परमेश्वर के दैनिक वचन | "केवल अपनी खुद की परिस्थितियों को समझ कर आप सही रास्ते पर चल सकते हैं" | अंश 379

02 जनवरी, 2021

बहुत से लोग यह पहले कह चुके हैं : "मैं सारे सत्य समझता हूँ, मैं तो बस उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाता।" यह वाक्य मूल समस्या को उजागर करता है, जो लोगों की प्रकृति की भी समस्या है। अगर किसी की प्रकृति सत्य से नफरत करने की है तो वो सत्य को कभी नहीं अपनाएगा। जो लोग सत्य से नफरत करते हैं, वे निश्चित रूप से परमेश्वर में अपने विश्वास के साथ फिज़ूल की इच्छाएँ भी पाले रहेंगे; कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे क्या करते हैं, उसमें उनके अपने इरादे हमेशा मौजूद होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है और वे घर लौटकर नहीं जा सकते, वे ऐसी इच्छा करते हैं : "मैं अभी घर नहीं जा सकता। लेकिन एक दिन, परमेश्वर मुझे एक बेहतर घर देगा। वह मुझे व्यर्थ में दुख नहीं झेलने देगा।" या वो सोचते हैं, "मैं चाहे कहीं भी रहूँ, वह मुझे भोजन देगा। परमेश्वर मुझे बंद गली में नहीं ले जायेगा। अगर उसने ऐसा किया तो वह गलत होगा।" क्या लोगों के मन में ये विचार नहीं आते? कुछ लोग सोचते हैं, "मैं परमेश्वर के लिए स्वयं को इतना खपाता हूँ, इसलिए उसे मुझे सत्ताधारी अधिकारियों के हाथों में नहीं सौंपना चाहिए। मैंने बहुत त्याग किया है और मैं ईमानदारी से सत्य की खोज में हूँ, इसलिए परमेश्वर को मुझे आशीष देना ही चाहिये; हम परमेश्वर के दिन के आने का कितना इंतजार करते हैं, ताकि परमेश्वर का दिन शीघ्र आए और वो हमारी इच्छाएँ पूरी करे।" लोग परमेश्वर से हमेशा अनावश्यक मांग करते हैं और सोचते हैं : हमने ऐसा किया है, इसलिए परमेश्वर को ऐसा-ऐसा करना चाहिए; हमने कुछ चीजें हासिल की हैं, इसलिए परमेश्वर को हमें कुछ इनाम देना चाहिए और हमें आशीर्वाद वगैरह देना चाहिए। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जब वे दूसरों को आराम से अपना परिवार छोड़कर परमेश्वर के लिए खुद को खपाते हुए देखते हैं, तो उनमें हीनभावना आती है और वे सोचते हैं : "दूसरों ने न जाने कब से अपना घर छोड़ रखा है, वे इस पर कैसे काबू पा लेते हैं? मैं कभी इस पर काबू क्यों नहीं पा सकता? मैं अपना परिवार, और अपने बच्चों को क्यों नहीं छोड़ पाता? परमेश्वर उनके प्रति दयालु है, मेरे प्रति क्यों नहीं? पवित्र आत्मा मुझ पर अनुग्रह क्यों नहीं करता? परमेश्वर मेरे साथ क्यों नहीं है?" यह क्या स्थिति है? लोग बहुत अविवेकी होते हैं। वे सत्य को अभ्यास में नहीं लाते; बल्कि वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करते हैं। उनका अपना कोई प्रयास नही होता, न ही ऐसा कुछ होता है जो उन्हें प्राप्त करना चाहिए। उन्होंने व्यक्तिगत पसंद का और उस मार्ग का त्याग कर दिया होता है जिस पर उन्हें चलना चाहिए। वे हमेशा परमेश्वर से ऐसा करने या वैसा करने की मांग करते रहते हैं, और चाहते हैं कि परमेश्वर आँख बंद करके उन पर दया करे, उन पर अनुग्रह करे, उनका मार्गदर्शन करे और उन्हें आनंद दे। वे सोचते हैं, "मैंने अपना घर छोड़ दिया है, मैंने बहुत त्याग किया है, मैं अपना कर्तव्य निभाता हूँ और मैंने इतना दुख सहा है। इसलिए परमेश्वर को मुझ पर अनुग्रह करना चाहिए, कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे मुझे घर की याद न आए, मुझे परिवार का त्याग करने का संकल्प देना चाहिए और मुझे और शक्तिशाली बनाना चाहिए। मैं इतना कमजोर क्यों हूँ? दूसरे इतने शक्तिशाली क्यों