्वर आश्चर्यजनक बुद्धि के साथ महान और अद्भुत है, किंतु इसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। पृथ्वी का परमेश्वर बहुत ही औसत और नगण्य है; वह अति सामान्य भी है। उसका एक असाधारण मन या बहुत आश्चर्यचकित करने वाला कार्य नहीं है। वह सिर्फ एक बहुत ही सामान्य और व्यावहारिक तरीके से बोलता और कार्य करता है। यद्यपि वह गड़गड़ाहट के माध्यम से बात नहीं करता है या हवा और बारिश को नहीं बुलाता है, तब भी वह वास्तव में स्वर्ग के परमेश्वर का अवतरण है, और वह वास्तव में मनुष्यों के बीच रहने वाला परमेश्वर है। किसी ऐसे को देखने के समय जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते हैं और अधम के रूप में तो नितान्त कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, लोगों को उसका अतिशय वर्णन अवश्य नहीं करना चाहिए जिसे वह समझने में सक्षम हैं और जो परमेश्वर के रूप में उनकी अपनी कल्पनाओं के अनुरूप है। यह सब लोगों की विद्रोहशीलता है; यह परमेश्वर के प्रति मानवजाति के विरोध का समस्त स्रोत है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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