परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर" | अंश 139

परमेश्वर के दैनिक वचन | "देहधारी परमेश्वर और परमेश्वर द्वारा उपयोग किए गए लोगों के बीच महत्वपूर्ण अंतर" | अंश 139

0 |15 अगस्त, 2020

देहधारी परमेश्वर हमेशा के लिए मनुष्य के साथ नहीं रह सकता है, क्योंकि परमेश्वर के पास करने के लिए और बहुत से कार्य हैं। उसे देह में बाँधा नहीं जा सकता है; उसे जो कार्य करने की आवश्यकता है, वह करने के लिए उसे देह छोड़नी है, यद्यपि वह देह की छवि में ही उस कार्य को करता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो वह उस रूप तक पहुँचने की प्रतीक्षा नहीं करता है जो एक सामान्य व्यक्ति को मरने या मानवजाति को छोड़ कर जाने से पहले प्राप्त करना चाहिए। इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उसकी देह कितने वर्ष की है, जब उसका कार्य ख़त्म हो जाता है, तो वह चला जाता है और मनुष्य को छोड़ देता है। उसके लिए उम्र जैसी कोई चीज़ नहीं है। वह मानव जीवन काल के अनुसार अपने दिन नहीं गिनता है; इसके बजाय, अपने कार्य के चरण के अनुसार वह देह का अपना जीवन समाप्त करता है। कुछ लोग यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर को देह में आने पर एक निश्चित अवस्था तक अवश्य विकसित होना चाहिए, वयस्क होना चाहिए, वृद्धावस्था तक पहुँचना चाहिए, और केवल तभी छोड़ कर जाना चाहिए जब उसका शरीर कार्य करना बंद कर दे। यह मनुष्य की कल्पना है; परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता है। वह देह में केवल उसी कार्य को करने के लिए आता है जो उसके द्वारा किया जाना अपेक्षित है, न कि माता-पिता से जन्मे हुए मनुष्य की तरह जीवन जीने, बढ़ने, परिवार बनाने और जीविका आरंभ करने, बच्चे होने, या जीवन के उतार-चढ़ाव का अनुभव करने—सामान्य मनुष्य की सभी गतिविधियों—के लिए आता है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तो यह परमेश्वर का आत्मा है जो देह को पहनता है, देह में आता है, किन्तु परमेश्वर एक सामान्य मानव जीवन नहीं जीता है। वह केवल अपनी प्रबंधन योजना के एक भाग को पूरा करने के लिए आता है। उसके बाद वह मनुष्यजाति को छोड़ देगा। जब वह देह में आता है, तो परमेश्वर का आत्मा देह की सामान्य मानवता को सिद्ध नहीं करता है। बल्कि, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारित समय पर, दिव्यता सीधे कार्य करने के लिए आगे बढ़ती है। तब, वह सब करने जो उसे करने की आवश्यकता है और अपनी सेवकाई को पूरी तरह से पूर्ण करने के बाद, परमेश्वर के आत्मा का इस चरण का कार्य हो जाता है, उस समय इस बात पर ध्यान दिए बिना कि उसकी देह ने अपनी आयु की अवधि जी ली है अथवा नहीं देहधारी परमेश्वर का जीवन भी ख़त्म हो जाता है। कहने का अर्थ है कि, दैहिक शरीर जीवन की जिस किसी भी अवस्था तक पहुँचता है, यह पृथ्वी पर कब तक रहता है, सब कुछ पवित्रात्मा के कार्य द्वारा निश्चित किया जाता है। इसका इस बात से कोई संबंध नहीं है कि मनुष्य सामान्य मानवता के बारे में क्या समझता है। आओ हम यीशु को एक उदाहरण के रूप में लेते हैं। वह देह में साड़े तैंतीस साल तक रहा। मनुष्य के शरीर की जीवन अवधि के अनुसार, उसे उस उम्र पर नहीं मरना चाहिए था और उसे छोड़ कर नहीं जाना चाहिए था। किन्तु परमेश्वर के आत्मा के लिए यह जरा सी भी चिंता का विषय नहीं था। उसका कार्य ख़त्म हो जाने पर पवित्रात्मा के साथ-साथ ओझल होते हुए, शरीर को अलग कर दिया गया