परमेश्वर के दैनिक वचन | "विजय के कार्यों का आंतरिक सत्य (2)" | अंश 200

आज तुम्हें पता होना चाहिए कि विजित कैसे हुआ जाए, और विजित होने के बाद लोग अपना आचरण कैसा रखें। तुम कह सकते हो कि तुम पर विजय पा ली गई है, पर क्या तुम मृत्युपर्यंत आज्ञाकारी रह सकते हो? इस बात की परवाह किए बिना कि इसमें कोई संभावना है या नहीं, तुम्हें बिलकुल अंत तक अनुसरण करने में सक्षम होना चाहिए, और कैसा भी परिवेश हो, तुम्हें परमेश्वर में विश्वास नहीं खोना चाहिए। अतंतः तुम्हें गवाही के दो पहलू प्राप्त करने चाहिए : अय्यूब की गवाही—मृत्युपर्यंत आज्ञाकारिता; और पतरस की गवाही—परमेश्वर से परम प्रेम। एक मामले में तुम्हें अय्यूब की तरह होना चाहिए : उसने समस्त भौतिक संपत्ति गँवा दी और शारीरिक पीड़ा से घिर गया, फिर भी उसने यहोवा का नाम नहीं त्यागा। यह अय्यूब की गवाही थी। पतरस मृत्युपर्यंत परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम रहा। जब उसे क्रूस पर चढ़ाया गया और उसने अपनी मृत्यु का सामना किया, तब भी उसने परमेश्वर से प्रेम किया, उसने अपनी संभावनाओं का विचार नहीं किया या सुंदर आशाओं अथवा अनावश्यक विचारों का अनुसरण नहीं किया, और केवल परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पूरी तरह से पालन करने की ही इच्छा की। इससे पहले कि यह माना जा सके कि तुमने गवाही दी है, इससे पहले कि तुम ऐसा व्यक्ति बन सको जिसे जीते जाने के बाद पूर्ण बना दिया गया है, तुम्हें यह स्तर हासिल करना होगा। आज यदि लोग वास्तव में अपने सार और स्थिति को जानते, तो क्या वे तब भी संभावनाएँ और आशाएँ खोजते? तुम्हें जो जानना चाहिए, वह यह है : परमेश्वर मुझे पूर्ण करे या न करे, मुझे परमेश्वर का अनुसरण करना चाहिए; अभी वह जो कुछ करता है, वह अच्छा है और वह मेरे लिए करता है, ताकि हमारा स्वभाव परिवर्तित हो सके और हम शैतान के प्रभाव से छुटकारा पा सकें, मलिन धरती पर पैदा होने के बावजूद अशुद्धता से मुक्त हो सकें, और गंदगी और शैतान के प्रभाव को झटककर उसे पीछे छोड़ सकें। निश्चित रूप से तुमसे यही अपेक्षा है, किंतु परमेश्वर के लिए यह विजय मात्र है, जो इसलिए की जाती है कि लोग आज्ञाकारी होने का संकल्प करें और स्वयं को परमेश्वर के समस्त आयोजनों के प्रति समर्पित कर सकें। इस तरह से चीज़ें संपन्न होंगी। आज ज्यादातर लोगों पर विजय पाई जा चुकी है, परंतु उनके अंदर अभी भी बहुत-कुछ है, जो विद्रोही और अवज्ञाकारी है। लोगों का वास्तविक आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है, और वे तभी जोश से भरते हैं, जब आशाएँ और संभावनाएँ होती हैं; आशाओं और संभावनाओं के अभाव में वे नकारात्मक हो जाते हैं, यहाँ तक कि परमेश्वर को छोड़ देने की सोचने लगते हैं। इतना ही नहीं, लोगों में सामान्य मानवता को जीने की कोई बड़ी इच्छा नहीं है। यह अस्वीकार्य है। इसलिए मुझे अब भी विजय की बात करनी चाहिए। दरअसल, पूर्णता विजय के वक़्त ही प्रकट होती है : जैसे ही तुम पर विजय पाई जाती है, पूर्ण किए जाने के पहले प्रभाव भी हासिल हो जाते हैं। जहाँ विजय पाने और पूर्ण किए जाने में अंतर होता है, तो वह लोगों में होने वाले परिर्वतन की मात्रा के अनुसार होता है। विजित होना पूर्ण किए जाने का प्रथम चरण है, परंतु उसका यह अर्थ नहीं है कि वे पूरी तरह से पूर्ण बना दिए गए हैं, न ही वह यह साबित करता है कि परमेश्वर ने उन्हें पूरी तरह से प्राप्त कर लिया है। लोगों को जीते जाने के बाद उनके स्वभाव में कुछ परिवर्तन आते हैं, किंतु ये परिवर्तन उन लोगों की तुलना में बहुत कम होते हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया गया है। आज जो किया जा रहा है, वह लोगों को पूर्ण बनाने का आरंभिक कार्य है—उन पर विजय पाना—और अगर तुम पर विजय नहीं पाई जाती, तो तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने और उसके द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाने का कोई उपाय नहीं होगा। तुम सिर्फ ताड़ना और न्याय के कुछ वचन ही पाओगे, किंतु वे तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परिवर्तित करने में असमर्थ होंगे। इस तरह, तुम उनमें से एक होगे, जिन्हें हटा दिया जाता है; यह मेज पर शानदार को दावत देखने किंतु उसे खा न पाने से अलग नहीं होगा। क्या यह तुम्हारे लिए एक दुखदायी परिदृश्य नहीं है? और इसलिए तुम्हें बदलाव खोजने चाहिए : जीत लिया जाना हो या पूर्ण बनाया जाना, दोनों का संबंध इस बात से है कि तुम्हारे अंदर बदलाव आए हैं या नहीं और तुम आज्ञाकारी हो या नहीं, और यह निश्चित करता है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हो या नहीं। जान लो कि "विजित होना" और "पूर्ण किया जाना" केवल तुम्हारे अंदर आए बदलाव और आज्ञाकारिता की मात्रा पर निर्भर करते हैं, साथ ही इस बात पर कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम कितना सच्चा है। आज जरूरत इस बात की है कि तुम्हें पूरी तरह से पूर्ण किया जा सके, परंतु शुरुआत में तुम्हारा विजित होना आवश्यक है—तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना और न्याय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए, अनुसरण करने का विश्वास होना चाहिए, और तुम्हें ऐसा व्यक्ति बनना चाहिए, जो बदलाव और परमेश्वर का ज्ञान खोजता हो। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति होगे, जो पूर्ण बनाए जाने की खोज करता है। तुम लोगों को यह समझना चाहिए कि पूर्ण किए जाने के दौरान तुम लोगों को जीता जाएगा, और जीते जाने के दौरान तुम लोगों को पूर्ण बनाया जाएगा। आज तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास कर सकते हो या अपने बाहरी मनुष्यत्व में बदलाव और क्षमता में विकास के लिए कोशिश कर सकते हो, परंतु प्रमुख महत्व की बात यह है कि तुम यह समझ सको कि जो कुछ आज परमेश्वर कर रहा है, वह सार्थक और लाभकारी है : यह तुम्हें, जो गंदगी की धरती पर पैदा हुए हो, उस गंदगी से बच निकलने और उसे झटक देने में सक्षम बनाता है, यह तुम्हें शैतान के प्रभाव से पार पाने और शैतान के अंधकारमय प्रभाव को पीछे छोड़ने में सक्षम बनाता है। इन बातों पर ध्यान देने से तुम इस अपवित्र भूमि पर सुरक्षा प्राप्त करते हो। आखिरकार तुम्हें क्या गवाही देने को कहा जाएगा? तुम एक गंदगी की भूमि पर पैदा होते हो किंतु पवित्र बनने में, पुन: कभी गंदगी से ओतप्रोत न होने के लिए, शैतान के अधिकार-क्षेत्र में रहकर भी अपने आपको उसके प्रभाव से छुड़ा लेने के लिए, शैतान द्वारा न तो ग्रसित किए जाने के लिए और न ही सताए जाने के लिए, और सर्वशक्तिमान के हाथों में रहने के योग्य हो। यही गवाही और शैतान से युद्ध में विजय का साक्ष्य है। तुम शैतान को त्यागने में सक्षम हो, अपने जीवन में अब और शैतानी स्वभाव प्रकट नहीं करते, इसके बजाय उस स्थिति को जीते हो, जिसे परमेश्वर ने मनुष्य के सृजन के समय चाहा था कि मनुष्य प्राप्त करे : सामान्य मानवता, सामान्य विवेक, सामान्य अंतर्दृष्टि, परमेश्वर से प्रेम करने का सामान्य संकल्प, और परमेश्वर के प्रति निष्ठा। यह परमेश्वर के प्राणी द्वारा दी जाने वाली गवाही है। तुम कहते हो, "हम गंदगी की भूमि पर पैदा हुए हैं, परंतु परमेश्वर की सुरक्षा के कारण, उसकी अगुआई के कारण, और क्योंकि उसने हम पर विजय प्राप्त की है इसलिए, हमने शैतान के प्रभाव से मुक्ति पाई है। हम आज आज्ञा मान पाते हैं, तो यह भी इस बात का प्रभाव है कि परमेश्वर ने हम पर विजय पाई है, और यह इसलिए नहीं है कि हम अच्छे हैं, या हम स्वभावत: परमेश्वर से प्रेम करते थे। चूँकि परमेश्वर ने हमें चुना और हमें पूर्वनिर्धारित किया, इसीलिए आज हम पर विजय पाई गई है, और इसीलिए हम उसकी गवाही देने में समर्थ हुए हैं, और उसकी सेवा कर सकते हैं, ऐसा इसलिए भी है कि उसने हमें चुना और हमारी रक्षा की, इसी कारण हमें शैतान के अधिकार-क्षेत्र से बचाया और छुड़ाया गया है, और हम गंदगी को पीछे छोड़, लाल अजगर के देश में शुद्ध किए जा सकते हैं।"

