परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है" | अंश 134

तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? आत्मा, शरीर और वचन मिलकर ही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तू सिर्फ़ शरीर के बारे में जानता है, यदि तू उसकी आदतों, और उसके चरित्र के बारे में जानता है, लेकिन तू आत्मा के कार्य या देह में आत्मा के कार्य के बारे में कुछ नहीं जानता है, और सिर्फ़ आत्मा और वचन पर ध्यान देता है, और केवल आत्मा के सामने प्रार्थना करता है, व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के आत्मा के कार्य के बारे में कुछ भी जाने बिना, तब भी यह साबित करता है कि तुझे व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है। व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में ज्ञान में उनके वचनों को जानना और अनुभव करना, और उन नियमों और सिद्धांतों को समझना जिनके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है, और परमेश्वर की आत्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसी तरह, इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कार्य आत्मा के द्वारा निर्देशित होता है, और कि उसके द्वारा बोले गए वचन आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। इसलिये, यदि तू व्यावहारिक परमेश्वर को जानना चाहता है, तो तुझे मुख्य रूप से यह जानना है कि परमेश्वर कैसे अपनी मानवीयता में, और अपनी ईश्वरीयता में कार्य करता है; यह सम्बन्ध रखता है आत्मा कि अभिव्यक्ति से, जिससे सभी लोगों का जुड़ाव है।

वह कौनसा पहलु है जो आत्मा के प्रकटीकरण में शामिल है? कभी-कभी व्यावहारिक परमेश्वर अपनी मानवीयता में कार्य करता है और कभी-कभी अपनी ईश्वरीयता में, लेकिन कुल मिलाकर, दोनों मामलों में कमान आत्मा के पास होता है। लोगों के भीतर जैसी भी आत्मा होती है उनकी बाहरी अभिव्यक्ति वैसी ही होती है। आत्मा साधारण ढंग से कार्य करता है, लेकिन आत्मा के द्वारा निर्देश के दो भाग होते हैं: एक भाग उसका मानवीयता में कार्य करना है, जबकि दूसरा उसकी ईश्वरीयता के द्वारा कार्य करना है। यह तुझे अच्छे ढंग से समझ लेना चाहिए। आत्मा का कार्य परिस्थिति के अनुसार विभिन्न होता है: जब उसके मानवीय कार्य की आवश्यकता होती है, तो आत्मा उसके मानवीय कार्य को निर्देशित करता है; जब उसके ईश्वरीय कार्य की आवश्यकता पड़ती है, तो उसके निष्पादन के लिए सीधे ईश्वरीयता प्रकट होती है। क्योंकि परमेश्वर देह में कार्य करता है और देह में प्रकट होता है, वह अपनी मानवीयता और अपनी ईश्वरीयता दोनों में कार्य करता है। जब वह अपनी मानवीयता में कार्य करता है, तो यह आत्मा के द्वारा शासित होता है, मनुष्य की देह की आवश्यकताओं को संतुष्ट करने, मनुष्य को और आसानी से उनके साथ जुड़ने, और मनुष्य को परमेश्वर की सच्चाई और सादगी देखने के योग्य बनाता है। इसके अतिरिक्त, यह मनुष्य को यह देखने के योग्य बनाता है कि परमेश्वर का आत्मा देह धारण किया है और मनुष्यों के बीच है, मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के साथ कार्य करता है। ईश्वरीयता में उसका कार्य, लोगों के जीवन की पूर्ति करने, लोगों की हर चीज़ में सकारात्मक पक्ष से अगुवाई करने, लोगों के स्वभाव को बदलने, और उन्हें वास्तव में आत्मा के देह में प्रकटीकरण को देखने देने के लिए है। मनुष्य के जीवन में बढ़ोतरी मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों और ईश्वरीयता के कार्य के द्वारा प्राप्त की जाती है। सिर्फ़ ईश्वरीयता के कार्य को स्वीकार करके मनुष्य के स्वभाव में बदलाव को पूरा किया जा सकता है और उसके बारे में उसी भावार्थ से बताया जा सकता है। उसके बाद उसमें मानवीयता का कार्य, अर्थात् परमेश्वर के पालन-पोषण, सहायता, और मानवीयता की पूर्ति, जोड़ देने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को पूरा कर सकता है। व्यावहारिक परमेश्वर जिसके बारे में आज हम