परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 169

30 अक्टूबर, 2021

परमेश्वर ने वह सब-कुछ बनाया जिसका अस्तित्व है, और वह हर उस चीज का संप्रभु है जो मौजूद है; वह इन सबका प्रबंधन करता है और इन सबको पोषण प्रदान करता है, और सभी चीजों के भीतर, वह हर मौजूद चीज के हर वचन और कार्रवाई को देखता और जाँचता है। इसी तरह परमेश्वर मानव-जीवन के हर कोने को भी देखता और जाँचता है। अतः परमेश्वर अपनी सृष्टि के अंतर्गत मौजूद हर चीज़ का हर विवरण अंतरंग रूप से जानता है; हर चीज़ की कार्यप्रणाली, उसकी प्रकृति और उसके जीवित रहने के नियमों से लेकर उसके जीवन के महत्त्व और उसके अस्तित्व के मूल्य तक, परमेश्वर को यह सब समग्र रूप से ज्ञात है। परमेश्वर ने सब चीज़ों को बनाया—तुम लोग क्या सोचते हो कि उसे उन नियमों का अध्ययन करने की ज़रूरत है, जो उन्हें नियंत्रित करते हैं? क्या उनके बारे में जानने-समझने के लिए परमेश्वर को मानवीय ज्ञान या विज्ञान को पढ़ने की ज़रूरत है? (नहीं।) क्या मनुष्यों में कोई ऐसा है, जिसके पास सभी चीज़ों को समझने की वैसी विद्वत्ता और ज्ञान है, जैसा परमेश्वर के पास है? नहीं है ना? क्या कोई खगोलशास्त्री या जीव-विज्ञानी है, जो वास्तव में उन नियमों को समझता है, जिनके द्वारा सभी चीज़ें जीवित रहती और बढ़ती हैं? क्या वे वास्तव में हर चीज़ के अस्तित्व के मूल्य को समझ सकते हैं? (नहीं, वे नहीं समझ सकते।) ऐसा इसलिए है, क्योंकि सभी चीज़ों को परमेश्वर द्वारा बनाया गया था, और मनुष्य चाहे जितना भी ज्यादा और जितनी भी गहराई से इस ज्ञान का अध्ययन कर लें, या जितने भी लंबे समय तक वे इसे जानने का प्रयास कर लें, वे कभी भी परमेश्वर के द्वारा बनाई गई सभी चीज़ों के रहस्य या उद्देश्य की थाह नहीं ले पाएँगे। क्या यह सही नहीं है? अब, हमारी अब तक की चर्चा से क्या तुम लोगों को लगता है कि तुमने "परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है" उक्ति के सही अर्थ की आंशिक समझ हासिल कर ली है? (हाँ।) मैं जानता था कि जब मैं इस विषय—परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए जीवन का स्रोत है—की चर्चा करूँगा, अनेक लोग तुरंत इस दूसरी उक्ति के बारे में सोचने लगेंगे, "परमेश्वर सत्य है, और परमेश्वर अपने वचन का प्रयोग हमें पोषण प्रदान करने के लिए करता है," लेकिन वे इस विषय के अर्थ के इस स्तर से परे कुछ नहीं सोचेंगे। कुछ लोगों को तो यह भी लग सकता है कि परमेश्वर द्वारा मनुष्य के जीवन, दैनिक खान-पान और तमाम दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति मनुष्य के लिए उसके पोषण के रूप में नहीं गिनी जाती। क्या कुछ लोग ऐसे नहीं हैं, जो इस तरह से महसूस करते हैं? फिर भी, क्या परमेश्वर के सृजन में उसका अभिप्राय स्पष्ट नहीं है—कि मानव-जाति का अस्तित्व बना रहे और वह सामान्य रूप से जीवित रहे? परमेश्वर उस परिवेश को बनाए रखता है, जिसमें लोग रहते हैं और वह उनके अस्तित्व के लिए आवश्यक सभी चीज़ों की आपूर्ति करता है। इसके अतिरिक्त, वह सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है और उनके ऊपर प्रभुत्व रखता है। इस सबसे मानव-जाति सामान्य रूप से जीवित रह पाती है, फल-फूल पाती है और बढ़ पाती है; इस तरह परमेश्वर अपनी बनाई सभी चीज़ों और मानव-जाति का पोषण करता है। क्या यह सच नहीं है कि लोगों को इन चीज़ों को पहचानने एवं समझने की आवश्यकता है? शायद कुछ लोग कह सकते हैं, "यह विषय स्वयं सच्चे परमेश्वर के बारे में हमारे ज्ञान से बहुत दूर है, और हम इसे नहीं जानना चाहते, क्योंकि हम केवल रोटी के सहारे नहीं जीते, बल्कि परमेश्वर के वचन के सहारे जीते हैं।" क्या यह समझ सही है? (नहीं।) यह गलत क्यों है? यदि तुम्हें केवल परमेश्वर की कही हुई बातों का ही ज्ञान है, तो क्या तुम लोगों को परमेश्वर की पूर्ण समझ हो सकती है? यदि तुम केवल परमेश्वर के कार्य एवं उसके न्याय और ताड़ना को ही स्वीकार करते हो, तो क्या तुम्हें परमेश्वर की पूर्ण समझ हो सकती है? यदि तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव एवं परमेश्वर के अधिकार के एक छोटे-से भाग को ही जानते हो; तो क्या तुम इसे परमेश्वर की समझ हासिल करने के लिए काफी समझोगे? (नहीं।) परमेश्वर के कार्य उसके द्वारा सभी चीजों के सृजन के साथ शुरू हुए और वे आज तक जारी हैं—परमेश्वर के कार्य हर समय और हर क्षण प्रकट हैं। अगर कोई यह विश्वास करता है कि परमेश्वर सिर्फ इसलिए अस्तित्व में है, क्योंकि उसने लोगों के एक समूह को बचाने