परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है" | अंश 393

परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है" | अंश 393

0 |14 सितम्बर, 2020

एक सामान्य समस्या जो सभी मनुष्यों में पाई जाती है कि वे सत्य को समझते तो हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं ला सकते हैं। एक तथ्य यह है कि मनुष्य मूल्य चुकाने के लिए तैयार नहीं है, और दूसरा यह है कि मनुष्य की सूझ-बूझ बहुत अपर्याप्त है; वह अतीत की उन कई कठिनाईयों की उपेक्षा करने में असमर्थ है जो वास्तविक जीवन में विद्यमान हैं और नहीं जानता है कि कैसे उन्हें उचित रूप से अभ्यास करे। चूँकि मनुष्य के पास सत्य का बहुत कम अनुभव, कमज़ोर क्षमता, और सत्य की सीमित समझ है, इसलिए वह उन कठिनाईयों को हल करने में असमर्थ है जिनका सामना वह जीवन में करता है। वह परमेश्वर में अपने विश्वास के लिए सिर्फ़ दिखावटी प्रेम कर सकता है, मगर परमेश्वर को अपने रोज़मर्रा के जीवन में लाने में असमर्थ है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर परमेश्वर है, और जीवन जीवन है, मानो कि मनुष्य का अपने जीवन में परमेश्वर के साथ कोई भी सम्बंध नहीं है। यही सभी मनुष्य मानते हैं। परमेश्वर में इस तरह का विश्वास उसके द्वारा मनुष्य को वास्तव में प्राप्त किए जाने और पूर्ण बनाए जाने की अनुमति नहीं देगा। वास्तव में, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर का वचन अधूरा है, बल्कि मनुष्य की उसके वचन को ग्रहण करने की योग्यता अपर्याप्त है। यह कहा जा सकता है कि लगभग कोई भी मनुष्य वैसे कार्यकलाप नहीं करता है जैसा कि मूलरूप से परमेश्वर के द्वारा अपेक्षा की गई थी। बल्कि, परमेश्वर में उनका विश्वास उनके अपने इरादों, स्थापित धार्मिक अवधारणाओं, और प्रथाओं के आधार पर है। कुछ ही लोग ऐसे हैं जो परमेश्वर के वचन की स्वीकृति के बाद एक रूपांतरण से गुज़रते हैं और उसकी इच्छा के अनुसार कार्य करना शुरू करते हैं। बल्कि, वे अपनी ग़लत धारणाओं में डटे रहते हैं। जब मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करता है, तो वह धर्म के पारंपरिक नियमों के आधार पर करता है, और दूसरों के साथ पूर्णतः जीवन के अपने स्वयं के दर्शनशास्त्र के आधार पर रहता और अन्योन्यक्रिया करता है। हर दस लोगों में से नौ के बारे में ऐसा ही मामला है। ऐसे लोग बहुत ही कम हैं जो परमेश्वर में विश्वास शुरू करने के बाद एक अन्य योजना बनाते हैं और एक नई शुरूआत करते हैं। कोई भी परमेश्वर के वचन को सत्य के रूप में नहीं मानता है या अभ्यास में नहीं लाता है।

उदाहरण के लिए, यीशु पर विश्वास को लें। चाहे कोई मनुष्य विश्वास में नौसिखिया था या फिर एक लम्बे समय से विश्वास में रहा था, सभी बस उन प्रतिभाओं को उपयोग में लाए जो उनके पास थी और जो कुछ भी कौशल उनमें थे उनका प्रदर्शन किया। मनुष्यों ने बस इन्हीं तीन शब्दों "परमेश्वर में विश्वास" को अपने आम जीवन में जोड़ दिया, मगर अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं किए, और परमेश्वर में उनका विश्वास थोड़ा सा भी नहीं बढ़ा। मनुष्य की तलाश न तो उत्साही थी और न ही निरुत्साही। उसने यह नहीं कहा कि उसने विश्वास नहीं किया, मगर न ही उसने अपने आप को पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित किया। उसने कभी भी परमेश्वर को सचुमच में प्रेम नहीं किया या परमेश्वर की आज्ञा का पालन नहीं किया। परमेश्वर में उसका विश्वास सच्चा और झूठा दोनों था, और उसने आँखें मूँद ली और अपने विश्वास के अभ्यास में ईमानदार नहीं था। वह बिल्कुल शुरू से अपनी मृत्यु के समय तक एक संभ्रम की स्थिति में बना रहा। इसका क्या अर्थ है? आज, आपको सही रास्ते पर नियत अवश्य होना चाहिए क्योंकि तुम व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हो। परमेश्वर में विश्वास करके, तुम्हें सिर्फ़ आशीषों को ही नहीं खोजना चाहिए, बल्कि परमेश्वर को प्रेम करने और परमेश्वर को जानने की कोशिश करनी चाहिए। इस प्रबुद्धता और तुम्हारी स्वयं की खोज के माध्यम से, तुम उसके वचन को खा और पी सकते हो, परमेश्वर के बारे में एक सच्ची समझ को विकसित कर सकते हो, और परमेश्वर के लिए एक सच्चा प्रेम रख सकते हो जो तुम्हारे हृदय से आता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम सबसे अधिक सच्चा है, इतना कि उसके लिए तुम्हारे प्रेम को कोई नष्ट नहीं कर सकता है या उसके लिए तुम्हारे प्रेम के मार्ग में कोई खड़ा नहीं हो सकता है। तब तुम परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर होते हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर से संबंध रखते हो, क्योंकि तुम्हारे हृदय पर परमेश्वर द्वारा कब्जा कर लिया गया है और तब दूसरा कोई तुम पर कब्जा नहीं कर सकता है। तुम्हारे अनुभव, तुमने जो मूल्य चुकाया है, और परमेश्वर के कार्य के कारण, तुम परमेश्वर के लिए एक स्वेच्छापूर्ण प्रेम को विकसित करने में समर्थ हो जाते हो। फिर तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त कर दिए जाते हो और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीते हो। सिर्फ़ जब तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़ कर मुक्त हो जाते हो तभी तुमने परमेश्वर प्राप्त कर लिया समझे जा सकते हो। परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास में, तुम्हें इस लक्ष्य को अवश्य खोजना चाहिए। यह तुम लोगों में से हर एक का कर्तव्य है। किसी को भी चीज़े जैसे हैं उनसे आत्मसंतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के कार्य के प्रति दोहरे मन वाले नहीं हो सकते या इसे हल्के में नहीं मान सकते हो। तुम लोगों को हर तरह से और हर समय परमेश्वर के बारे में विचार करना चाहिए, और उसके वास्ते सब कुछ करना चाहिए। और जब तुम लोग कुछ बोलते या करते हो, तो तुम लोगों को परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। सिर्फ़ यही परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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