बातें करते हैं वो अपनी मानवीयता और अपनी ईश्वरीयता दोनों में ही कार्य करता है। व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकटीकरण के द्वारा उसके मानवीयता वाले कार्य और जीवन, तथा उसके सम्पूर्ण ईश्वरीयता वाले कार्य पूरे होते हैं। उसकी मानवीयता और ईश्वरीयता मिल कर एक हो जाते हैं, और दोनों के कार्य वचनों के द्वारा पूरे किए जाते हैं। चाहे मानवीयता में हों या ईश्वरीयता में, वह वचन बोलता है। जब परमेश्वर मानवीयता में काम करता है, तो वह मानवीयता की भाषा में बोलता है ताकि मनुष्य उससे जुड़ सके और उसके वचनों को समझ सके। उसके वचन सामान्य ढंग से बोले जाते हैं और समझने में आसान होते हैं, ताकि वे सभी लोगों तक पहुँचाए जा सके; सुशिक्षित और खराब ढंग से शिक्षित दोनों ही उसके वचनों को स्वीकार करने के योग्य होते हैं। जब वह अपनी ईश्वरीयता में कार्य करता है, कार्य तब भी वचनों के द्वारा ही किए जाते हैं, लेकिन उसके वचन पूर्ति और जीवन से भरपूर होते हैं। उसके वचनों में मानव अर्थ की मिलावट नहीं होती है और उनमें मानवीय प्राथमिकताएँ शामिल नहीं होती हैं; वे मानवीयता से बंधनमुक्त और सामान्य मानवीयता की सीमाओं से परे होते हैं। भले ही यह कार्य एक देह में किया जाता है, यह आत्मा का सीधा प्रकटीकरण है। यदि लोग परमेश्वर के कार्य को सिर्फ़ उसकी मानवीयता में ही स्वीकार करते हैं, तो वे अपने आप को एक दायरे में सीमित कर लेते हैं। इसके पहले कि एक छोटा सा भी बदलाव सम्भव हो उन्हें निपटने, कांट-छांट, और अनुशासन के लम्बे वर्षों की आवश्यकता होगी। हालाँकि, पवित्र आत्मा के कार्य या उपस्थिति के बिना, वे हमेशा उन्हीं गलतियों को दोहराएँगे। इस तरह के नुकसान और कमियों को केवल ईश्वरीयता के काम के माध्यम से ठीक किया जा सकता है, केवल तभी मनुष्य को सम्पूर्ण बनाया जा सकता है। बहुत लम्बे समय तक निपटने और कांट-छांट करने के बजाय, जो चीज जरूरी है वह है सकारात्मक पूर्ति, सभी कमियों को पूरा करने के लिए वचनों का उपयोग करना, लोगों की सभी अवस्थाओं को प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करना, उनके जीवन, उनकी प्रत्येक वाणी, उनके हर कार्य को निर्देशित करने तथा उनके इरादों और प्रेरणा को खोल कर रख देने के लिए वचनों का उपयोग करना; यही है व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक कार्य। और इसलिए, व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति अपने रवैये में, तुझे उसे सम्मान देते हुए और स्वीकार करते हुए उसकी मानवीयता के सामने झुकना चाहिए और साथ ही साथ, तुझे उसकी ईश्वरीयता के कार्य और वचनों को भी स्वीकार करना चाहिए और उसकी आज्ञा का पालन करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा देह में प्रकट होने का अर्थ है कि परमेश्वर के आत्मा के सब कार्य और वचन उसकी सामान्य मानवीयता, और उसके देह धारण के द्वारा किये जाते हैं। अर्थात्, परमेश्वर का आत्मा उनकी मानवीयता के कार्य को निर्देशित करता है और ईश्वरीयता के कार्य को देह के साथ पूरा करता है, और देहधारी परमेश्वर में तू परमेश्वर के मानवीयता वाले कार्य और संपूर्ण ईश्वरीय कार्य दोनों को देख सकता है। व्यावहारिक परमेश्वर के देह में प्रकट होने का यही वास्तविक महत्व है। यदि तू सचमुच में इसे समझ सकता है, तो फिर तू परमेश्वर के सभी अलग-अलग भागों से जुड़ पाएगा; और तू उसके ईश्वरीयता के कार्य को बहुत ज़्यादा महत्व देना, या उसके मानवीयता के कार्य को बिल्कुल नकार देना बंद कर देगा, और तू चरम पर नहीं जाएगा, न ही गलत रास्ते पर मुड़ेगा। कुल मिलाकर, व्यावहारिक परमेश्वर का अर्थ यह है कि उसके मानवीयता के कार्य और उसके ईश्वरीयता के कार्य, उसकी आत्मा के निर्देशानुसार, उसके देह के द्वारा प्रदर्शित किये जाते हैं, ताकि लोग देख सकें कि वे जीवंत और सजीव है, तथा असली और वास्तविक है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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