था। यही वह सिद्धांत है जिससे परमेश्वर देह में कार्य करता है। और इसलिए, यदि ईमानदारी से कहा जाए तो देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता से रहित है। दोहराएँ तो, वह पृथ्वी पर सामान्य मानव जीवन जीने के लिए नहीं आता है। वह ऐसा नहीं करता है कि पहले एक सामान्य मानव जीवन को स्थापित करे, फिर कार्य करना शुरू करे। बल्कि, जब तक वह एक सामान्य मानव परिवार में जन्म लेता है, वह दिव्यता का कार्य करने में समर्थ है। वह मनुष्य के रत्ती भर इरादे से भी मुक्त है; वह दैहिक नहीं है, और वह निश्चित रूप से समाज के तरीकों को नहीं अपनाता है और मनुष्य के विचारों या धारणाओं में शामिल नहीं होता है, मनुष्य के जीवन दर्शनों के साथ तो बिल्कुल नहीं जुड़ता है। यही वह कार्य है जो देहधारी परमेश्वर करना चाहता है और यही उसके देहधारण का व्यावहारिक महत्व है। परमेश्वर देह में, अन्य मामूली प्रक्रियाओं से गुज़रे बिना, मुख्य रूप से अपने कार्य के उस एक चरण को करने के लिए आता है जिसे देह में करने की आवश्यकता है, और जहाँ तक सामान्य मनुष्य के अनुभवों की बात है, वे उसे नहीं होते हैं। वह कार्य जो देहधारी परमेश्वर के देह को करने की आवश्यकता है उसमें सामान्य मनुष्य के अनुभव शामिल नहीं होते हैं। इसलिए, परमेश्वर देह में उस कार्य को पूरा करने के वास्ते आता है जिस कार्य को उसे देह में रहकर पूरा करने की आवश्यकता है। बाकी किसी और बात से उसका कोई संबंध नहीं है। वह ऐसी बहुत सी मामूली प्रक्रियाओं से नहीं गुज़रता है। एक बार जब उसका कार्य पूरा हो जाता है, तो उसके देहधारण का महत्व भी समाप्त हो जाता है। इस चरण को समाप्त करने का अर्थ है कि उसे जिस कार्य को देह में करने की आवश्यकता है वह समाप्त हो गया है, और उसकी देह की सेवकाई पूरी हो गई है। किन्तु वह अनिश्चित काल तक देह में कार्य नहीं करता रह सकता है। उसे कार्य करने के लिए किसी अन्य जगह, देह के बाहर किसी जगह पर आगे बढ़ना है। केवल इस तरह से ही उसका कार्य पूरी तरह से पूर्ण हो सकता है और बेहतर ढंग से विस्तार कर सकता है। परमेश्वर अपनी मूल योजना के अनुसार कार्य करता है। उसे कौन सा कार्य करने की आवश्यकता है और वह कौन सा कार्य पूरा कर चुका है, इस बारे में वह इतनी स्पष्टता से जानता है जितना वह अपने हाथ की हथेली को जानता है। परमेश्वर हर एक व्यक्ति की उस रास्ते पर चलने में अगुआई करता है जो उसने पहले से ही पूर्व निर्धारित कर दिया है। इससे कोई भी बच कर नहीं निकल सकता है। जो लोग जो परमेश्वर के आत्मा के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हैं केवल वे ही विश्राम में प्रवेश करने में समर्थ होंगे। ऐसा हो सकता है कि, बाद के कार्य में, मनुष्य का मार्गदर्शन करने के लिए परमेश्वर देह में नहीं बोल रहा होगा, बल्कि एक मूर्त रूप वाला पवित्रात्मा मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर रहा होगा। केवल तभी मनुष्य परमेश्वर को वस्तुतः स्पर्श करने, परमेश्वर को देखने, और पूरी तरह से उस वास्तविकता जिसकी परमेश्वर को आवश्यकता है में प्रवेश करने में समर्थ होगा, ताकि व्यावहारिक परमेश्वर द्वारा सिद्ध बन जाए। यही वह कार्य है जिसे परमेश्वर पूरा करना चाहता है, जिसकी उसने लंबे समय से योजना बनाई हुई है। इससे, तुम सभी लोगों को उस मार्ग को देखना चाहिए जो तुम लोगों को लेना है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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