परमेश्वर के दैनिक वचन | "सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए" | अंश 386

परमेश्वर के दैनिक वचन | "सत्य प्राप्त करने के लिए तुम्हें अपने आसपास के लोगों, विषयों और चीज़ों से सीखना ही चाहिए" | अंश 386

2099 |25 दिसम्बर, 2020

यह मापने में कि लोग परमेश्वर की आज्ञा का पालन कर सकते हैं या नहीं, मुख्य बात यह देखना है कि वे परमेश्वर से असाधारण माँगें कर रहे हैं या नहीं, और उनके गुप्त अभिप्राय हैं या नहीं। अगर लोग हमेशा परमेश्वर से माँगें करते हैं, तो यह साबित करता है कि वे उसके आज्ञाकारी नहीं हैं। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, यदि तुम इसे परमेश्वर से प्राप्त नहीं कर सकते, सत्य की तलाश नहीं कर सकते, हमेशा अपने व्यक्तिपरक तर्क से बात करते हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि केवल तुम ही सही हो, और यहाँ तक कि अभी भी परमेश्वर पर संदेह करने में सक्षम हो, तो तुम मुश्किल में रहोगे। ऐसे लोग सबसे घमंडी एवं परमेश्वर के प्रति विद्रोही होते हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर से माँगते रहते हैं, वे कभी सच में आज्ञापालन नहीं कर सकते। अगर तुम परमेश्वर से माँग करते हो, तो इससे साबित होता है कि तुम उससे सौदा कर रहे हो, तुम अपने ही विचार चुन रहे हो, और अपने विचारों के अनुसार ही कार्य कर रहे हो। इसमें तुम परमेश्वर को धोखा देते हो, और तुममें आज्ञाकारिता नहीं है। परमेश्वर से माँग करना नासमझी है; अगर तुम्हें सचमुच विश्वास है कि वह परमेश्वर है, तो तुम उससे माँग करने की हिम्मत नहीं करोगे, न ही तुम उससे माँग करने के योग्य होगे, चाहे वे माँगें उचित हों या न हों। अगर तुममें सच्चा विश्वास है, और तुम मानते हो कि वह परमेश्वर है, तो तुम्हारे पास उसकी आराधना करने और उसका आज्ञापालन करने के अलावा कोई विकल्प न होगा। आज न सिर्फ़ लोगों के पास विकल्प है, बल्कि वे यह भी माँग करते हैं कि परमेश्वर उनके विचारों के अनुसार कार्य करे। वे अपने खुद के विचार चुनते हैं और कहते हैं कि परमेश्वर उनके अनुसार कार्य करे, और वे खुद से यह अपेक्षा नहीं करते कि वे परमेश्वर के विचारों के अनुसार कार्य करें। इस तरह, उनके भीतर कोई सच्चा विश्वास नहीं होता, न ही उनके विश्वास का कोई सार होता है। जब तुम परमेश्वर से कम माँगें करने में सक्षम हो जाओगे, तो तुम्हारे सच्चे विश्वास और तुम्हारी आज्ञाकारिता में वृद्धि होगी, और तुम्हारी तार्किक समझ भी अपेक्षाकृत सामान्य हो जाएगी। अक्सर ऐसा होता है कि लोग तर्क करने में जितने अधिक प्रवृत्त होते हैं, और जितना अधिक वे औचित्य बताते हैं, उतना ही अधिक कठिन उनसे निपटना होता है। न केवल उनकी बहुत-सी माँगें होती हैं, बल्कि उंगली पकड़ाओ तो सर पर चढ़ जाते हैं। एक क्षेत्र में संतुष्ट होने पर वे दूसरे क्षेत्र में माँग करने लगते हैं, उन्हें सभी क्षेत्रों में संतुष्ट होना होता है, वरना वे शिकायत करना शुरू कर देते हैं, और खुद से आशा रखना बंद कर देते हैं। बाद में वे कृतज्ञ और पछतावा महसूस करते हैं, फूट-फूटकर रोते हैं और मरना चाहते हैं। इसका क्या फायदा? क्या इससे समस्या हल हो सकती है? और इसलिए, कुछ होने से पहले, तुम्हें अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए—उसके भीतर क्या चीज़ें हैं, तुम क्या पसंद करते हो, और अपनी माँगों से तुम क्या हासिल करना चाहते हो। कुछ लोग यह मानते हैं कि उनमें कुछ क्षमता और प्रतिभा है, और वे अगुआ बनकर दूसरों से ऊपर उठना चाहते हैं, इसलिए वे माँग करते हैं कि परमेश्वर उनका उपयोग करे। और यदि परमेश्वर उनका उपयोग न करे, तो वे कहते हैं : "परमेश्वर, तुम मुझ पर अनुग्रह क्यों नहीं करते? मेरा खूब उपयोग करो, मैं गारंटी देता हूँ कि मैं तुम्हारे लिए खुद को खपाऊँगा।" क्या ऐसी प्रेरणाएँ सही हैं? परमेश्वर के लिए खुद को खपाना अच्छी बात है, लेकिन परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की उनकी इच्छा दूसरे स्थान पर रहती है; जबकि मन ही मन ऐसे लोग हैसियत चाहते हैं—उसी पर उनका ध्यान रहता है। यदि तुम वास्तव में आज्ञापालन करने में सक्षम हो, तो तुम इस बात की परवाह किए बिना कि वह तुम्हारा उपयोग करता है या नहीं, तुम एक चित्त और एक मन से उसका अनुसरण करोगे, और तुम इस बात की परवाह किए बिना कि तुम्हारी कोई हैसियत है या नहीं, स्वयं को खपाने में सक्षम होगे। तभी तुममें समझ होगी और तभी तुम परमेश्वर का आज्ञापालन करने वाले व्यक्ति होगे।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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