परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर संपूर्ण सृष्टि का प्रभु है" | अंश 207

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर संपूर्ण सृष्टि का प्रभु है" | अंश 207

179 |04 सितम्बर, 2020

वर्तमान में कुछ ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के द्वारा आरम्भ किए गए नए कार्य को अब भी नहीं समझ पा रहे हैं। परमेश्वर ने गैर यहूदी राष्ट्रों में एक नया प्रारम्भ किया है और एक दूसरे युग का प्रारम्भ किया है एवं दूसरे कार्य का लोकार्पण किया है और वह मोआब के वंशजों के मध्य कार्य कर रहा है। क्या यह उसका नवीनतम कार्य नहीं है? सम्पूर्ण युगों में किसी ने भी इस कार्य का अनुभव नहीं किया है, न ही किसी ने इसके बारे में सुना है, और सराहना करने की तो बात ही दूर है। परमेश्वर की बुद्धि, परमेश्वर का आश्चर्य, परमेश्वर का अथाहपन, परमेश्वर की महानता, परमेश्वर की पवित्रता इन अंतिम दिनों में कार्य के इस चरण पर निर्भर करती है, ताकि यह स्पष्टता से प्रकट हो सके। क्या यह वह नया कार्य नहीं है जो मानवजाति की धारणाओं को तोड़ रहा है? यहां पर अब भी कुछ इस प्रकार से सोचने वाले लोग हैं: "चूँकि परमेश्वर ने मोआबियों को श्राप दिया और कहा कि वह उनके वंशजों को छोड़ देगा, तो वह उन्हें अब कैसे बचा सकता है?" ये उन गैर यहूदी राष्ट्र के लोग हैं जिन्हें श्राप दिया गया था और इस्राएल से बाहर निकाल दिया गया था; इस्राएली उन्हें "गैर यहूदी कुत्ते" कहकर पुकारते थे। हर किसी की दृष्टि में, वे केवल गैर यहूदी कुत्ते नहीं, परन्तु उससे भी बद्तर हैं, विनाश के पुत्र; दूसरे शब्दों में, वे परमेश्वर के द्वारा चुने हुए लोग नहीं हैं। हालांकि वे मूल रूप से इस्राएल के दायरे में पैदा हुए थे, वे इस्राएल के लोगों का हिस्सा नहीं हैं; वे भी गैर यहूदी देशों में से निष्कासित कर दिए गए थे। ये सबसे निम्न लोग हैं। खासतौर पर इसलिये कि वे मानवता के बीच में सबसे निम्न हैं परमेश्वर उनके मध्य में नए युग के लोकार्पण का कार्य प्रारम्भ कर रहा है। क्योंकि वे भ्रष्ट मानवता के प्रतिनिधि हैं और परमेश्वर का कार्य बिना चुनाव या उद्देश्य के नहीं है, जो कार्य वह आज इन लोगों के मध्य में कर रहा है वह सृष्टि के मध्य में किया जा रहा कार्य भी है। नूह सृष्टि का एक भाग था, जैसा कि उनके वंशज हैं। संसार में जिसके देह और लहू है वह सृष्टि का एक भाग है। परमेश्वर का कार्य सम्पूर्ण सृष्टि पर निर्देशित है; यह इसके अनुसार नहीं किया जाता है कि रचने के बाद किसी को श्रापित किया गया है या नहीं। उसके प्रबंधन का कार्य सम्पूर्ण सृष्टि की ओर निर्देशित है, न कि उन चुने हुए लोगों की ओर जो श्रापित नहीं हैं। चूँकि परमेश्वर अपनी सृष्टि के मध्य कार्य करने का इच्छुक है, वह पूरी सृष्टि पर सफलतापूर्वक अपना कार्य निश्चित पूरा कर लेगा; वह उनके मध्य कार्य करेगा जो उसके कार्य के लिए लाभदायक होंगे। इसलिए, वह मनुष्यों के मध्य कार्य करने में सभी परम्पराओं को तोड़ देता है, उसके लिए "श्रापित," "ताड़ित," और "आशीषित" शब्द बेमतलब हैं! यहूदी लोग काफी अच्छे हैं, और इस्राएल के चुने हुए लोग भी बुरे नहीं हैं, ये अच्छी क्षमता और मानवता से भरे हुए लोग हैं। यहोवा ने शुरआत में अपना कार्य इनके मध्य में प्रारम्भ किया था और अपना प्रारंभिक काम पूरा किया, परन्तु यह सब बेमतलब होता यदि वह उन्हें अपने विजयी कार्य के लिए प्राप्तकर्ताओं के तौर पर इस्तेमाल करता। हालांकि वे भी सृष्टि का एक हिस्सा हैं और उनके बहुत सारे सकारात्मक पहलु हैं, उनके मध्य में इस चरण के कार्य को करना बेमतलब होगा। वह किसी को भी जीतने में असमर्थ होगा, न ही वह सम्पूर्ण सृष्टि को समझाने में सक्षम होगा। बड़े लाल अजगर के राष्ट्र के इन लोगों के मध्य उसके कार्यों के स्थानांतरण का यह महत्व है। यहां पर सबसे गहरा अर्थ एक युग के प्रारम्भ में, सभी मानव धारणाओं और नियमों को तोड़ने में और सम्पूर्ण अनुग्रह युग के कार्य का समापन किये जाने में है। यदि उसका वर्तमान का कार्य इस्राएलियों के मध्य किया गया होता, उसके छः हज़ार सालों के प्रबंधन के कार्य के समाप्त होने के समय तक, प्रत्येक व्यक्ति यह विश्वास करता कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, यह कि सिर्फ इस्राएल के लोग परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, यह कि केवल इस्राएली ही परमेश्वर की आशीष और प्रतिज्ञाओं को प्राप्त करने के योग्य हैं। अंतिम दिनों में, परमेश्वर