परमेश्वर के दैनिक वचन | "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है" | अंश 118

परमेश्वर के दैनिक वचन | "भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर द्वारा उद्धार की अधिक आवश्यकता है" | अंश 118

0 |27 जुलाई, 2020

परमेश्वर ने देहधारण किया क्योंकि शैतान का आत्मा, या कोई अभौतिक चीज़ उसके कार्य का विषय नहीं है, परन्तु मनुष्य है, जो शरीर से बना है और जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया है। निश्चित रूप से चूँकि मनुष्य की देह को भ्रष्ट किया गया है इसलिए परमेश्वर ने हाड़-मांस के मनुष्य को अपने कार्य का विषय बनाया है; इसके अतिरिक्त, क्योंकि मनुष्य भ्रष्टता का विषय है, उसने मनुष्य को अपने उद्धार के कार्य के समस्त चरणों के दौरान अपने कार्य का एकमात्र विषय बनाया है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, और वह हाड़-मांस एवं लहू से बना हुआ है, और एकमात्र परमेश्वर ही है जो मनुष्य को बचा सकता है। इस रीति से, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए ऐसा देह बनना होगा जो मनुष्य के समान ही गुणों को धारण करता है, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभावों को हासिल कर सके। परमेश्वर को अपने कार्य को ठीक तरह से करने के लिए देहधारण करना होगा क्योंकि मनुष्य देह से बना हुआ है, और पाप पर विजय पाने में या स्वयं को शरीर से अलग करने में असमर्थ है। यद्यपि देहधारी परमेश्वर का मूल-तत्व एवं उसकी पहचान, मनुष्य के मूल-तत्व एवं उसकी पहचान से बहुत अधिक भिन्न है, फिर भी उसका रूप मनुष्य के समान है, उसके पास किसी सामान्य व्यक्ति का रूप है, और वह एक सामान्य व्यक्ति का जीवन जीता है, और जो लोग उसे देखते हैं वे परख सकते हैं कि वह किसी सामान्य व्यक्ति से अलग नहीं है। यह सामान्य रूप एवं सामान्य मानवता उसके लिए पर्याप्त है कि वह सामान्य मानवता में अपने अलौकिक कार्य को अंजाम दे। उसका देह उसे सामान्य मानवता में अपना कार्य करने देता है, और मनुष्य के मध्य अपने कार्य को करने में उसकी सहायता करता है, इसके अतिरिक्त उसकी सामान्य मानवता मनुष्य के मध्य उद्धार के कार्य को क्रियान्वित करने के लिए सहायता करती है। यद्यपि उसकी सामान्य मानवता ने मनुष्य के बीच में काफी कोलाहल मचा दिया है, फिर भी ऐसे कोलाहल ने उसके कार्य के सामान्य प्रभावों पर कोई असर नहीं डाला है। संक्षेप में, उसके सामान्य देह का कार्य मनुष्य के लिए अत्यंत लाभदायक है। हालाँकि अधिकांश लोग उसकी सामान्य मानवता को स्वीकार नहीं करते हैं, उसका कार्य फिर भी प्रभावशाली हो सकता है, और उसकी सामान्य मानवता के कारण इन प्रभावों को हासिल किया जाता है। इसके विषय में कोई सन्देह नहीं है। देह में किए गए के उसके कार्य से, मनुष्य उसकी सामान्य मानवता के विषय में उन धारणाओं की अपेक्षा दस गुना या दर्जनों गुना ज़्यादा चीज़ों को प्राप्त करता है जो मनुष्य के मध्य मौजूद हैं, और ऐसी धारणाओं को अंततः उसके कार्य के द्वारा पूरी तरह से निगल लिया जाएगा। और वह प्रभाव जो उसके कार्य ने हासिल किया है, कहने का तात्पर्य है, मनुष्य का उसके बारे में ज्ञान, उसके विषय में मनुष्य की धारणाओं से बहुत अधिक है। वह कार्य जिसे वह शरीर में करता है उसकी कल्पना करने या उसे मापने हेतु कोई तरीका नहीं है, क्योंकि उसका देह हाड़-मांस के मनुष्य के समान नहीं है; यद्यपि बाहरी आवरण एक समान है, फिर भी मूल-तत्व एक जैसा नहीं है। उसका देह परमेश्वर के विषय में मनुष्य के मध्य कई धारणाओं को उत्पन्न करता है, फिर भी उसका देह मनुष्य को अत्यधिक ज्ञान अर्जित करने भी दे सकता है, और वह किसी भी व्यक्ति पर विजय प्राप्त कर सकता है जो वैसा ही बाहरी आवरण धारण किए हुए है। क्योंकि वह महज एक मनुष्य नहीं है, परन्तु मनुष्य के बाहरी आवरण के साथ परमेश्वर है, और कोई भी पूरी तरह से उसकी गहराई को माप नहीं सकता है एवं उसे समझ नहीं सकता है। सभी लोगों के द्वारा ऐसे अदृश्य एवं अस्पृश्य परमेश्वर से प्रेम एवं उसका स्वागत किया जाता है। यदि परमेश्वर बस एक आत्मा होता जो मनुष्य के लिए अदृश्य है, तो परमेश्वर पर विश्वास करना मनुष्य के लिए कितना आसान होता। मनुष्य अपनी कल्पना को बेलगाम कर सकता है, और अपने आपको प्रसन्न करने तथा अपने आपको खुश करने के लिए किसी भी आकृति को परमेश्वर की आकृति के रूप में चुन सकता है। इस रीति से, मनुष्य बिना किसी संकोच के कुछ भी कर सकता है जो उसके स्वयं के परमेश्वर को अति प्रसन्न करता है, और वह कार्य कर सकता है जिसे यह परमेश्वर करने की अत्यधिक इच्छा करता है। इसके अलावा, मनुष्य मानता है कि उसकी अपेक्षा परमेश्वर के प्रति कोई भी उससे अधिक भरोसेमंद एवं भक्त नहीं है, और यह कि बाकी सब बुतरस्त कुत्ते हैं, एवं परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हैं। ऐसा कहा जा सकता है कि यह वह है जिसे उन लोगों के द्वारा खोजा जाता है जिनका विश्वास परमेश्वर में अस्पष्ट है और सिद्धान्तों पर आधारित है; जो कुछ वे खोजते हैं वह सब थोड़ी बहुत विभिन्नता के साथ काफी कुछ एक जैसा ही होता है। यह महज ऐसा है कि उनकी कल्पनाओं में परमेश्वर की आकृतियां भिन्न-भिन्न होती हैं, फिर भी उनका मूल-तत्व वास्तव में एक जैसा ही होता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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