परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" | अंश 410

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध कैसा है?" | अंश 410

0 |17 सितम्बर, 2020

परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए तुम्हारे इरादों और विचारों का सही होना आवश्यक है; तुम्हें परमेश्वर के वचनों, परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित समस्त वातावरण, वह व्यक्ति जिसके लिए परमेश्वर गवाही देता है, और व्यावहारिक परमेश्वर की सही समझ और उनके प्रति व्यवहार का सही तरीका होना आवश्यक है। तुम्हें अपने विचारों के अनुसार अभ्यास नहीं करना चाहिए, और न ही अपनी क्षुद्र योजनाएँ बनानी चाहिए। तुम जो कुछ भी करो, तुम्हें सत्य को खोजने, और एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी स्थिति में परमेश्वर के सब कार्यों के प्रति समर्पित रहने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किए जाने का अनुसरण करना और जीवन के सही मार्ग में प्रवेश करना चाहते हो, तो तुम्हारा हृदय सदैव परमेश्वर की उपस्थिति में रहना आवश्यक है। हठी मत बनो, शैतान का अनुसरण मत करो, शैतान को अपना काम करने का कोई अवसर मत दो, और शैतान को अपना इस्तेमाल मत करने दो। तुम्हें स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर को सौंप देना चाहिए और परमेश्वर को अपने ऊपर शासन करने देना चाहिए।

क्या तुम शैतान के सेवक बनना चाहते हो? क्या तुम शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास और उसका अनुसरण इसलिए करते हो ताकि तुम उसके द्वारा पूर्ण किए जा सको, या इसलिए कि तुम उसके कार्य की विषमता बन सको? तुम एक अर्थपूर्ण जीवन जीना पसंद करोगे, जिसमें तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सको, या एक निरर्थक और खाली जीवन? तुम परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किया जाना पसंद करोगे, या शैतान द्वारा अपना शोषण करवाना? तुम परमेश्वर के वचनों और सत्य से भरे जाना पसंद करोगे, या फिर पाप या शैतान से भरे जाना? इन बातों पर ध्यान से विचार करो। अपने दैनिक जीवन में तुम्हें यह समझना आवश्यक है कि तुम्हारे द्वारा कहे जाने वाले कौन-से शब्द और तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कौन-से कार्य परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रहने देंगे, और फिर सही तरीका अपनाने के लिए स्वयं को सुधारो। हर वक्त अपने शब्दों, अपने कार्यों, अपने हर कदम और अपने समस्त विचारों और भावों की जाँच करो। अपनी वास्तविक स्थिति की सही समझ हासिल करो और पवित्र आत्मा के कार्य के तरीके में प्रवेश करो। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का यही एकमात्र तरीका है। इसका आकलन करके कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तुम अपने इरादों को सुधार पाओगे, मनुष्य की प्रकृति और सार को समझ पाओगे, और स्वयं को वास्तव में समझ पाओगे, और ऐसा करने पर तुम वास्तविक अनुभवों में प्रवेश कर पाओगे, स्वयं को सही रूप में त्याग पाओगे, और इरादे के साथ समर्पण कर पाओगे। जब तुम इस बात से संबंधित इन मामलों के तथ्य का अनुभव करते हो कि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य है या नहीं, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के अवसर प्राप्त करोगे और पवित्र आत्मा के कार्य की कई स्थितियों को समझने में सक्षम होगे। तुम शैतान की कई चालों को भी देख पाओगे और उसके षड्यंत्रों को समझ पाओगे। केवल यही मार्ग परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की ओर ले जाता है। परमेश्वर के साथ अपना संबंध सही करके तुम अपने आपको परमेश्वर के सभी प्रबंधनों के प्रति उनकी पूर्णता में समर्पित कर सकते हो, और वास्तविक अनुभवों में और भी गहराई से प्रवेश कर सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य और अधिक प्राप्त कर सकते हो। जब तुम परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध रखने का अभ्यास करते हो, तो अधिकांश मामलों में सफलता देह-सुख का त्याग करने और परमेश्वर के साथ वास्तविक सहयोग करने से मिलेगी। तुम्हें यह समझना चाहिए कि "सहयोगी हृदय के बिना परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करना कठिन है; यदि देह पीड़ा का अनुभव नहीं करती, तो परमेश्वर से आशीषें प्राप्त नहीं होंगी; यदि आत्मा संघर्ष नहीं करती, तो शैतान को शर्मिंदा नहीं होना पड़ेगा।" यदि तुम इन सिद्धांतों का अभ्यास करो और इन्हें अच्छी तरह से समझ लो, तो परमेश्वर में विश्वास करने के तुम्हारे विचार सही हो जाएँगे। अपने वर्तमान अभ्यास में तुम लोगों को "भूख शांत करने के लिए रोटी खोजने" की मानसिकता को छोड़ना आवश्यक है; तुम्हें इस मानसिकता को छोड़ना भी आवश्यक है कि "सब-कुछ पवित्र आत्मा द्वारा किया जाता है और लोग उसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते।" जो भी लोग ऐसा कहते हैं, वे सब यह सोचते हैं, "लोग वह सब कर सकते हैं जो वे करना चाहते हैं, और जब समय आएगा तो पवित्र आत्मा अपना कार्य करेगा। लोगों को देह का प्रतिरोध या सहयोग करने की आवश्यकता नहीं है; महत्त्वपूर्ण यह है कि पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रेरित किया जाए।" ये मत बेतुके हैं। इन परिस्थितियों में पवित्र आत्मा कार्य करने में असमर्थ है। इस प्रकार का दृष्टिकोण पवित्र आत्मा के कार्य के लिए एक बड़ी रुकावट बन जाता है। अकसर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों के सहयोग से प्राप्त किया जाता है। जो लोग सहयोग नहीं करते और कृतसंकल्प नहीं होते हैं और फिर भी अपने स्वभाव में बदलाव और पवित्र आत्मा का कार्य तथा परमेश्वर से प्रबोधन और प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं, वे सचमुच उच्छृंखल विचार रखते हैं। इसे "अपने आपको लिप्त करना और शैतान को क्षमा करना" कहा जाता है। ऐसे लोगों का परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध नहीं होता। तुम्हें अपने भीतर शैतानी स्वभाव के कई खुलासे और अभिव्यक्तियाँ ढूँढ़नी चाहिए और अपने द्वारा किए गए ऐसे कार्य तलाशने चाहिए, जो अब परमेश्वर की आवश्यकताओं के खिलाफ जाते हैं। क्या तुम अब शैतान को त्याग सकोगे? तुम्हें परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना चाहिए, और नए जीवन के साथ एक नया व्यक्ति बनना चाहिए। अपने पिछले अपराधों पर ध्यान मत दो; अनुचित रूप से पश्चातापी न बनो; दृढ़ रहकर परमेश्वर के साथ सहयोग करो, और अपने कर्तव्य पूरे करो। इस प्रकार परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य हो जाएगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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