परमेश्वर के दैनिक वचन | "एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के विषय में" | अंश 414

परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन का होना आवश्यक है, जो कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और वास्तविकता में प्रवेश करने का आधार है। क्या तुम सबकी प्रार्थनाओं परमेश्वर के समीप आने, भजन-गायन, स्तुति, ध्यान और परमेश्वर के वचनों पर मनन-चिंतन का समस्त अभ्यास "सामान्य आध्यात्मिक जीवन" के बराबर है? ऐसा नहीं लगता कि तुम लोगों में से कोई भी इसका उत्तर जानता है। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्रार्थना करने, भजन गाने, कलीसियाई जीवन में भाग लेने और परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने जैसे अभ्यासों तक सीमित नहीं है। बल्कि, इसमें एक नया और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना शामिल है। जो बात मायने रखती है वो यह नहीं है कि तुम अभ्यास कैसे करते हो, बल्कि यह है कि तुम्हारे अभ्यास का परिणाम क्या होता है। अधिकांश लोगों का मानना है कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में आवश्यक रूप से प्रार्थना करना, भजन गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना या उसके वचनों पर मनन-चिंतन करना शामिल है, भले ही ऐसे अभ्यासों का वास्तव में कोई प्रभाव हो या न हो, चाहे वे सच्ची समझ तक ले जाएँ या न ले जाएँ। ये लोग सतही प्रक्रियाओं के परिणामों के बारे में सोचे बिना उन पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे ऐसे लोग हैं जो धार्मिक अनुष्ठानों में जीते हैं, वे ऐसे लोग नहीं हैं जो कलीसिया के भीतर रहते हैं, वे राज्य के लोग तो बिलकुल नहीं हैं। उनकी प्रार्थनाएँ, भजन-गायन और परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, सभी सिर्फ नियम-पालन हैं, जो प्रचलन में है उसके साथ बने रहने के लिए मजबूरी में किए जाने वाले काम हैं। ये अपनी इच्छा से या हृदय से नहीं किए जाते हैं। ये लोग कितनी भी प्रार्थना करें या गाएँ, उनके प्रयास निष्फल होंगे, क्योंकि वे जिनका अभ्यास करते हैं, वे केवल धर्म के नियम और अनुष्ठान हैं; वे वास्तव में परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर रहे हैं। वे अभ्यास किस तरह करते हैं, इस बात का बतंगड़ बनाने में ही उनका ध्यान लगा होता है और वे परमेश्वर के वचनों के साथ उन नियमों जैसा व्यवहार करते हैं जिनका पालन किया ही जाना चाहिए। ऐसे लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं ला रहे हैं; वे सिर्फ देह को तृप्त कर रहे हैं और दूसरे लोगों को दिखाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। धर्म के ये नियम और अनुष्ठान सभी मूल रूप से मानवीय हैं; वे परमेश्वर से नहीं आते हैं। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता है, न ही वह किसी व्यवस्था के अधीन है। बल्कि, वह हर दिन नई चीज़ें करता है, व्यवहारिक काम पूरा करता है। थ्री-सेल्फ कलीसिया के लोग, हर दिन सुबह की प्रार्थना सभा में शामिल होने, शाम की प्रार्थना और भोजन से पहले आभार की प्रार्थना अर्पित करने, सभी चीज़ों में धन्यवाद देने जैसे अभ्यासों तक सीमित रहते हैं—वे इस तरह जितना भी कार्य करें और चाहे जितने लंबे समय तक ऐसा करें, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जब लोग नियमों के बीच रहते हैं और अपने हृदय अभ्यास के तरीकों में ही उलझाए रखते हैं, तो पवित्र आत्मा काम नहीं कर सकता, क्योंकि उनके हृदयों पर नियमों और मानवीय धारणाओं का कब्जा है। इस प्रकार, परमेश्वर हस्तक्षेप करने और उन पर काम करने में असमर्थ है, और वे केवल व्यवस्थाओं के नियंत्रण में जीते रह सकते हैं। ऐसे लोग परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में सदा के लिए असमर्थ होते हैं।

