परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 129

छठा मोड़ः मृत्यु

इतनी हलचल, भाग-दौड़, इतनी कुंठाओं और निराशाओं के पश्चात्, इतने सारे सुख-दुःख और उतार-चढ़ावों के पश्चात्, इतने सारे अविस्मरणीय वर्षों के पश्चात्, बार-बार ऋतुओं को परिवर्तित होते हुए देखने के पश्चात्, व्यक्ति बिना ध्यान दिए ही जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को पार कर जाता है, और पलक झपकते ही वह स्वयं को अपने जीवन के ढलते हुए वर्षों में पाता है। समय के निशान उसके पूरे शरीर पर छपे होते हैं : अब वह सीधा खड़ा नहीं हो सकता है, उसके काले बाल सफेद हो चुके होते हैं, जो आँखें कभी चमकदार थीं, साफ देख सकती थीं, वे आँखें धुँधली हो गई हैं, और चिकनी तथा कोमल त्वचा पर झुर्रियाँ और धब्बे पड़ गए हैं। उसकी सुनने की शक्ति कमज़ोर हो गई है, उसके दाँत ढीले हो कर गिर गए हैं, उसकी प्रतिक्रियाएँ धीमी हो गई हैं, वह तेज़ गति से नहीं चल पाता है...। इस मोड़ पर, उसने अपनी जवानी के जोशीले दिनों को अंतिम विदाई दे दी है और अपने जीवन की संध्या में प्रवेश कर लिया है : बुढ़ापा। अब, वह मृत्यु का सामना करेगा, जो किसी मनुष्य के जीवन का अंतिम मोड़ है।

1. मनुष्य के जीवन और मृत्यु पर केवल सृजनकर्ता का ही सामर्थ्य है

यदि किसी व्यक्ति का जन्म उसके पिछले जीवन पर नियत था, तो उसकी मृत्यु उस नियति के अंत को चिह्नित करती है। यदि किसी का जन्म इस जीवन में उसके ध्येय की शुरुआत है, तो उसकी मृत्यु उसके उस ध्येय के अंत को चिह्नित करती है। चूँकि सृजनकर्ता ने किसी व्यक्ति के जन्म के लिए परिस्थितियों का एक निश्चित समुच्चय निर्धारित किया है, इसलिए स्पष्ट है कि उसने उसकी मृत्यु के लिए भी परिस्थितियों के एक निश्चित समुच्चय की व्यवस्था की है। दूसरे शब्दों में, कोई भी व्यक्ति संयोग से पैदा नहीं होता है, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु अकस्मात नहीं होती है, और जन्म और मृत्यु दोनों ही अनिवार्य रूप से उसके पिछले और वर्तमान जीवन से जुड़े हैं। किसी व्यक्ति की जन्म और मृत्यु की परिस्थितियाँ दोनों ही सृजनकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित की जाती हैं; यह व्यक्ति की नियति है, और व्यक्ति का भाग्य है। चूँकि किसी व्यक्ति के जन्म के बारे में बहुत सारे स्पष्टीकरण होते हैं, वैसे ही यह भी सच है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु भी विशेष परिस्थितियों के एक भिन्न समुच्चय में होगी। लोगों के अलग-अलग जीवनकाल और उनकी मृत्यु होने के अलग-अलग तरीके और समय होने का यही कारण है। कुछ लोग ताकतवर और स्वस्थ होते हैं, फिर भी जल्दी मर जाते हैं; कुछ लोग कमज़ोर और बीमार होते हैं, फिर भी बूढ़े होने तक जीवित रहते हैं, और बिना कोई कष्ट पाए मर जाते हैं। कुछ की मृत्यु अस्वाभाविक कारणों से होती है, और कुछ की मृत्यु स्वाभाविक कारणों से होती है। कुछ का जीवन उनके घर से दूर समाप्त होता है, कुछ अपने प्रियजनों के साथ उनके सानिध्य में आखिरी साँस लेते हैं। कुछ आसमान में मरते हैं, कुछ धरती के नीचे। कुछ पानी के अन्दर डूब जाते हैं, कुछ आपदाओं में अपनी जान गँवा देते हैं। कुछ सुबह मरते हैं, कुछ रात्रि में। ... हर कोई एक शानदार जन्म, एक बहुत बढ़िया ज़िन्दगी, और एक गौरवशाली मृत्यु की कामना करता है, परन्तु कोई भी व्यक्ति अपनी नियति से परे नहीं जा सकता है, कोई भी सृजनकर्ता की संप्रभुता से बचकर नहीं निकल सकता है। यह मनुष्य का भाग्य है। मनुष्य अपने भविष्य के लिए अनगिनत योजनाएँ बना सकता है, परन्तु कोई भी अपने जन्म के तरीके और समय की और संसार से अपने प्रस्थान की योजना नहीं बना सकता है। यद्यपि लोग मृत्यु को टालने और उसको रोकने की भरसक कोशिश करते हैं, फिर भी, उनके जाने बिना, मृत्यु चुपचाप पास आ जाती है। कोई नहीं जानता कि वह कब मरेगा या वह कैसे मरेगा, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानता कि वह कहाँ मरेगा। स्पष्ट रूप से, न तो मानवजाति के पास जीवन और मृत्यु की सामर्थ्य है, न ही प्राकृतिक संसार में किसी प्राणी के पास, केवल अद्वितीय अधिकार वाले सृजनकर्ता के पास ही यह सामर्थ्य है। मनुष्य का जीवन और उसकी मृत्यु प्राकृतिक संसार के किन्हीं नियमों का परिणाम नहीं है, बल्कि सृजनकर्ता के अधिकार की संप्रभुता का परिणाम है।

