परमेश्वर के दैनिक वचन | अंश 487

09 सितम्बर, 2020

चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और उसके सभी कार्यों में विश्वास अवश्य रखना चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें आज्ञापालन अवश्य करना चाहिए। यदि तुम ऐसा करने में असमर्थ हो, तो यह मायने नहीं रखता है कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी कभी भी उसका आज्ञापालन नहीं किया है या उसके सभी वचनों को स्वीकार नहीं किया है, बल्कि उसके बजाए परमेश्वर से समर्पण करने को और तुम्हारी अवधारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सब से अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और तुम एक अविश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति कैसे परमेश्वर के कार्य और वचनों का पालन करने में समर्थ हो सकता है जो मनुष्य की अवधारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही मनुष्य वह है जो जानबूझकर परमेश्वर की अवहेलना करता है और उसका विरोध करता है। वह परमेश्वर का शत्रु है और मसीह विरोधी है। ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के नए कार्य के प्रति निरंतर शत्रुतापूर्ण रवैया रखता है, ऐसे व्यक्ति ने कभी भी समर्पण करने का जरा सा भी इरादा नहीं दिखाया है, और कभी भी खुशी से समर्पण नहीं दिखाया है और अपने आपको दीन नहीं बनाया है। वह दूसरों के सामने अपने आपको ऊँचा उठाता है और कभी भी किसी के प्रति भी समर्पण नहीं दिखाता है। परमेश्वर के सामने, वह स्वयं को वचन का उपदेश देने में सबसे ज़्यादा निपुण समझता है और दूसरों पर कार्य करने में अपने आपको सबसे अधिक कुशल समझता है। वह उस अनमोल ख़जाने को कभी नहीं छोड़ता है जो पहले से ही उसके अधिकार में है, बल्कि आराधना करने, दूसरों को उसके बारे में उपदेश देने के लिए, उन्हें अपने परिवार की विरासत मानता है, और उन मूर्खों को उपदेश देने के लिए उनका उपयोग करता है जो उसकी पूजा करते हैं। कलीसिया में वास्तव में कुछ संख्या में ऐसे लोग हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि वे "अदम्य नायक" हैं, जो पीढ़ी दर पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले हुए हैं। वे वचन (सिद्धांत) का उपदेश देना अपना सर्वोत्तम कर्तव्य समझते हैं। साल दर साल और पीढ़ी दर पीढ़ी वे अपने "पवित्र और अनुलंघनीय" कर्तव्य को जोशपूर्वक लागू करने की कोशिश करते रहते हैं। कोई उन्हें छूने का साहस नहीं करता है और एक भी व्यक्ति खुलकर उनकी निन्दा करने का साहस नहीं करता है। वे परमेश्वर के घर में "राजा" बन गए हैं, और युगों-युगों से दूसरों पर क्रूरता पूर्वक शासन करते हुए उच्छृंखल चल रहे हैं। दुष्टात्माओं का यह झुंड संगठित होकर काम करता है और मेरे कार्य का विध्वंस करने की कोशिश करता है; मैं इन जीवित दुष्ट आत्माओं को अपनी आँखों के सामने अस्तित्व में रहने की अनुमति कैसे दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा आज्ञापालन करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते हैं, तो ये आततायी जिनके हृदय में थोड़ी सी भी आज्ञाकारिता नहीं है कितना कम चल सकते हैं! परमेश्वर के कार्य को मनुष्य के द्वारा आसानी से ग्रहण नहीं किया जाता है। भले ही मनुष्य अपनी सारी ताक़त का इस्तेमाल करे, तो भी वह एक अंश मात्र ही प्राप्त करने और अंत में सिद्धता हासिल करने के योग्य हो पाएगा। तो प्रधानदूत की सन्तानों का क्या होगा जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगे रहते हैं? क्या उनकी परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाने की आशा और भी कम नहीं है? विजय का कार्य करने का मेरा उद्देश्य केवल विजय के वास्ते विजय प्राप्त करना नहीं है, बल्कि मैं धार्मिकता और अधार्मिकता को प्रकट करने, मनुष्य के दण्ड के लिए प्रमाण प्राप्त करने, और दुष्ट को दोषी ठहराने के लिए विजयी होता हूँ, और उससे भी बढ़कर, उन लोगों को सिद्ध बनाने के वास्ते विजयी होता हूँ जो स्वेच्छा से आज्ञापालन करते हैं। अंत में, सभी को प्रकार के अनुसार पृथक किया जाएगा, और वे सभी जिन्हें सिद्ध बनाया जाता है उन्होंने अपनी सोच और विचारों को आज्ञाकारिता से भरा हुआ है। यही वह कार्य है जो अंत में पूर्ण किया जाना है। किन्तु जो विद्रोही तरीकों से भरे हुए हैं उन्हें दण्डित किया जाएगा, आग में जलने के लिए भेज दिया जाएगा और वे अनन्त शाप की वस्तु बन जाएँगे। जब वह समय आएगा, तो बीते युगों के वे पहले के "महान और अदम्य नायक" सबसे नीच और परित्यक्त "कमज़ोर और नपुंसक कायर" बन जाएँगे। केवल यही परमेश्वर की धार्मिकता के हर पहलू की व्याख्या कर सकता है और उसके स्वभाव को प्रकट कर सकता है जो मनुष्य के किसी भी अपराध सहन नहीं करता है। केवल यही मेरे हृदय की नफ़रत को शांत कर सकता है। क्या तुम लोग सहमत नहीं हो कि यह सम्पूर्णतया उचित है।

जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं उन में से सभी जीवन को हासिल नहीं कर सकते हैं, और जो इस धारा में हैं उनमें से सभी लोग जीवन को हासिल नहीं कर सकते हैं। जीवन मानवजाति द्वारा साझा किया जाने वाला कोई मामूली गुणस्वभाव नहीं है, स्वभाव का रूपांतरण कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो सभी के द्वारा आसानी से प्राप्त की जाती है। परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण वास्तविक अवश्य होना चाहिए और अवश्य जीया जाना चाहिए। सतही तौर पर समर्पण करके परमेश्वर के अनुमोदन को प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और अपने स्वभाव में रूपान्तरण का प्रयास किए बिना परमेश्वर के वचन के मात्र सतही पहलू का पालन करके परमेश्वर के हृदय को प्रसन्न करने में समर्थ नहीं हुआ जा सकता है। परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण एक समान हैं। जो केवल परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं लेकिन उसके कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते हैं उन्हें आज्ञाकारी नहीं माना जा सकता है, और उन्हें तो बिल्कुल भी नहीं माना जा सकता है जो सचमुच में समर्पण नहीं करते हैं, और बाहरी तौर पर वे चापलूस हैं। जो सचमुच में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे सभी कार्य से लाभ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य की समझ प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। केवल ऐसे लोग ही वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। ऐसे लोग नए कार्य से नया ज्ञान प्राप्त करने और उससे नए परिवर्तनों का अनुभव करने में समर्थ होते हैं। केवल ऐसे मनुष्यों के पास ही परमेश्वर का अनुमोदन होता हैः केवल इस प्रकार का मनुष्य ही ऐसा है जिसे सिद्ध बनाया जाता है, एक ऐसा जो अपने स्वभाव में रूपान्तरण से गुज़र चुका है। जिन्हें परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त होता है ये वे लोग हैं जो खुशी से परमेश्वर के प्रति, और साथ ही उसके वचन और उसके कार्य के प्रति समर्पित होते हैं। केवल इस प्रकार का मनुष्य ही सही मार्ग में है; केवल इस प्रकार का मनुष्य ही ईमानदारी में परमेश्वर की कामना करता है और ईमानदारी से परमेश्वर की खोज करता है। जहाँ तक उनकी बात है जो परमेश्वर पर अपने विश्वास के बारे में मात्र अपने मुँह से बात करते हैं किन्तु वास्तविकता में उसे कोसते हैं, वे ऐसे मनुष्य हैं जिन्होंने स्वयं को मुखौटा पहना रखा है, जो साँपों का विष धारण करते हैं, वे सर्वाधिक विश्वासघाती मनुष्य हैं। कभी न कभी, ये दुर्जन अपने बुरे मुखौटों को चीर कर अलग करवाएँगे। क्या यह वही कार्य नहीं है जिसे आज किया जा रहा है? दुष्ट मनुष्य हमेशा दुष्ट बने रहेंगे और कभी भी दण्ड के दिन से बच कर नहीं निकलेंगे। अच्छे मनुष्य हमेशा अच्छे बने रहेंगे और तब प्रकट किए जाएँगे जब कार्य समाप्त हो जाएगा। दुष्टों में से किसी को भी धार्मिक नहीं समझा जाएगा, न ही धार्मिकों में से किसी को भी दुष्ट समझा जाएगा। क्या मैं किसी भी मनुष्य पर ग़लत तरीके से दोष लगने दूँगा?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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