परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति बनाए रखनी चाहिए" | अंश 469

यदि लोगों में आत्मविश्वास नहीं है, तो उनके लिए इस मार्ग पर चलते रहना आसान नहीं है। अब हर कोई देख सकता है कि परमेश्वर का कार्य लोगों की अवधारणाओं के अनुरूप जरा सा भी नहीं है। परमेश्वर ने इतना अधिक कार्य किया है और इतने सारे वचनों को कहा है, जो इंसानी अवधारणाओं से पूर्णत: भिन्न हैं। इसलिए लोगों में उस चीज के साथ खड़े होने का आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति होनी चाहिए, जिसे वे पहले ही देख चुके हैं और अपने अनुभवों से प्राप्त कर चुके हैं। भले ही परमेश्वर लोगों में कुछ भी कार्य करे, उन्हें वह बनाए रखना चाहिए जो उनके पास है, उन्हें परमेश्वर के सामने ईमानदार होना चाहिए, और उसके प्रति बिलकुल अंत तक समर्पित रहना चाहिए। यह मनुष्य का कर्तव्य है। लोगों को जो करना चाहिए, उसे उन्हें बनाए रखना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास के लिए उसका आज्ञापालन करना और उसके कार्य का अनुभव करना आवश्यक है। परमेश्वर ने बहुत कार्य किया है—यह कहा जा सकता है कि लोगों के लिए यह सब पूर्ण बनाना, शुद्धिकरण, और इससे भी बढ़कर, ताड़ना है। परमेश्वर के कार्य का एक भी चरण ऐसा नहीं रहा है, जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप रहा हो; लोगों ने जिस चीज का आनंद लिया है, वह है परमेश्वर के कठोर वचन। जब परमेश्वर आता है, तो लोगों को उसके प्रताप और उसके कोप का आनंद लेना चाहिए। हालाँकि उसके वचन चाहे कितने ही कठोर क्यों न हों, वह मानवजाति को बचाने और पूर्ण करने के लिए आता है। प्राणियों के रूप में लोगों को वे कर्तव्य पूरे करने चाहिए, जो उनसे अपेक्षित हैं, और शुद्धिकरण के बीच परमेश्वर के लिए गवाह बनना चाहिए। हर परीक्षण में उन्हें उस गवाही पर कायम रहना चाहिए, जो कि उन्हें देनी चाहिए, और परमेश्वर के लिए उन्हें ऐसा ज़बरदस्त तरीके से करना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति विजेता होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हें शुद्ध करे, तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो और परमेश्वर पर से कभी विश्वास नहीं खोते। तुम वह करते हो, जो मनुष्य को करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से इसी की अपेक्षा करता है, और मनुष्य का दिल पूरी तरह से उसकी ओर लौटने तथा हर पल उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होना चाहिए। ऐसा होता है विजेता। जिन लोगों का उल्लेख परमेश्वर "विजेताओं" के रूप में करता है, वे लोग वे होते हैं, जो तब भी गवाह बनने और परमेश्वर के प्रति अपना विश्वास और भक्ति बनाए रखने में सक्षम होते हैं, जब वे शैतान के प्रभाव और उसकी घेरेबंदी में होते हैं, अर्थात् जब वे स्वयं को अंधकार की शक्तियों के बीच पाते हैं। यदि तुम, चाहे कुछ भी हो जाए, फिर भी परमेश्वर के समक्ष पवित्र दिल और उसके लिए अपना वास्तविक प्यार बनाए रखने में सक्षम रहते हो, तो तुम परमेश्वर के सामने गवाह बनते हो, और इसी को परमेश्वर "विजेता" होने के रूप में संदर्भित करता है। यदि परमेश्वर द्वारा तुम्हें आशीष दिए जाने पर तुम्हारा अनुसरण उत्कृष्ट होता है, लेकिन उसके आशीष न मिलने पर तुम पीछे हट जाते हो, तो क्या यह पवित्रता है? चूँकि तुम निश्चित हो कि यह रास्ता सही है, इसलिए तुम्हें अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखनी चाहिए। चूँकि तुमने देख लिया है कि स्वयं परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए पृथ्वी पर आया है, इसलिए तुम्हें पूरी तरह से अपना दिल उसे समर्पित कर देना चाहिए। भले ही वह कुछ भी करे, यहाँ तक कि बिलकुल अंत में तुम्हारे लिए एक प्रतिकूल परिणाम ही क्यों न निर्धारित कर दे, अगर तुम फिर भी उसका अनुसरण कर सकते हो, तो यह परमेश्वर के सामने अपनी पवित्रता बनाए रखना है। परमेश्वर को एक पवित्र आध्यात्मिक देह और एक शुद्ध कुँवारापन अर्पित करने का अर्थ है परमेश्वर के सामने ईमानदार दिल बनाए रखना। मनुष्य के लिए ईमानदारी ही पवित्रता है, और परमेश्वर के प्रति ईमानदार होने में सक्षम होना ही पवित्रता बनाए रखना है। यही वह चीज़ है, जिसे तुम्हें अभ्यास में लाना चाहिए। जब तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, तब तुम प्रार्थना करो; जब तुम्हें संगति में एक-साथ इकट्ठे होना चाहिए, तो तुम इकट्ठे हो जाओ; जब तुम्हें भजन गाने चाहिए, तो तुम भजन गाओ; और जब तुम्हें शरीर को त्यागना चाहिए, तो तुम शरीर को त्याग दो। जब तुम अपना कर्तव्य करते हो, तो तुम उसमें गड़बड़ नहीं करते; जब तुम्हें परीक्षणों का सामना करना पड़ता है, तो तुम मजबूती से खड़े रहते हो। यह परमेश्वर के प्रति भक्ति है। लोगों को जो करना चाहिए, यदि तुम वह बनाए नहीं रखते, तो तुम्हारी पिछली सभी पीड़ाएँ और संकल्प व्यर्थ रहे हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