और उस पर अपना कार्य करने के लिए चुना है, और कि किसी अन्य चीज़ का परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है, और न ही उसके अधिकार, उसकी हैसियत, और उसके क्रियाकलापों से कोई लेना-देना है, तो क्या यह समझा जा सकता है कि उसे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है? जिन लोगों को यह तथाकथित "परमेश्वर का ज्ञान" है, उन्हें केवल एकतरफा समझ है, जिसके अनुसार वे परमेश्वर के कर्मों को लोगों के एक समूह तक सीमित कर देते हैं। क्या यह परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है? क्या इस तरह का ज्ञान रखने वाले लोग परमेश्वर द्वारा सभी चीज़ों की सृष्टि और उनके ऊपर उसके प्रभुत्व को नकारते नहीं हैं? कुछ लोग इस पर ध्यान नहीं देना चाहते, इसके बजाय वे सोचते हैं : "मैंने सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर का प्रभुत्व नहीं देखा है। इसका मुझसे कोई वास्ता नहीं और मैं इसे समझने की परवाह भी नहीं करता। परमेश्वर जो कुछ चाहता है वह करता है, और इसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है। मैं केवल परमेश्वर की अगुआई और उसके वचन को स्वीकार करता हूँ, ताकि मुझे परमेश्वर द्वारा बचाया और परिपूर्ण बनाया जा सके। मेरे लिए और कुछ मायने नहीं रखता। जब परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी, तब जो भी नियम उसने बनाए या सभी चीज़ों एवं मानव-जाति को पोषण प्रदान करने के लिए जो कुछ वह करता है, उसका मुझसे कोई लेना-देना नहीं है।" यह कैसी बात है? क्या यह विद्रोह का कार्य नहीं है? क्या तुम लोगों में इस तरह की समझ रखने वाला कोई है? मैं जानता हूँ कि तुममें बहुत लोग ऐसे हैं, भले ही तुम लोग ऐसा न कहो। ऐसे लकीर के फकीर लोग हर चीज़ अपने ही "आध्यात्मिक" दृष्टिकोण से देखते हैं। वे परमेश्वर को बाइबल तक सीमित कर देना चाहते हैं, उसके द्वारा कहे गए वचनों तक सीमित कर देना चाहते हैं, अक्षरश: लिखित वचन से निकाले गए अर्थ तक सीमित कर देना चाहते हैं। वे परमेश्वर को और अधिक जानने की इच्छा नहीं करते और वे नहीं चाहते कि परमेश्वर अन्य कार्य करने पर ध्यान दे। इस प्रकार की सोच बचकानी है और हद से ज्यादा धार्मिक भी है। क्या इस तरह के विचार रखने वाले लोग परमेश्वर को जान सकते हैं? उनके लिए परमेश्वर को जानना बहुत कठिन होगा। आज मैंने दो कहानियाँ सुनाई हैं, जिनमें से प्रत्येक कहानी दो भिन्न पहलुओं की ओर ध्यान खींचती है। इनके संपर्क में अभी-अभी आने पर, तुम लोगों को लग सकता है कि ये गहन या कुछ अमूर्त हैं और इन्हें जानना-समझना कठिन है। इन्हें परमेश्वर के कार्यों और स्वयं परमेश्वर से जोड़ना कठिन हो सकता है। फिर भी, परमेश्वर के सभी कार्य और वह सब, जो उसने सभी चीज़ों और संपूर्ण मानव-जाति के मध्य किया है, प्रत्येक व्यक्ति को, हर उस व्यक्ति को जो परमेश्वर को जानना चाहता है, स्पष्ट एवं सटीक रूप से जानना चाहिए। यह ज्ञान तुम्हें परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व में तुम्हारे विश्वास को निश्चितता प्रदान करेगा। यह तुम्हें परमेश्वर की बुद्धि, उसके सामर्थ्य, और उसके द्वारा सभी चीज़ों का पोषण करने के तरीके का सटीक ज्ञान भी देगा। इससे तुम लोग परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व को स्पष्ट रूप से समझ पाओगे और यह देख सकोगे कि उसका अस्तित्व काल्पनिक नहीं है, मिथक नहीं है, अस्पष्ट नहीं है, सिद्धांत नहीं है, और निश्चित रूप से एक तरह की आध्यात्मिक सांत्वना नहीं है, बल्कि एक वास्तविक अस्तित्व है। इसके अतिरिक्त, इससे लोग यह जान पाएँगे कि परमेश्वर ने हमेशा समस्त सृष्टि और मानव-जाति को पोषण प्रदान किया है; परमेश्वर इसे अपने तरीके से और अपनी लय के अनुसार करता है। तो, ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर ने सभी चीज़ें बनाईं और उन्हें नियम दिए कि वे सभी, उसके पूर्व-निर्धारण के अनुसार, अपने आवंटित कार्य करने, अपनी ज़िम्मेदारियाँ पूरी करने, और अपनी भूमिका निभाने में सक्षम हैं; उसके पूर्व-निर्धारण में हर चीज़ का मानव-जाति की सेवा में और मनुष्य के रहने के स्थान और परिवेश में अपना उपयोग है। यदि परमेश्वर ऐसा न करता और मानव-जाति के पास अपने रहने के लिए परिवेश न होता, तो उसके लिए परमेश्वर में विश्वास करना या उसका अनुसरण करना असंभव होता; यह महज एक खोखली बात होती। क्या ऐसा नहीं है?

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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