परमेश्वर के दैनिक वचन | "पतरस ने यीशु को कैसे जाना" | अंश 521

पतरस के अनुभवों में एक पराकाष्ठा थी, जब उसका शरीर लगभग पूरी तरह से टूट गया था, किन्तु यीशु ने उसके भीतर प्रोत्साहन प्रदान किया। और वह उसे एक बार प्रकट हुआ। जब पतरस अत्यधिक पीड़ा में था और उसका हृदय टूट गया था, तो यीशु ने उसे निर्देश दिया: "तू पृथ्वी पर मेरे साथ था, और मैं यहाँ तेरे साथ था। और यद्यपि पहले हम स्वर्ग में एक साथ थे, यह सब कुछ आध्यात्मिक संसार के बारे में है। अब मैं आध्यात्मिक संसार में लौट आया हूँ, परन्तु तू पृथ्वी पर है। क्योंकि मैं पृथ्वी का नहीं हूँ, और यद्यपि तू भी पृथ्वी का नहीं है, किन्तु तुझे पृथ्वी पर अपना कार्य पूरा करना होगा। क्योंकि तू एक सेवक है, इसलिए तुझे अपना कर्तव्य अपनी सर्वोत्तम योग्यता से अवश्य करना चाहिए।" पतरस को यह सुनकर सांत्वना मिली कि वह परमेश्वर की ओर लौट सकता है। जब पतरस ऐसी पीड़ा में था कि वह लगभग बिस्तर पर पड़ा था, तो उसने पछतावा किया और यहाँ तक कहा: "मैं बहुत भ्रष्ट हूँ, मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हूँ।" यीशु ने उसके सामने प्रकट होकर कहा: "पतरस, क्या ऐसा हो सकता है कि तू उस संकल्प को भूल गया है जो तूने एक बार मेरे सामने लिया था? क्या तू वास्तव में वह सब कुछ भूल गया है जो मैंने कहा था? क्या तू उस संकल्प को भूल गया है जो तूने मेरे लिए किया था?" पतरस ने देखा कि यह यीशु है और वह बिस्तर से उठ गया, और यीशु ने उसे सांत्वना दी: "मैं पृथ्वी का नहीं हूँ, मैं तुझे पहले ही कह चुका हूँ—यह तुझे अवश्य समझ जाना चाहिए, किन्तु क्या तू किसी और चीज को भूल गया है जो मैंने तुझे कही थी? 'तू भी पृथ्वी का नहीं है, संसार का नहीं है।' अभी यहाँ पर जो कार्य उसे करने की तुझे आवश्यकता है, तू इस तरह से दुःखी नहीं हो सकता है, तू इस तरह से पीड़ित नहीं हो सकता है। हालाँकि मनुष्य और परमेश्वर एक ही संसार में एक साथ नहीं रह सकते हैं, मेरे पास मेरा कार्य है और तेरे पास तेरा कार्य है, और एक दिन जब तेरा कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हम दोनों एक क्षेत्र में एक साथ रहेंगे, और मैं हमेशा मेरे साथ रहने के लिए तेरी अगुवाई करूँगा।" इन वचनो को सुनने के बाद पतरस को सांत्वना मिली और वह आश्वस्त हुआ। वह जानता था कि यह पीड़ा कुछ ऐसी थी जो उसे सहन और अनुभव करनी ही थी, और वह तब से प्रेरित था। यीशु हर मुख्य समय पर उसके सामने प्रकट हुआ, उसे विशेष प्रबुद्धता और मार्गदर्शन दिया, और उसमें अत्यधिक कार्य किया। और पतरस ने सबसे अधिक किस बात का पछतावा किया? पतरस के यह कहने के तुरंत बाद कि "तू जीवित परमेश्वर का पुत्र है", यीशु ने पतरस से एक और प्रश्न पूछा (यद्यपि यह बाइबल में इस प्रकार से दर्ज नहीं है), और वह प्रश्न यह था: "पतरस! क्या तूने कभी मुझे प्रेम किया है?" पतरस समझ गया कि क्या अभिप्राय है और, उसने कहाः "प्रभु! मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किन्तु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुझे कभी भी प्रेम नहीं किया।" फिर यीशु ने कहा, "यदि लोग स्वर्गिक परमेश्वर से प्रेम नहीं करते हैं, तो वे पृथ्वी पर पुत्र को कैसे प्रेम कर सकते हैं? यदि लोग परमपिता परमेश्वर द्वारा भेजे गए पुत्र को प्रेम नहीं करते हैं, तो वे स्वर्गिक पिता से कैसे प्रेम कर सकते हैं? यदि लोग वास्तव में