बड़े लाल अजगर के गैर यहूदी देश में देहधारी के तौर पर है; उसने सम्पूर्ण सृष्टि के परमेश्वर के तौर पर परमेश्वर का कार्य पूर्ण कर लिया है; उसने अपना सम्पूर्ण प्रबंधन कार्य पूर्ण कर लिया है, और बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में वह अपने कार्य के मुख्य भाग को समाप्त करेगा। कार्य के तीनों चरणों का मुख्य बिन्दु है मनुष्य की मुक्ति—अर्थात सम्पूर्ण रचना के द्वारा सृष्टि के प्रभु की आराधना कराना। इसलिए, इस कार्य का प्रत्येक चरण बहुत ही सार्थक है; परमेश्वर बिल्कुल भी बिना अर्थ या मूल्य का कार्य नहीं करेगा। एक ओर, इस चरण के कार्य में एक युग का प्रारम्भ और पिछले दोनों युगों का अंत निहित है; दूसरी ओर, इसमें सम्पूर्ण मानव धारणाओं को तोड़ना और मनुष्यों के सभी पुराने विश्वास एवं ज्ञान को मिटाना निहित है। पिछले दो युगों का कार्य मनुष्यों की भिन्न-भिन्न धारणाओं के अनुसार हुआ था; हालांकि यह चरण, मानवीय धारणाओं को पूरी तरह से मिटा देता है, जिससे यह पूरी तरह से मानवजाति को जीत लेता है। मोआबी वंशजों पर विजय का उपयोग करते हुए और उनके मध्य किये गया कार्य का उपयोग करते हुए परमेश्वर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में पूरी मानवता को जीत लेगा। उसके कार्य के इस चरण का यही सबसे गहरा महत्व है, और यही उसके कार्य के इस चरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। भले ही तुम अब जानते हो कि तुम्हारे स्वयं की स्थिति निम्न है और तुम कम मूल्य के हो, फिर भी तुम महसूस करते हो कि तुम्हारी सबसे आनन्ददायक वस्तु से भेंट हो गई हैः तुमने बहुत ही महान आशीष को प्राप्त किया है, महान वायदे को प्राप्त किया है और परमेश्वर के महान कार्य को तुम समाप्त कर सकते हो और तुम परमेश्वर का सच्चा चेहरा देख सकते हो, परमेश्वर के निहित स्वभाव को जान सकते हो और परमेश्वर की इच्छा को पूर्ण कर सकते हो। परमेश्वर के कार्य के पिछले दो चरण इस्राएल में किए गए थे। यदि अंतिम दिनों में उसके कार्य का यह चरण इस्राएलियों के बीच ही हो रहा होता, तो न केवल सम्पूर्ण सृष्टि यह विश्वास करती कि केवल इस्राएली परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं, बल्कि परमेश्वर के सम्पूर्ण प्रबंधन की योजना भी अपने वांछित प्रभाव को प्राप्त नहीं कर पाती। इस्राएल में उसके कार्य के दो चरण जिस समय में किए गए, कोई भी नया कार्य कभी भी नही किया गया था और गैर यहूदी राष्ट्रों में परमेश्वर के नए युग के प्रारम्भ का कोई भी कार्य कभी भी नहीं किया गया था। युग प्रारम्भ करने के इस चरण का कार्य गैर यहूदी देशों में सबसे पहले किया गया, और इसके अलावा, इसे पहले मोआबियों के वंशजों के मध्य किया जाता है; इसने सम्पूर्ण युग का प्रारम्भ किया। परमेश्वर ने मानवीय धारणाओं में समाहित किसी भी ज्ञान को तोड़ डाला है और इस से किसी भी बात को अस्तित्व में बने रहने की अनुमति नहीं दी है। उसके विजय के कार्य में उसने मानवीय धारणाओं को तोड़ डाला, उन पुराने, पहले के मानवीय ज्ञान के तरीकों को नष्ट कर डाला। उसने लोगों को अनुमति दी की वे देखें कि परमेश्वर के साथ कोई भी नियम नहीं होते हैं, कि परमेश्वर के बारे में कुछ भी पुराना नहीं है, कि वह जो कार्य करता है वह पूरी तरह से स्वतंत्र है, पूरी तरह से मुक्त है, कि वह जो कुछ करता है उसमें वह सही है। वह सृष्टि के बीच जो भी कार्य करता है उसके प्रति तुम्हें पूरी तरह से समर्पित होना है। जो भी कार्य वह करता है वह सार्थक होता है और उसके स्वयं की इच्छा और ज्ञान के अनुसार होता है और मानवीय चुनावों और धारणाओं के अनुसार नहीं होता है। वह उन कार्यों को करता है जो उसके कार्य के लिए लाभप्रद होता हैं; यदि कुछ उसके कार्य के लिए लाभदायक नहीं है तो वह उस कार्य को नहीं करेगा, चाहे वह कितना भी अच्छा क्यों न हो! वह कार्य करता है और, अपने कार्य और सार्थकता के अनुसार अपने कार्य के प्राप्तकर्ता एवं स्थान को चुनता है। वह पुराने नियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह पुराने नुस्खों का पालन करता है; इसके बजाय, वह कार्य की महत्ता के आधार पर अपने कार्य की योजना बनाता है; अंत में वह उसके सच्चे प्रभाव और प्रत्याशित उद्देश्य को प्राप्त करना चाहता है। यदि तुम इन बातों को अभी नहीं समझोगे, तो यह कार्य तुम पर कोई प्रभाव नहीं डाल पायेगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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