परमेश्वर के दैनिक वचन | "तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है" | अंश 134

29 जुलाई, 2021

तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? पवित्रात्मा, व्यक्ति और वचन स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तुम सिर्फ़ व्यक्ति को जानते हो—यदि तुम उसकी आदतों और उसके व्यक्तित्व को जानते हो—लेकिन पवित्रात्मा के कार्य को नहीं जानते, या यह नहीं जानते कि पवित्रात्मा देह में क्या करता है, और यदि तुम सिर्फ़ पवित्रात्मा और वचन पर ध्यान देते हो, और केवल पवित्रात्मा के सामने प्रार्थना करते हो, लेकिन व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के पवित्रात्मा के कार्य को नहीं जानते, तो यह साबित करता है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर को नहीं जानते। व्यावहारिक परमेश्वर संबंधी ज्ञान में उसके वचनों को जानना और अनुभव करना, पवित्रात्मा के कार्य के नियमों और सिद्धांतों को समझना, और परमेश्वर के पवित्रात्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कार्य पवित्रात्मा द्वारा नियंत्रित होता है, और उसके द्वारा बोले जाने वाले वचन पवित्रात्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं। इस प्रकार, व्यावहारिक परमेश्वर को जानने के लिए यह जानना सर्वोपरि है कि परमेश्वर मानवता और दिव्यता में कैसे कार्य करता है; जिसके परिणामस्वरूप यह पवित्रात्मा की अभिव्यक्ति से संबंध रखता है, जिससे सभी लोग जुड़ते हैं।

पवित्रात्मा की अभिव्यक्तियों के कौन-से पहलू हैं? परमेश्वर कभी मानवता में कार्य करता है और कभी दिव्यता में—लेकिन दोनों मामलों में नियंत्रक पवित्रात्मा होता है। लोगों के भीतर जैसी आत्मा होती है, वैसी ही उनकी बाहरी अभिव्यक्ति होती है। पवित्रात्मा सामान्य रूप से कार्य करता है, लेकिन पवित्रात्मा द्वारा उसके निर्देशन के दो भाग हैं : एक भाग उसका मानवता में किया जाने वाला कार्य है, और दूसरा उसका दिव्यता के माध्यम से किया जाने वाला कार्य है। यह तुम्हें अच्छी तरह से जान लेना चाहिए। पवित्रात्मा का कार्य परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग होता है : जब उसके मानवीय कार्य की आवश्यकता होती है, तो पवित्रात्मा इस मानवीय कार्य को निर्देशित करता है; और जब उसके दिव्य कार्य की आवश्यकता होती है, तो उसे करने के लिए सीधे दिव्यता प्रकट होती है। चूँकि परमेश्वर देह में कार्य करता है और देह में प्रकट होता है, इसलिए वह मानवता और दिव्यता दोनों में कार्य करता है। मानवता में उसका कार्य पवित्रात्मा द्वारा निर्देशित होता है और मनुष्यों की दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, परमेश्वर के साथ उनका जुड़ना आसान बनाने के लिए, उन्हें परमेश्वर की वास्तविकता और सामान्यता देखने देने के लिए, और उन्हें यह देखने देने के लिए किया जाता है कि परमेश्वर के पवित्रात्मा ने देह धारण किया है और वह मनुष्यों के बीच है, मनुष्य के साथ रहता है और मनुष्य के साथ जुड़ता है। दिव्यता में उसका कार्य लोगों के जीवन के लिए पोषण प्रदान करने और हर चीज़ में लोगों की सकारात्मक रूप से अगुआई करने, लोगों के स्वभाव को बदलने और उन्हें वास्तव में पवित्रात्मा के देह में प्रकटन को देखने देने के लिए किया जाता है। मुख्य रूप से, मनुष्य के जीवन में वृद्धि सीधे दिव्यता में किए गए परमेश्वर के कार्य और वचनों के माध्यम से प्राप्त की जाती है। केवल दिव्यता में परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करके ही लोग अपने स्वभाव में बदलाव हासिल कर सकते हैं और केवल तभी वे अपनी आत्मा में संतुष्ट हो सकते हैं; केवल इसमें मानवता में किया जाने वाला कार्य—मानवता में परमेश्वर की चरवाही, सहायता और पोषण—जोड़े जाने पर ही परमेश्वर के कार्य के परिणाम पूरी तरह से हासिल किए जा सकते हैं। आज जिस व्यावहारिक परमेश्वर की बात की जाती है, वह मानवता और दिव्यता दोनों में कार्य करता है। व्यावहारिक परमेश्वर के प्रकट होने के माध्यम से उसका सामान्य मानवीय कार्य और जीवन और उसका पूर्णत: दिव्य कार्य हासिल किए जाते हैं। उसकी मानवता और दिव्यता संयुक्त रूप से एक हैं, और दोनों का कार्य वचनों के द्वारा पूरा किया जाता है; मानवता में हो या दिव्यता में, वह वचन बोलता है। जब परमेश्वर मानवता में काम करता है, तो वह मानव की भाषा बोलता है, ताकि लोग उससे जुड़ सकें और उसके वचनों को समझ सकें। उसके वचन स्पष्ट रूप से बोले जाते हैं और समझने में आसान होते हैं, ऐसे कि वे सभी लोगों को प्रदान किए जा सकें; लोग सुशिक्षित हों या अल्पशिक्षित, वे सब परमेश्वर के वचनों को प्राप्त कर सकते हैं। दिव्यता में परमेश्वर का कार्य भी वचनों के द्वारा ही किया जाता है, लेकिन वह पोषण से भरा होता है, जीवन से भरा होता है, मनुष्य की धारणाओं से दूषित नहीं होता, उसमें मनुष्य की प्राथमिकताएँ शामिल नहीं होतीं, और वह मनुष्य की सीमाओं से रहित होता है, वह किसी सामान्य मानवता के बंधनों से बाहर होता है; वह देह में किया जाता है, लेकिन पवित्रात्मा की सीधी अभिव्यक्ति होता है। यदि लोग केवल परमेश्वर द्वारा मानवता में किए गए कार्य को ही स्वीकार करते हैं, तो वे अपने आपको एक दायरे में सीमित कर लेंगे, और एक छोटे-से बदलाव के लिए भी उन्हें कई वर्षों के व्यवहार, काट-छाँट और अनुशासन की आवश्यकता होगी। हालाँकि पवित्र आत्मा के कार्य या उसकी उपस्थिति के बिना वे हमेशा अपने पुराने रास्ते पर लौट जाएँगे; केवल दिव्यता के काम के माध्यम से ही इस तरह की बीमारियाँ और कमियाँ दूर की जा सकती हैं, और केवल तभी लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है। सतत व्यवहार और काट-छाँट के बजाय, जो चीज़ ज़रूरी है वह है सकारात्मक पोषण, सभी कमियों को पूरा करने के लिए वचनों का उपयोग करना, लोगों की हर अवस्था प्रकट करने के लिए वचनों का उपयोग करना, उनके जीवन, उनके प्रत्येक कथन, उनके हर कार्य को निर्देशित करने और उनके इरादों और प्रेरणाओं को खोलकर रख देने के लिए वचनों का उपयोग करना। यही है व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक कार्य। इसलिए, व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति अपने रवैये में तुम्‍हें उसे पहचानते और स्वीकार करते हुए उसकी मानवता के सामने तत्काल समर्पण करना चाहिए, और साथ ही तुम्हे उसके दिव्य कार्य और वचनों को भी स्वीकार करना और उनका पालन करना चाहिए। परमेश्वर के देह में प्रकट होने का अर्थ है कि परमेश्वर के पवित्रात्मा के सब कार्य और वचन उसकी सामान्य मानवता, और उसके द्वारा धारित देह के माध्यम से किए जाते हैं। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का पवित्रात्मा उसके मानवीय कार्य को तत्काल निर्देशित करता है और दिव्यता के कार्य को देह में पूरा करता है, और देहधारी परमेश्वर में तुम परमेश्वर के मानवता में किए गए कार्य और पूर्णत: दिव्य कार्य, दोनों देख सकते हो। व्यावहारिक परमेश्वर के देह में प्रकट होने का यह वास्तविक अर्थ है। यदि तुम इसे स्पष्ट रूप से देख सकते हो, तो तुम परमेश्वर के सभी विभिन्न भागों से जुड़ पाओगे; तुम उसके दिव्यता में किए गए कार्य को बहुत ज़्यादा महत्व देना, और उसके मानवता में किए गए कार्य को अनुचित रूप से नकारना बंद कर दोगे, और तुम चरम सीमाओं पर नहीं जाओगे, न ही कोई गलत रास्ता पकड़ोगे। कुल मिलाकर, व्यावहारिक परमेश्वर का अर्थ यह है कि उसका मानवता और दिव्यता का कार्य, पवित्रात्मा के निर्देशानुसार, उसके देह के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है, ताकि लोग देख सकें कि वह जीवंत और सजीव, वास्तविक और सत्य है।