हैं? परमेश्वर को मुझे शक्तिशाली बनाना चाहिए।" "दूसरे लोग घर जा सकते हैं; तो मुझे क्यों सताया जाता है, मैं घर क्यों नहीं जा सकता? परमेश्वर मुझ पर कोई अनुग्रह नहीं कर रहा।" इन लोगों की सारी बातें अविवेकपूर्ण होती हैं, इसमें सत्य तो और भी नहीं होता। लोगों की शिकायतें कैसे पैदा होती हैं? ऐसे विचार मनुष्य के भीतर से उजागर होते हैं और वे पूरी तरह से उसकी प्रकृति के प्रतिनिधि होते हैं। अगर तुम इन चीज़ों को अपने अंदर से नहीं निकालोगे, तो तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना भी बड़ा हो, सत्य की तुम्हारी समझ कितनी भी अधिक हो, तुम कभी भी आश्वस्त नहीं हो सकते कि तुम उन पर टिक पाओगे। तुम कभी भी परमेश्वर की निंदा करके उसे धोखा दे सकते हो, तुम किसी भी समय और किसी भी जगह सत्य के मार्ग का त्याग कर सकते हो। ऐसा बड़ी आसानी से हो सकता है। क्या तुम्हें ये अब स्पष्ट दिखायी दे रहा है? लोगों को उन बातों को अच्छी तरह से समझ लेना चाहिए जो उनकी प्रकृति किसी भी समय प्रकट कर सकती है; उन्हें ध्यानपूर्वक इस समस्या का समाधान करना चाहिए। सत्य की तुलनात्मक रूप से अच्छी समझ वाले लोग, कभी-कभी इस बारे में थोड़े जागरूक होते हैं। जब उन्हें समस्या का पता चलता है तो वे गहराई से आत्मनिरीक्षण और चिंतन कर सकते हैं। हालांकि, कभी कभी उन्हें समस्या की जानकारी नहीं होती, इसीलिए वे कुछ नहीं कर पाते। तब वे केवल इंतजार ही कर सकते हैं कि परमेश्वर भेद खोले या उनके सामने तथ्य उजागर करे। कभी-कभार विचारहीन लोगों को इस बात का पता होता है, लेकिन यह कहकर वे खुद को बहलाते रहते हैं, "सभी लोग ऐसे ही होते हैं, इसलिए इसका कुछ भी मतलब नहीं है। परमेश्वर मुझे माफ़ कर देगा; वो याद नहीं रखेगा। यह सामान्य बात है।" लोगों को जो चुनना चाहिये और जो करना चाहिये, उसे वे न तो करते हैं और न ही उसे हासिल करते हैं। वे सब बेवकूफ़ और बेहद निष्क्रिय होते हैं, और बहुत ही मोहताज होते हैं, यहाँ तक कि निरंकुश सोच में लिप्त रहते हैं, "यदि परमेश्वर हमें एक दिन पूरी तरह से बदल दे, तो फिर हम निष्क्रिय नहीं रहेंगे। फिर हम सही ढंग से आगे बढ़ सकते हैं। फिर परमेश्वर को हमारे लिए इतना परेशान होने की ज़रूरत नहीं होगी।" अब तुम्हें स्पष्ट रूप से देखना चाहिए। जिस मार्ग पर तुम चलने वाले हो, वह तुम्हारी अपनी पसंद का होना चाहिए; हर व्यक्ति का चयन बहुत महत्वपूर्ण है। तुम इस बात का पता लगा सकते हो, तो जब बात आत्म-संयम की आती है तब तुम कितने शक्तिशाली हो? जब अपनी इच्छाओं को त्यागने की बात आती है तब तुम कितने शक्तिशाली होते हो? यह सत्य का अभ्यास करने की पूर्व शर्त है और मुख्य तत्व है। जब कभी तुम्हारा सामना किसी मामले से हो और तुम्हें पता हो कि उससे सत्य के अनुरूप कैसे हल करना है, तो तुम उस मामले में तभी आगे बढ़ पाओगे जब तुम इस बात को लेकर स्पष्ट हो कि तुम्हें क्या विकल्प चुनना चाहिए और किस पर अमल करना चाहिए। यदि तुम अपनी दशा में सही और गलत का पता लगा सकते हो, लेकिन फिर भी पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाते हो और मात्र अपने भ्रमित तरीके से आगे बढ़ रहे हो, तब तुम न तो कभी भी कोई प्रगति कर पाओगे और न ही तुम्हें किसी सफलता का अनुभव हासिल होगा। यदि तुम जीवन-प्रवेश को लेकर गंभीर नहीं हो, तो तुम अपने आपको रोक रहे हो, और इससे यही साबित होता है कि तुम्हें सत्य से प्रेम नहीं है।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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