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन परमेश्वर के सामने जिया जाने वाला जीवन है। प्रार्थना करते समय, एक व्यक्ति परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत कर सकता है, और प्रार्थना के माध्यम से वह पवित्र आत्मा के प्रबोधन की तलाश कर सकता है, परमेश्वर के वचनों को जान सकता है और परमेश्वर की इच्छा को समझ सकता है। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने से लोग उसके मौजूदा कार्य के बारे में अधिक स्पष्ट और अधिक गहन समझ प्राप्त कर सकते हैं। वे अभ्यास का एक नया मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं, और वे पुराने मार्ग से चिपके नहीं रहेंगे; जिसका वे अभ्यास करते हैं, वह सब जीवन में विकास हासिल करने के लिए होगा। जहाँ तक प्रार्थना की बात है, वह कुछ अच्छे लगने वाले शब्द बोलना या यह बताने के लिए तुम परमेश्वर के कितने ऋणी हो, उसके सामने फूट-फूटकर रोना नहीं है; बल्कि इसके बजाय इसका उद्देश्य, आत्मा के उपयोग में अपने आपको प्रशिक्षित करना है, परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत होने देना है, सभी मामलों में परमेश्वर के वचनों से मार्गदर्शन लेने के लिए स्वयं को प्रशिक्षित करना है, ताकि व्यक्ति का हृदय प्रतिदिन नई रोशनी की ओर आकर्षित हो सके, और वह निष्क्रिय या आलसी न हो और परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने के सही मार्ग पर कदम रखे। आजकल अधिकांश लोग अभ्यास के तरीकों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन वे यह सब सत्य का अनुसरण करने और जीवन के विकास को प्राप्त करने के लिए नहीं करते हैं। यहीं पर वे भटक जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो नई रोशनी प्राप्त करने में सक्षम हैं, लेकिन उनके अभ्यास के तरीके नहीं बदलते हैं। वे परमेश्वर के आज के वचनों को प्राप्त करने की इच्छा रखते हुए अपनी पुरानी धर्म-संबंधी धारणाओं को अपने साथ लाते हैं, इसलिए वे जो प्राप्त करते हैं वह अभी भी धर्म-संबंधी धारणाओं से रंगे सिद्धांत हैं; वे आज का प्रकाश प्राप्त कर ही नहीं रहे हैं। नतीजतन, उनके अभ्यास दागदार हैं; नए खोल में लिपटे वही पुराने अभ्यास हैं। वे कितने भी अच्छे ढंग से अभ्यास करें, वे फिर भी ढोंगी ही हैं। परमेश्वर हर दिन नई चीजें करने में लोगों की अगुवाआई करता है, माँग करता है कि प्रत्येक दिन वे नई अंतर्दृष्टि और समझ हासिल करें, और अपेक्षा करता है कि वे पुराने ढंग के और दोहराव करने वाले न हों। अगर तुमने कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास किया है, लेकिन फिर भी तुम्हारे अभ्यास के तरीके बिलकुल नहीं बदले हैं, अगर तुम अभी भी ईर्ष्यालु हो और बाहरी मामलों में ही उलझे हुए हो, अभी भी तुम्हारे पास परमेश्वर के वचनों का आनंद लेने के वास्ते उसके सामने लाने के लिए एक शांत हृदय नहीं है तो तुम कुछ भी नहीं प्राप्त करोगे। जब परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने की बात आती है, तब यदि तुम अलग ढंग से योजना नहीं बनाते, अपने अभ्यास के लिए नए तरीके नहीं अपनाते और किसी नई समझ को पाने की कोशिश नहीं करते, बल्कि अभ्यास के अपने तरीके को बदले बिना, पुराने से चिपके रहते हो और केवल सीमित मात्रा में नया प्रकाश प्राप्त करते हो, तो तुम्हारे जैसे लोग केवल नाम के लिए इस धारा में हैं; वास्तविकता में, वे मज़हबी फरीसी हैं जो पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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