परमेश्वर के दैनिक वचन | "आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना" | अंश 425

परमेश्वर के दैनिक वचन | "आज्ञाओं का पालन करना और सत्य का अभ्यास करना" | अंश 425

325 |19 सितम्बर, 2020

व्यवहार में, आज्ञाओं के पालन को सत्य को अभ्यास में डालने से जोड़ा जाना चाहिए। आज्ञाओं का पालन करते हुए, एक व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करना ही चाहिए। सत्य का अभ्यास करते समय, व्यक्ति को आज्ञाओं के सिद्धान्तों का उल्लंघन बिलकुल नहीं करना चाहिए न ही आज्ञाओं के विपरीत जाना चाहिए; परमेश्वर तुमसे जो भी अपेक्षा करे, तुम्हें वो सब करना ही चाहिए। आज्ञाओं का पालन और सत्य का अभ्यास करना परस्पर संबद्ध हैं, विरोधी नहीं। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करते हो, उतना ही अधिक तुम आज्ञाओं के सार को बनाए रखने में सक्षम हो जाते हो। तुम जितना अधिक सत्य का अभ्यास करोगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के वचनों को समझोगे जैसा कि आज्ञाओं में अभिव्यक्त है। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना, परस्पर विरोधी कार्य नहीं हैं, वे परस्पर संबद्ध हैं। आरंभ में, आज्ञाओं का पालन करने के बाद ही इंसान सत्य का अभ्यास कर सकता था और पवित्र आत्मा से ज्ञान प्राप्त कर सकता था, किन्तु यह परमेश्वर का मूल इरादा नहीं है। परमेश्वर बस अच्छा व्यवहार ही नहीं चाहता, वो अपेक्षा करता है कि तुम अपना हृदय परमेश्वर की आराधना करने में लगा दो। तुम्हें कम से कम सतही तौर पर ही सही, आज्ञाओं का पालन अवश्य करना चाहिए। धीरे-धीरे, अनुभव से, परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त करने के बाद, लोग उसके विरुद्ध विद्रोह करना और उसका प्रतिरोध करना बंद कर देंगे, और फिर उसके कार्य के विषय में अपने मन में संदेह रखना बंद कर देंगे। यही एक तरीका है जिससे लोग आज्ञाओं के सार का पालन कर सकते हैं। इसलिए, सत्य के अभ्यास के बिना, मात्र आज्ञाओं का पालन करना प्रभावहीन है और इसे परमेश्वर की सच्ची आराधना नहीं कहा जा सकता, क्योंकि तुमने अभी तक वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त नहीं किया है। सत्य के बिना आज्ञाओं का पालन करना केवल सख्ती से नियमों से चिपके रहने के बराबर है। ऐसा करने से, आज्ञाएँ तुम्हारी व्यवस्था बन जाएँगी, जो तुम्हें जीवन में आगे बढ़ने में मदद नहीं करेगा। बल्कि, वे तुम्हारा बोझ बन जाएँगी, और तुम्हें पुराने नियमों की व्यवस्थाओं की तरह मजबूती से बाँध लेंगी, जिससे तुम पवित्र आत्मा की उपस्थिति गँवा दोगे। इसलिए, सत्य का अभ्यास करके ही तुम प्रभावशाली तरीके से आज्ञाओं का पालन कर सकते हो और तुम आज्ञाओं का पालन इसलिए करते हो कि सत्य का अभ्यास कर सको। आज्ञाओं का पालन करने की प्रक्रिया में तुम और भी अधिक सत्य को अभ्यास में लाओगे, और सत्य का अभ्यास करते समय, तुम आज्ञाओं के वास्तविक अर्थ की गहरी समझ हासिल करोगे। मनुष्य आज्ञाओं का पालन करे, परमेश्वर की इस माँग के पीछे का उद्देश्य और अर्थ उससे बस नियमों का पालन करवाना नहीं है, जैसा कि इंसान सोचता है; बल्कि इसका सरोकार उसके जीवन प्रवेश से है। जीवन में तुम्हारे विकास की सीमा से तय होता है कि तुम किस स्तर तक आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हो। यद्यपि आज्ञाएँ मनुष्य द्वारा पालन किए जाने के लिए होती हैं, फिर भी आज्ञाओं का सार सिर्फ मनुष्य के जीवन के अनुभव से ही प्रकट होता है। अधिकांश लोग मान लेते हैं कि आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करने का अर्थ है कि वे "पूरी तरह तैयार हैं, बस अब उठाया जाना बाकी है।" यह निरंकुश विचार है और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप नहीं है। ऐसी बातें कहने वाले लोग आगे नहीं बढ़ना चाहते, वे देह की लालसा रखते हैं। यह बकवास है! इसका वास्तविकता के साथ तालमेल नहीं है! वास्तव में आज्ञाओं का पालन किये बिना मात्र सत्य का अभ्यास करना, परमेश्वर की इच्छा नहीं है। ऐसा करने वाले अपाहिज होते हैं; वे किसी लंगड़े व्यक्ति के समान होते हैं। नियमों का पालन करने की तरह बस आज्ञाओं का पालन करना, फिर भी सत्य का न होना—यह भी परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करने में सक्षम नहीं है; उन लोगों के समान ऐसा करने वाले भी एक प्रकार की अपंगता के शिकार हैं उसी तरह जैसे वे लोग जिनकी एक आँख नहीं है। यह कहा जा सकता है कि यदि तुम आज्ञाओं का अच्छी तरह से पालन करते हो और व्यवहारिक परमेश्वर की स्पष्ट समझ प्राप्त कर लेते हो, तो तुम्हारे पास सत्य होगा; तुलनात्मक रूप से, तुमने वास्तविक आध्यात्मिक कद प्राप्त कर लिया होगा। यदि तुम उस सत्य का अभ्यास करते हो, जिसका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए, तो तुम आज्ञाओं का पालन भी करोगे, ये दोनों बातें एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। सत्य का अभ्यास करना और आज्ञाओं का पालन करना दो पद्धतियाँ हैं, दोनों ही व्यक्ति के जीवन के अनुभव का अभिन्न अंग हैं। व्यक्ति के अनुभव में आज्ञाओं का पालन और सत्य के अभ्यास का एकीकरण सम्मिलित होना चाहिए, विभाजन नहीं। हालाँकि इन दोनों चीज़ों के बीच में विभिन्नताएँ और संबंध दोनों हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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