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

अय्यूब और पतरस की तरह गवाह बनो

कह सकते हो तुम कि तुम जीत लिए गए हो, लेकिन क्या तुम मृत्यु तक मान सकते हो आज्ञा? तुम्हारी संभावनाएं चाहे कुछ भी हों, तुम्हें करना चाहिए अंत तक अनुसरण। माहौल चाहे कुछ भी हो, चारों ओर कुछ भी हो रहा हो, खोना नहीं चाहिए तुम्हें अपना विश्वास। अय्यूब की तरह बनो, मृत्यु तक आज्ञाकारी। पतरस की तरह बनो, परमेश्वर के लिए रखो परम प्रेम।

अय्यूब की तरह होना चाहिए तुम्हें। देह में था वो ग़रीब, सहता था दर्द, पर कभी न छोड़ा उसने यहोवा का नाम। होना चाहिए तुम्हें पतरस की तरह, क्रूस पर भी अपनी अंतिम सांस तक, मृत्यु तक किया उसने परमेश्वर से प्रेम। माहौल चाहे कुछ भी हो, चारों ओर कुछ भी हो रहा हो, खोना नहीं चाहिए तुम्हें अपना विश्वास। अय्यूब की तरह बनो, मृत्यु तक आज्ञाकारी। पतरस की तरह बनो, परमेश्वर के लिए रखो परम प्रेम।

पतरस ने नहीं सोचा, भविष्य क्या लाएगा, उसकी शानदार उम्मीदों, असाधारण विचारों को, सिर्फ़ चाहिए था उस परमेश्वर का प्रेम, जिसकी करता था वो सेवा, जिसकी व्यवस्था का करता था वो पालन। माहौल चाहे कुछ भी हो, चारों ओर कुछ भी हो रहा हो, खोना नहीं चाहिए तुम्हें अपना विश्वास। अय्यूब की तरह बनो, मृत्यु तक आज्ञाकारी। पतरस की तरह बनो, परमेश्वर के लिए रखो परम प्रेम।

इससे पहले कि तुम्हें गवाही देने के लिए माना जाए क़ाबिल, हासिल करना चाहिए तुम्हें यह मानक। माहौल चाहे कुछ भी हो, चारों ओर कुछ भी हो रहा हो, खोना नहीं चाहिए तुम्हें अपना विश्वास। अय्यूब की तरह बनो, मृत्यु तक आज्ञाकारी। पतरस की तरह बनो, परमेश्वर के लिए रखो परम प्रेम।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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