परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 180

18 अप्रैल, 2021

तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के कार्य में भेद कैसे करना है। तुम मनुष्य के कार्य में क्या देख सकते हो? मनुष्य के कार्य में उसके अनुभव के बहुत से तत्व होते हैं; मनुष्य वही व्यक्त करता है जैसा वह होता है। परमेश्वर का अपना कार्य भी वही अभिव्यक्त करता है जो वह है, परंतु उसका अस्तित्व मनुष्य से भिन्न है। मनुष्य का अस्तित्व मनुष्य के अनुभव और जीवन का प्रतिनिधि है (जो कुछ मनुष्य अपने जीवन में अनुभव करता या जिससे सामना होता है, या जो उसके जीने के फलसफे हैं), और भिन्न-भिन्न परिवेशों में रहने वाले लोग भिन्न-भिन्न अस्तित्व व्यक्त करते हैं। क्या तुम्हारे पास सामाजिक अनुभव है और तुम वास्तव में किस प्रकार अपने परिवार में रहते और उसके भीतर कैसे अनुभव करते हो, इसे तुम्हारी अभिव्यक्ति में देखा जा सकता है, जबकि तुम देहधारी परमेश्वर के कार्य से यह नहीं देख सकते कि उसके पास सामाजिक अनुभव हैं या नहीं। वह मनुष्य के सार से अच्छी तरह से अवगत है, वह सभी प्रकार के लोगों से संबंधित हर तरह के अभ्यास प्रकट कर सकता है। वह मानव के भ्रष्ट स्वभाव और विद्रोही व्यवहार को भी बेहतर ढंग से प्रकट करता है। वह सांसारिक लोगों के बीच नहीं रहता, परंतु वह नश्वर लोगों की प्रकृति और सांसारियों की समस्त भ्रष्टता से अवगत है। यही उसका अस्तित्व है। यद्यपि वह संसार के साथ व्यवहार नहीं करता, लेकिन वह संसार के साथ व्यवहार करने के नियम जानता है, क्योंकि वह मानवीय प्रकृति को पूरी तरह से समझता है। वह पवित्रात्मा के आज के और अतीत के, दोनों कार्यों के बारे में जानता है जिन्हें मनुष्य की आँखें नहीं देख सकतीं और कान नहीं सुन सकते। इसमें बुद्धि शामिल है जो कि जीने का फलसफा और चमत्कार नहीं है जिनकी थाह पाना मनुष्य के लिए कठिन है। यही उसका अस्तित्व है, लोगों के लिए खुला भी और उनसे छिपा हुआ भी है। वह जो कुछ व्यक्त करता है, वह असाधारण मनुष्य का अस्तित्व नहीं है, बल्कि पवित्रात्मा के अंतर्निहित गुण और अस्तित्व हैं। वह दुनिया भर में यात्रा नहीं करता परंतु उसकी हर चीज़ को जानता है। वह "वन-मानुषों" के साथ संपर्क करता है जिनके पास कोई ज्ञान या अंतर्दृष्टि नहीं होती, परंतु वह ऐसे वचन व्यक्त करता है जो ज्ञान से ऊँचे और महान लोगों से ऊपर होते हैं। वह मंदबुद्धि और संवेदनशून्य लोगों के समूह में रहता है जिनमें न तो मानवीयता होती है और न ही वे मानवीय परंपराओं और जीवन को समझते हैं, परंतु वह लोगों से सामान्य मानवता का जीवन जीने के लिए कह सकता है, साथ ही वह इंसान की नीच और अधम मानवता को भी प्रकट करता है। यह सब-कुछ उसका अस्तित्व ही है, किसी भी रक्त-माँस के इंसान के अस्तित्व की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा है। उसके लिए, यह आवश्यक नहीं है कि वह उस कार्य को करने के लिए जो उसे करना है और भ्रष्ट मनुष्य के सार को पूरी तरह से प्रकट करने के लिए जटिल, बोझिल और पतित सामाजिक जीवन का अनुभव करे। पतित सामाजिक जीवन उसके देह को कुछ नहीं सिखाता। उसके कार्य और वचन केवल मनुष्य की अवज्ञा को प्रकट करते हैं, वे संसार के साथ निपटने के लिए मनुष्य को अनुभव और सबक प्रदान नहीं करते। जब वह मनुष्य को जीवन की आपूर्ति करता है तो उसे समाज या मनुष्य के परिवार की जाँच-पड़ताल करने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य को उजागर करना और न्याय करना उसके देह के अनुभवों की अभिव्यक्ति नहीं है; यह लम्बे समय तक मनुष्य की अवज्ञा को जानने के बाद, उसका मनुष्य की अधार्मिकता को प्रकट करना और मनुष्य की भ्रष्टता से घृणा करना है। परमेश्वर के सारे कार्य का तात्पर्य मनुष्य के सामने अपने स्वभाव को प्रकट करना और अपने अस्तित्व को व्यक्त करना है। केवल वही इस कार्य को कर सकता है; इस कार्य को रक्त-माँस का व्यक्ति नहीं कर सकता।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

मसीह जो अभिव्यक्त करता है वो आत्मा है

मानव का सार जानता है देहधारी परमेश्वर, प्रकट करता है वो सब जो लोग करते हैं, मानव के भ्रष्ट स्वभाव, विद्रोही आचरण को, और भी बेहतर प्रकट करता है। वो नहीं रहता सांसारिक लोगों के साथ, पर जानता है उनकी प्रकृति और भ्रष्टाचार। ये उसका स्वरूप है। हालांकि वो दुनिया के साथ व्यवहार नहीं करता, फिर भी वो जानता है दुनिया से जुड़ने का हर एक नियम। क्योंकि वो समझता है मानवजाति को, उसकी प्रकृति को पूर्ण रूप से।

आत्मा के वर्तमान और अतीत के कार्य के बारे में वो जानता है, जो मानव की आँखें नहीं देख सकतीं, जो मानव के कान नहीं सुन सकते हैं। ये दर्शाता है चमत्कार जो मानव नहीं समझ सकता, और बुद्धि जो फ़लसफ़ा नहीं है। ये उसका स्वरूप है, मानव से छुपा और प्रकाशित भी। उसकी अभिव्यक्ति किसी असाधारण मानव सी नहीं, बल्कि अंतर्निहित अस्तित्व और आत्मा का गुण है।

वो दुनिया की यात्रा नहीं करता, फिर भी इसके बारे में वो सब जानता है। वो मिलता उनसे ज्ञान, अंतर्दृष्टि नहीं जिनमें, फिर भी उसके वचन महान लोगों से ऊपर हैं। वो नासमझ और सुन्न लोगों के बीच रहता है, जो नहीं जानते मानव की परम्पराओं को या कैसे जीते हैं। पर वो कह सकता है उन्हें सच्चा मानवीय जीवन जीने के लिए, प्रकट करते हुए, वे कितने नीच, कितने अधम हैं! ये उसका स्वरूप है, ख़ून और देह के लोगों से भी ऊँचा। मानव का ख़ुलासा और न्याय करना उसके अनुभव से नहीं है। जान कर, नफ़रत कर मानव की अवज्ञा से, उनके अधर्म का वो प्रकाशन करता है। उसका किया कार्य प्रकाशित करता है उसका स्वभाव और अस्तित्व मानव के समक्ष। मसीह को छोड़ कोई देह ऐसा कार्य नहीं कर सकता।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

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