परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर के कार्य को जानना | अंश 146

18 जून, 2020

परमेश्वर के कार्य को जानना कोई आसान बात नहीं है। अपनी खोज में तुम्हारे पास मानक और एक उद्देश्य होना चाहिए, तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि सच्चे मार्ग को कैसे खोजें, यह कैसे मापें कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, और यह परमेश्वर का कार्य है या नहीं। सच्चे मार्ग की खोज करने में सबसे बुनियादी सिद्धांत क्या है? तुम्हें देखना होगा कि इस मार्ग में पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, ये वचन सत्य की अभिव्यक्ति हैं या नहीं, किसके लिए गवाही देनी है, और यह तुम्हारे लिए क्या ला सकता है। सच्चे मार्ग और झूठे मार्ग के बीच अंतर करने के लिए बुनियादी ज्ञान के कई पहलू आवश्यक हैं, जिनमें सबसे मूलभूत है यह बताना कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य मौजूद है या नहीं। क्योंकि परमेश्वर पर लोगों के विश्वास का सार परमेश्वर के आत्मा पर विश्वास है, और यहाँ तक कि देहधारी परमेश्वर पर उनका विश्वास इसलिए है, क्योंकि यह देह परमेश्वर के आत्मा का मूर्त रूप है, जिसका अर्थ यह है कि ऐसा विश्वास अभी भी पवित्र आत्मा पर विश्वास है। आत्मा और देह के मध्य अंतर हैं, परंतु चूँकि यह देह पवित्रात्मा से आता है और वचन देह बनता है, इसलिए मनुष्य जिसमें विश्वास करता है, वह अभी भी परमेश्वर का अंतर्निहित सार है। अत:, यह पहचानने के लिए कि यह सच्चा मार्ग है या नहीं, सर्वोपरि तुम्हें यह देखना चाहिए कि इसमें पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, जिसके बाद तुम्हें यह देखना चाहिए कि इस मार्ग में सत्य है या नहीं। सत्य सामान्य मानवता का जीवन-स्वभाव है, अर्थात्, वह जो मनुष्य से तब अपेक्षित था, जब परमेश्वर ने आरंभ में उसका सृजन किया था, यानी, अपनी समग्रता में सामान्य मानवता (मानवीय भावना, अंतर्दृष्टि, बुद्धि और मनुष्य होने के बुनियादी ज्ञान सहित) है। अर्थात्, तुम्हें यह देखने की आवश्यकता है कि यह मार्ग लोगों को एक सामान्य मानवता के जीवन में ले जा सकता है या नहीं, बोला गया सत्य सामान्य मानवता की आवश्यकता के अनुसार अपेक्षित है या नहीं, यह सत्य व्यावहारिक और वास्तविक है या नहीं, और यह सबसे सामयिक है या नहीं। यदि इसमें सत्य है, तो यह लोगों को सामान्य और वास्तविक अनुभवों में ले जाने में सक्षम है; इसके अलावा, लोग हमेशा से अधिक सामान्य बन जाते हैं, उनका मानवीय बोध हमेशा से अधिक पूरा बन जाता है, उनका दैहिक और आध्यात्मिक जीवन हमेशा से अधिक व्यवस्थित हो जाता है, और उनकी भावनाएँ हमेशा से और अधिक सामान्य हो जाती हैं। यह दूसरा सिद्धांत है। एक अन्य सिद्धांत है, जो यह है कि लोगों के पास परमेश्वर का बढ़ता हुआ ज्ञान है या नहीं, और इस प्रकार के कार्य और सत्य का अनुभव करना उनमें परमेश्वर के लिए प्रेम को प्रेरित कर सकता है या नहीं और उन्हें परमेश्वर के हमेशा से अधिक निकट ला सकता है या नहीं। इसमें यह मापा जा सकता है कि यह सही मार्ग है अथवा नहीं। सबसे बुनियादी बात यह है कि क्या यह मार्ग अलौकिक के बजाय यर्थाथवादी है, और यह मनुष्य के जीवन के लिए पोषण प्रदान करने में सक्षम है या नहीं। यदि यह इन सिद्धांतों के अनुरूप है, तो निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह मार्ग सच्चा मार्ग है। मैं ये वचन तुम लोगों से