इंसान को जो करना है उस पर उसे अटल रहना चाहिये

शुद्ध कुँवारी और पवित्र आत्मिक देह के समर्पण के मायने हैं, सच्चे हृदय को परमेश्वर के सम्मुख रखना। इंसान के लिये, निर्मलता है परमेश्वर के सामने सच्चा हो पाना। एक ही शर्त है पवित्र आत्मा के कार्य की: अपने पूरे दिल से खोजना चाहिये इंसान को, शक की नज़रों से न देखे परमेश्वर के काम को, निभाए हर वक्त अपने फ़र्ज़ को। हासिल किया जा सकता है सिर्फ इसी तरह, पवित्र आत्मा के काम को। यही सच्चा रास्ता है, चूँकि ये यकीन है तुम्हें, अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिये तुम्हें, बनाए रखनी चाहिये अपनी भक्ति परमेश्वर के लिये। चूँकि देखा है तुमने, परमेश्वर स्वयं आया है धरती पर पूर्ण करने तुम्हें, तुम्हें अपना हृदय पूरी तरह से दे देना चाहिये। वो कुछ भी करे चाहे, तुम्हारा परिणाम बुरा हो चाहे, फिर भी कर सकते हो तुम उसका अनुसरण सदा। यही है बनाए रखना निर्मलता।

परमेश्वर के कार्य के हर कदम में, अगाध आस्था होनी चाहिये इंसान की, और खोजना चाहिये उसे परमेश्वर के सामने। सिर्फ़ अनुभव के ज़रिये, परमेश्वर की प्रियता को पा सकता है इंसान, कैसे कार्य करता है पवित्र आत्मा, देख सकता है इंसान। अनुभव नहीं करते हो तुम अगर, अपने मार्ग को इसके ज़रिये महसूस नहीं करते हो तुम अगर, तो कुछ हासिल नहीं कर पाओगे, नहीं खोजते हो तुम अगर। चूँकि अपने अनुभव से ही तुम परमेश्वर के कर्मों को देख पाओगे, कितना अद्भुत है, कितना अथाह है वो, ये देख पाओगे। यही सच्चा रास्ता है, चूँकि ये यकीन है तुम्हें, अंत तक इसका अनुसरण करना चाहिये तुम्हें, बनाए रखनी चाहिये अपनी भक्ति परमेश्वर के लिये। चूँकि देखा है तुमने, परमेश्वर स्वयं आया है धरती पर पूर्ण करने तुम्हें, तुम्हें अपना हृदय पूरी तरह से दे देना चाहिये। वो कुछ भी करे चाहे, तुम्हारा परिणाम बुरा हो चाहे, फिर भी कर सकते हो तुम उसका अनुसरण सदा। यही है बनाए रखना निर्मलता। एक प्राणी के फ़र्ज़ को पूरा करो, परिणाम चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर को जानने की खोज करो, और उसे प्रेम करो, जैसे चाहे परमेश्वर तुम से बर्ताव करे, कभी शिकायत न करो।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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