पृथ्वी पर पुत्र से प्रेम करते हैं, तो फिर वे स्वर्गिक पिता को वास्तव में प्रेम करते हैं।" जब पतरस ने इन वचनों को सुना तो उसने अपनी कमी को महसूस किया। वह हमेशा अपने वचनों पर आंसुओं के साथ पछतावा महसूस करता था "मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया, किन्तु मैंने तेरे से कभी भी प्रेम नहीं किया है।" यीशु के पुनर्जीवन और स्वर्गारोहण के बाद उसने उन पर और भी अधिक पछतावा और दुःख महसूस किया। अपने अतीत के कार्यों को अपनी वर्तमान कद-काठी को देखकर, परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट न कर पाने और परमेश्वर के मानकों तक नहीं मापे जाने के कारण, हमेशा दुःख और ऋण महसूस करते हुए वह प्रायः प्रार्थना में यीशु के पास आया करता था। ये मामले उसका सबसे ज्यादा बोझ बन गए। उसने कहा, "एक दिन मैं तुझे वह सब अर्पित कर दूँगा जो मेरे पास है और सब कुछ जो मैं हूँ, मैं तुझे वह दूँगा जो सबसे अधिक मूल्यवान है।" उसने कहा, "परमेश्वर! मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे जीवन का कुछ भी मूल्य नहीं है, और मेरे शरीर का कुछ भी मूल्य नहीं है। मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे मन में तेरे लिए विश्वास है और हृदय में तेरे लिए प्रेम है; ये ही दो चीज़ें मेरे पास तुझे देने के लिए हैं, इसके अलावा और कुछ नहीं है।" पतरस यीशु के वचनों से बहुत प्रोत्साहित हुआ, क्योंकि यीशु के क्रूसीकरण से पहले उसने उससे कहा थाः "मैं इस संसार का नहीं हूँ, और तू भी इस संसार का नहीं है।" बाद में, जब पतरस एक अत्यधिक पीड़ा वाली स्थिति तक पहुँचा, तो यीशु ने उसे स्मरण दिलायाः "पतरस, क्या तू भूल गया है? मैं इस संसार का नहीं हूँ, और यह सिर्फ मेरे कार्य के लिए है कि मैं पहले चला गया। तू भी इस संसार का नहीं है, क्या तू भूल गया है? मैंने तुझे दो बार बताया है, क्या तुझे याद नहीं है?" पतरस ने उसे सुना और कहाः "मैं नहीं भूला हूँ!" तब यीशु ने कहाः "तूने एक बार मेरे साथ स्वर्ग में इकट्ठा हो कर एक अच्छा समय और एक समयावधि मेरे पक्ष में हो कर व्यतीत की है। तू मुझे याद करता है और मैं तुझे याद करता हूँ। यद्यपि प्राणी मेरी दृष्टि में उल्लेख किए जाने के योग्य नहीं हैं, तब भी मैं कैसे किसी ऐसे को प्रेम नहीं कर सकता हूँ जो निर्दोष और प्यार करने योग्य है? क्या तू मेरी प्रतिज्ञा को भूल गया है? तुझे धरती पर मेरे आदेश को अवश्य स्वीकार करना चाहिए; तुझे वह कार्य अवश्य पूरा करना चाहिए जो मैंने तुझे सौंपा है। एक दिन मैं तुझे अपनी ओर करने के लिए निश्चित रूप से तेरी अगुआई करूँगा" इसे सुनने के बाद, पतरस और भी अधिक उत्साहित हो गया तथा उसे और भी अधिक प्रेरणा मिली, इतनी कि जब वह सलीब पर था, वह यह कहने में समर्थ थाः "परमेश्वर! मैं तुझे पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकता! यहाँ तक कि यदि तू मुझे मरने के लिए कहे, तब भी मैं तुझे पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकता हूँ! तू जहाँ कहीं भी मेरी आत्मा को भेजे, चाहे तू अपनी प्रतिज्ञाओं को पूरा करे या न करे, इसके बाद तू चाहे जो कुछ भी करे, मैं तुझे प्यार करता हूँ और तुझ पर विश्वास करता हूँ।" उसने जो थामे रखा वह था उसका विश्वास और सच्चा प्रेम।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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