परमेश्वर के दैनिक वचन | "सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" | अंश 478

13 अप्रैल, 2021

पतरस को व्यवहार एवं शुद्धीकरण के माध्यम से सिद्ध किया गया था। उसने कहा था, "मुझे हर समय परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करना होगा। वह सब जो मैं करता हूँ उसमें मैं केवल परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने का प्रयास करता हूँ, और चाहे मुझे ताड़ना मिले, या मेरा न्याय किया जाए, मैं अभी भी ऐसा करके प्रसन्न हूँ।" पतरस ने अपना सब कुछ परमेश्वर को दे दिया, एवं अपना काम, अपने वचन, और सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर के प्रेम के खातिर दे दिया। वह ऐसा व्यक्ति था जो पवित्रता की खोज करता था, और जितना अधिक उसने अनुभव किया, उसके हृदय की गहराई के भीतर परमेश्वर के लिए उसका प्रेम उतना ही महान था। इसी बीच पौलुस ने सिर्फ बाहरी कार्य किया था, और यद्यपि उसने कड़ी मेहनत भी की थी, फिर भी उसका परिश्रम उसके कार्य को उचित रीति से करने के लिए और इस प्रकार एक प्रतिफल पाने के लिए था। अगर वह जानता कि उसे कोई प्रतिफल नहीं मिलेगा, तो उसने अपने काम को छोड़ दिया होता। जिस चीज़ की पतरस परवाह करता था वह उसके हृदय के भीतर का सच्चा प्रेम था, और उस चीज़ की परवाह करता था जो व्यावहारिक था और जिसे हासिल किया जा सकता था। उसने इस बात की परवाह नहीं की कि उसे प्रतिफल मिलेगा या नहीं, किन्तु इस बात के विषय में परवाह की कि उसके स्वभाव को बदला जा सकता है या नहीं। पौलुस ने हमेशा और कड़ी मेहनत करने के विषय में परवाह की थी, उसने बाहरी कार्य एवं समर्पण, और उन सिद्धान्तों के विषय में परवाह की थी जिन्हें साधारण लोगों के द्वारा अनुभव नहीं जा सकता था। वह अपने भीतर बदलावों और परमेश्वर के सच्चे प्रेम की परवाह नहीं करता था। पतरस के अनुभव सच्चे प्रेम एवं सच्चे ज्ञान को हासिल करने के लिए थे। उसके अनुभव परमेश्वर से एक करीबी सम्बन्ध को पाने के लिए थे, और एक व्यावहारिक जीवन को जीने के लिए था। पौलुस का कार्य यीशु के द्वारा सौंपे गए उस कार्य के कारण था, और उन चीज़ों को प्राप्त करने के लिए था जिनकी वह लालसा करता था, फिर भी ये चीज़ें स्वयं एवं परमेश्वर के विषय में उसके ज्ञान से सम्बन्धित नहीं थीं। उसका कार्य मात्र ताड़ना एवं न्याय से बचने के लिए था। जिस चीज़ की पतरस ने खोज की थी वह शुद्ध प्रेम था, और जिस चीज़ की पौलुस ने खोज की थी वह धार्मिकता का मुकुट था। पतरस ने पवित्र आत्मा के कार्य के कई वर्षों का अनुभव किया था, और उसके पास मसीह का एक व्यावहारिक ज्ञान, साथ ही साथ स्वयं का गंभीर ज्ञान था। और इस प्रकार, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम शुद्ध था। कई वर्षों के शुद्धीकरण ने यीशु एवं जीवन के विषय में उसके ज्ञान को उन्नत किया था, और उसका प्रेम शर्तरहित प्रेम था, और यह स्वतः ही उमड़ने वाला प्रेम था, और उसने बदले में कुछ नहीं मांगा था, न ही उसने किसी लाभ की आशा की थी। पौलुस ने कई वर्षों तक काम किया था, फिर भी उसने मसीह के महान ज्ञान को धारण नहीं किया था, और स्वयं के विषय में उसका ज्ञान भी दयनीय रूप से थोड़ा सा था। उसके पास मसीह के लिए कोई प्रेम ही नहीं था, और उसका कार्य और वह पथक्रम जिस पर वह दौड़ता था वह अंतिम कीर्ति पाने के लिए था। जिस चीज़ की उसने खोज की थी वह अति उत्तम मुकुट था, विशुद्ध प्रेम नहीं। उसने सक्रिय रूप से खोज नहीं की