परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 172

16 अप्रैल, 2021

पवित्र आत्मा की मुख्य धारा में जो कार्य है वह पवित्र आत्मा का कार्य है, चाहे यह परमेश्वर का अपना कार्य हो या उपयोग किए जा रहे मनुष्यों का कार्य। स्वयं परमेश्वर का सार आत्मा है, जिसे पवित्र आत्मा या सात गुना सघन आत्मा भी कहा जा सकता है। कुल मिलाकर, वे परमेश्वर के आत्मा हैं, हालाँकि भिन्न-भिन्न युगों में परमेश्वर के आत्मा को भिन्न-भिन्न नामों से पुकारा गया है। परन्तु उनका सार तब भी एक ही है। इसलिए, स्वयं परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा का कार्य है, जबकि देहधारी परमेश्वर का कार्य, पवित्र आत्मा के कार्य से ज़रा-भी कम नहीं है। जिन मनुष्यों का उपयोग किया जाता है उनका कार्य भी पवित्र आत्मा का कार्य है। फिर भी परमेश्वर का कार्य पवित्र आत्मा की पूर्ण अभिव्यक्ति है, जो सर्वथा सत्य है, जबकि उपयोग किए जा रहे लोगों का कार्य बहुत-सी मानवीय चीज़ों के साथ मिश्रित होता है, और वह पवित्र आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति नहीं होता, परमेश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति होने की तो बात ही छोड़ो। पवित्र आत्मा का कार्य विविध होता है और यह किसी परिस्थिति द्वारा सीमित नहीं होता। भिन्न-भिन्न लोगों में पवित्र आत्मा का कार्य भिन्न-भिन्न होता है; इससे भिन्न-भिन्न सार अभिव्यक्त होते हैं, और यह भिन्न-भिन्न युगों और देशों में भी अलग-अलग होता है। निस्संदेह, यद्यपि पवित्र आत्मा कई भिन्न-भिन्न तरीकों से और कई सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, इसका सार हमेशा भिन्न होता है, फिर चाहे कार्य जैसे भी किया जाए या जिस भी प्रकार के लोगों पर किया जाए; भिन्न-भिन्न लोगों पर किए गए सभी कार्यों के अपने सिद्धांत होते हैं और सभी अपने लक्ष्यों के सार का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। इसकी वजह यह है कि पवित्र आत्मा का कार्य दायरे में काफी विशिष्ट और काफी नपा-तुला होता है। देहधारी शरीर में किया गया कार्य उस कार्य के समान नहीं होता जो लोगों पर किया जाता है, और जिन लोगों पर यह कार्य किया जाता है, उनकी क्षमता के आधार पर वह कार्य भी भिन्न-भिन्न होता है। देहधारी शरीर में किया गया कार्य लोगों पर नहीं किया जाता, और यह वही कार्य नहीं होता जो लोगों पर किया जाता है। संक्षेप में, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि कार्य कैसे किया जाता है, विभिन्न लक्ष्यों पर किया गया कार्य कभी एक समान नहीं होता, और जिन सिद्धांतों के द्वारा वह कार्य करता है वे भिन्न-भिन्न लोगों की अवस्था और प्रकृति के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। पवित्र आत्मा भिन्न-भिन्न लोगों पर उनके अंतर्निहित सार के आधार पर कार्य करता है और उनसे उनके अंतर्निहित सार से अधिक की माँग नहीं करता, न ही वह उन पर उनकी अंतर्निहित क्षमता से ज़्यादा कार्य करता है। इसलिए, मनुष्य पर पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को कार्य के लक्ष्य के सार को देखने देता है। मनुष्य का अंतर्निहित सार परिवर्तित नहीं होता; मनुष्य की अंतर्निहित क्षमता सीमित है। पवित्र आत्मा लोगों की क्षमता के अनुसार उनका उपयोग या उन पर कार्य करता है, ताकि वे इससे लाभान्वित हो सकें। जब पवित्र आत्मा उपयोग किए जा रहे मनुष्यों पर कार्य करता है, तो उनकी प्रतिभा और अंतर्निहित क्षमता को उन्मुक्त कर दिया जाता है, उन्हें रोककर नहीं रखा जाता। उनकी अंतर्निहित क्षमता को कार्य के लिए काम में लाया जाता है। ऐसा कहा जा सकता है कि वह अपने कार्य में परिणाम हासिल करने के लिए, इंसान के उन हिस्सों का उपयोग करता है, जिनका उसके कार्य में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके विपरीत, देहधारी शरीर में किया गया कार्य सीधे तौर पर पवित्रात्मा के कार्य को व्यक्त करता है और इसमें मानवीय मन और विचारों की मिलावट नहीं होती; इस तक न तो इंसान की प्रतिभा की, न उसके अनुभव या उसकी सहज स्थिति की पहुँच होती है। पवित्र आत्मा के समस्त असंख्य कार्यों का लक्ष्य इंसान को लाभ पहुँचाना और शिक्षित करना होता है। हालाँकि, कुछ लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है जबकि अन्य लोग पूर्ण बनने की अवस्था में नहीं होते, जिसका तात्पर्य है कि उन्हें पूर्ण नहीं किया जा सकता और उन्हें शायद ही बचाया जा सकता है, और भले ही उनमें पवित्र आत्मा का कार्य रहा हो, फिर भी अंततः उन्हें निष्कासित कर दिया जाता है। कहने का अर्थ है कि यद्यपि पवित्र आत्मा का कार्य लोगों को शिक्षित करना है, फिर भी इसका यह अर्थ नहीं है कि वे सभी लोग जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य रहा है, उन्हें पूरी तरह से पूर्ण बनाया जाएगा, क्योंकि बहुत से लोग अपनी खोज में जिस मार्ग का अनुसरण करते हैं, वह पूर्ण बनाए जाने का मार्ग नहीं है। उनमें पवित्र आत्मा का केवल एकतरफ़ा कार्य है, आत्मपरक मानवीय सहयोग या सही मानवीय खोज नहीं है। इस तरह, इन लोगों पर पवित्र आत्मा का कार्य उन लोगों की सेवा के लिए आता है जिन्हें पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा के कार्य को लोग सीधे तौर पर न तो देख सकते हैं, न ही उसे स्पर्श कर सकते हैं। इसे केवल कार्य करने की प्रतिभा वाले लोग ही व्यक्त कर सकते हैं, इसका अर्थ यह है कि अनुयायियों को पवित्र आत्मा का कार्य लोगों की अभिव्यक्तियों के माध्यम से प्रदान किया जाता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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