परमेश्वर के पवित्रात्मा के मानवता में किए जाने वाले कार्य के परिवर्ती चरण हैं। मनुष्य को पूर्ण करके वह अपनी मानवता को पवित्रात्मा का निर्देश प्राप्त करने में समर्थ बनाता है, जिसके बाद उसकी मानवता कलीसियाओं को पोषण प्रदान करने और उनकी अगुआई करने में सक्षम होती है। यह परमेश्वर के सामान्य कार्य की एक अभिव्यक्ति है। इसलिए, यदि तुम परमेश्वर के मानवता में किए जाने वाले कार्य के सिद्धांतों को अच्छी तरह देख पाते हो, तो तुम्हारे द्वारा परमेश्वर के मानवता में किए जाने वाले कार्य के बारे में धारणाएँ बनाए जाने की संभावना नहीं होगी। चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर का पवित्रात्मा गलत नहीं हो सकता। वह सही और त्रुटिरहित है; वह कुछ भी गलत नहीं करता। दिव्य कार्य परमेश्वर की इच्छा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है, उसमें मानवता का कोई हस्तक्षेप नहीं होता। वह पूर्णता से होकर नहीं गुज़रता, बल्कि सीधे पवित्रात्मा से आता है। फिर भी, यह तथ्य कि वह दिव्यता में कार्य कर सकता है, उसकी सामान्य मानवता के कारण है; यह ज़रा भी अलौकिक नहीं है और किसी सामान्य मनुष्य द्वारा किया जाता प्रतीत होता है। परमेश्वर स्वर्ग से पृथ्वी पर मुख्यत: परमेश्वर के वचनों को देह के माध्यम से व्यक्त करने के लिए, परमेश्वर के पवित्रात्मा का कार्य देह के माध्यम से पूरा करने के लिए आया है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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