थी, परन्तु निष्क्रिय रूप से ऐसा किया था; वह अपने कर्तव्य को नहीं निभा रहा था, परन्तु पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा कब्ज़ा किए जाने के पश्चात् उसे अपने अनुसरण में बाध्य किया गया था। और इस प्रकार, उसका अनुसरण यह साबित नहीं करता है कि वह परमेश्वर का एक योग्य प्राणी था; वह पतरस था जो परमेश्वर का एक योग्य प्राणी था जिसने अपने कर्तव्य को निभाया था। मनुष्य सोचता है कि वे सभी जो परमेश्वर के प्रति कोई योगदान देते हैं उन्हें प्रतिफल प्राप्त करना चाहिए, और यह कि योगदान जितना अधिक होगा, उतना ही अधिक यह मान लिया जाता है कि उन्हें परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त होना चाहिए। मनुष्य के दृष्टिकोण का सारलेनदेन संबंधी है, और वह परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में सक्रियता से अपने दायित्व के निर्वहन का प्रयास नहीं करता है। परमेश्वर के लिए, जितना अधिक लोग परमेश्वर के प्रेम और परमेश्वर के प्रति सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की खोज करते हैं, जिसका अर्थ यह भी है कि परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाना, उतना ही अधिक वे परमेश्वर की स्वीकृति को पाने के योग्य होते हैं। परमेश्वर का दृष्टिकोण यह मांग करता है कि मनुष्य अपने मूल कर्तव्य एवं हैसियत को पुनः प्राप्त करे। मनुष्य परमेश्वर का एक प्राणी है, और इस प्रकार परमेश्वर से कोई मांग करने के द्वारा मनुष्य को स्वयं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए, और परमेश्वर के एक प्राणी के रूप में अपने कर्तव्य को निभाने से अधिक और कुछ नहीं करना चाहिए। पतरस एवं पौलुस परमेश्वर के प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्य को निभा सकते हैं या नहीं इसके अनुसार उनकी नियति को मापा गया था, और उनके योगदान के आकार के अनुसार नहीं; जो कुछ उन्होंने शुरुआत से खोजा था उसके अनुसार उनकी नियति को निर्धारित किया गया था, इसके अनुसार नहीं कि उन्होंने कितना अधिक कार्य किया था, या उनके विषय में अन्य लोगों के आंकलन के अनुसार नहीं। और इस प्रकार, परमेश्वर के एक प्राणी के रुप में अपने कर्तव्य को सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के सच्चे प्रेम के पथ को खोजना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों, और परमेश्वर के शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता के लिए ऐसा पथ ही मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का पथ है साथ ही साथ परमेश्वर के किसी प्राणी का मूल रूप भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और साथ ही यह शुरूआत से लेकर समाप्ति तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण (खोज) व्यक्गित फिज़ूल मांगों एवं तर्कहीन लालसाओं से कलंकित हो जाता है, तो वह प्रभाव जिसे हासिल किया जाता है वह मनुष्य के स्वभाव में हुए परिवर्तन नहीं होंगे। यह पुनः प्राप्ति के कार्य से विपरीत है। यह निःसन्देह पवित्र आत्मा के द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इस प्रकार यह साबित करता है कि इस प्रकार के अनुसरण को परमेश्वर के द्वारा स्वीकृति नहीं दी जाती है। ऐसे अनुसरण का क्या महत्व है जिसे परमेश्वर के द्वारा स्वीकृति नहीं दी जाती है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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