2. जो सृजनकर्ता की संप्रभुता को नहीं जानता है वह मृत्यु के भय से त्रस्त रहेगा

वृद्धावस्था में पहुँचने के बाद व्यक्ति परिवार का भरण-पोषण करने या जीवन में अपनी उच्च महत्वाकांक्षाओं को पूरा न कर पाने की चुनौती का सामना नहीं करता है, बल्कि उसके सामने चुनौती होती है कि वह किस प्रकार अपने जीवन को अलविदा कहे, किस प्रकार अपने जीवन के अंत का सामना करे, किस प्रकार अपने जीवन की सज़ा को खत्म करने के लिए विराम लगाए। हालाँकि ऊपरी तौर पर ऐसा प्रतीत होता है कि लोग मृत्यु पर कम ही ध्यान देते हैं, फिर भी कोई इस विषय के बारे में जानने से बच नहीं सकता, क्योंकि किसी को भी नहीं पता कि मृत्यु के पार कोई और संसार है भी या नहीं, एक ऐसा संसार जिसके बारे में मनुष्य सोच नहीं सकता, या जिसका एहसास नहीं कर सकता, एक ऐसा संसार जिसके बारे में कोई कुछ भी नहीं जानता है। इसी कारण आमने-सामने मृत्यु का सामना करने से लोग डरते हैं, वे इसका उस तरह से सामना करने से डरते हैं जैसा उनको करना चाहिए; बल्कि वे इस विषय को टालने की भरसक कोशिश करते हैं। और इसलिए यह प्रत्येक व्यक्ति में मृत्यु का भय भर देता है, और जीवन के इस अनिवार्य सच पर रहस्य का परदा डालते हुए प्रत्येक व्यक्ति के हृदय पर लगातार बने रहने वाली छाया डाल देता है।

जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके शरीर का क्षय हो रहा है, जब उसे आभास होता है कि वह मृत्यु के करीब पहुँच रहा है, तो उसे एक अस्पष्ट ख़ौफ़, एक अवर्णनीय भय जकड़ लेता है। मृत्यु के भय से वह और भी अधिक अकेला और असहाय महसूस करने लगता है, और इस मोड़ पर वह स्वयं से पूछता है : मनुष्य कहाँ से आया था? मनुष्य कहाँ जा रहा है? क्या मनुष्य जब मरता है तो उसका पूरा जीवन तेज़ी से उसके सामने से गुज़र जाता है? क्या यही वह समय है जो मनुष्य के जीवन के अंत को चिह्नित करता है? अंत में, जीवन का क्या अर्थ है? आख़िरकार, जीवन का मूल्य क्या है? क्या यह प्रसिद्धि और सौभाग्य पाना है? क्या यह परिवार को बढ़ाना है? ... चाहे इन विशेष प्रश्नों के बारे में किसी ने सोचा हो या नहीं, चाहे कोई मृत्यु से कितना भी डरता हो, प्रत्येक व्यक्ति के हृदय की गहराई में हमेशा से इन रहस्यों के बारे में जानने की इच्छा रही है, जीवन को न समझ पाने का एहसास रहा है, और इनके साथ, संसार के बारे में भावुकता, उसे छोड़कर जाने की अनिच्छा समाहित होती है। कदाचित् कोई भी स्पष्ट रूप से नहीं कह सकता है कि वह क्या है जिससे मनुष्य भयभीत होता है, वह क्या है जिसकी मनुष्य तलाश करना चाहता है, वह क्या है जिसके बारे में वह भावुक होता है और वह किसे पीछे छोड़ने को अनिच्छुक होता है ...

क्योंकि लोगों को मृत्यु से डर लगता है, इसलिए वे बहुत ज्यादा चिंता करते है; क्योंकि वे मृत्यु से डरते हैं, इसलिए ऐसा बहुत कुछ है जिसे वे छोड़ नहीं पाते। जब वे मरने वाले होते हैं, तो कुछ लोग किसी न किसी बात को लेकर झल्लाते रहते हैं; वे अपने बच्चों, अपने प्रियजनों, और धन-सम्पत्ति के बारे में चिंता करते हैं, मानो चिंता करके वे उस पीड़ा और भय को मिटा सकते हैं जो मृत्यु लेकर आती है, मानो कि जीवित प्राणियों के साथ एक प्रकार की घनिष्ठता बनाए रखकर, अपनी उस लाचारी और एकाकीपन से बच सकते हैं जो मृत्यु के साथ आती है। मनुष्य के हृदय की गहराई में एक अस्पष्ट-सा भय होता है, अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का भय, कभी नीले आसमान को न देख पाने का भय, कभी इस भौतिक संसार को न देख पाने का भय। अपने प्रियजनों के साथ की अभ्यस्त, एक एकाकी आत्मा, अपनी पकड़ को ढीला करने और नितांत अकेले, एक अनजान और अपरिचित संसार में प्रस्थान नहीं करना चाहती है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III

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