तुम्हारे भविष्य के अनुभवों में अन्य मार्गों को स्वीकार करवाने के लिए नहीं कह रहा हूँ, न ही किसी भविष्यवाणी के रूप में कह रहा हूँ कि भविष्य में एक अन्य नए युग का कार्य होगा। मैं इन्हें इसलिए कह रहा हूँ, ताकि तुम लोग निश्चित हो जाओ कि आज का मार्ग ही सच्चा मार्ग है, ताकि आज के कार्य के प्रति अपने विश्वास में तुम लोग केवल आधे-अधूरे ही निश्चित न रहो और इसमें अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में असमर्थ न रहो। यहाँ ऐसे कई लोग हैं, जो निश्चित होने के बावजूद अभी भी भ्रम में अनुगमन करते हैं; ऐसी निश्चितता का कोई सिद्धांत नहीं होता, और ऐसे लोगों को देर-सबेर हटा दिया जाना चाहिए। यहाँ तक कि वे भी, जो अपने अनुसरण में विशेष रूप से उत्साही हैं, तीन भाग ही निश्चित हैं और पाँच भाग अनिश्चित हैं, जो दर्शाता है कि उनका कोई आधार नहीं है। चूँकि तुम लोगों की क्षमता बहुत कमज़ोर है और तुम्हारी नींव बहुत सतही है, इसलिए तुम लोगों को अंतर करने की समझ नहीं है। परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं है, वह ऐसा कार्य नहीं करता जो वास्तविक न हो, वह मनुष्य से अत्यधिक अपेक्षाएँ नहीं रखता, और वह ऐसा कार्य नहीं करता जो मनुष्यों की समझ से परे हो। वह जो भी कार्य करता है, वह सब मनुष्य की सामान्य समझ के दायरे के भीतर होता है, और सामान्य मानवता की समझ से परे नहीं होता, और उसका कार्य मनुष्य की सामान्य अपेक्षाओं के अनुसार किया जाता है। यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य होता है, तो लोग हमेशा से अधिक सामान्य बन जाते हैं, और उनकी मानवता हमेशा से अधिक सामान्य बन जाती है। लोग अपने शैतानी स्वभाव का, और मनुष्य के सार का बढ़ता हुआ ज्ञान प्राप्त करते हैं, और वे सत्य के लिए हमेशा से अधिक ललक भी प्राप्त करते हैं। अर्थात्, मनुष्य का जीवन अधिकाधिक बढ़ता जाता है और मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव बदलाव में अधिकाधिक सक्षम हो जाता है—जिस सबका अर्थ है परमेश्वर का मनुष्य का जीवन बनना। यदि कोई मार्ग उन चीजों को प्रकट करने में असमर्थ है जो मनुष्य का सार हैं, मनुष्य के स्वभाव को बदलने में असमर्थ है, और, इसके अलावा, लोगों को परमेश्वर के सामने लाने में असमर्थ है या उन्हें परमेश्वर की सच्ची समझ प्रदान करने में असमर्थ है, और यहाँ तक कि उसकी मानवता के हमेशा से अधिक निम्न होने और उसकी भावना के हमेशा से अधिक असामान्य होने का कारण बनता है, तो यह मार्ग सच्चा मार्ग नहीं होना चाहिए, और यह दुष्टात्मा का कार्य या पुराना मार्ग हो सकता है। संक्षेप में, यह पवित्र आत्मा का वर्तमान कार्य नहीं हो सकता। तुम लोगों ने इन सभी वर्षों में परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी तुम्हें सच्चे और झूठे मार्ग के मध्य अंतर करने या सच्चे मार्ग की तलाश करने के सिद्धांतों का कोई आभास नहीं है। अधिकतर लोग इन मामलों में दिलचस्पी तक नहीं रखते; वे सिर्फ़ वहाँ चल पड़ते हैं जहाँ बहुसंख्यक जाते हैं, और वह दोहरा देते हैं जो बहुसंख्यक कहते हैं। ऐसा व्यक्ति सत्य की खोज करने वाला कैसे हो सकता है? और ऐसे लोग सच्चा मार्ग कैसे पा सकते हैं? यदि तुम इन अनेक मुख्य सिद्धांतों को समझ लो, तो चाहे कुछ भी हो जाए, तुम धोखा नहीं खाओगे। आज यह महत्वपूर्ण है कि लोग अंतर करने में सक्षम हो जाएँ; यही वह चीज़ है जो सामान्य मानवता के पास होनी चाहिए, और यही वह चीज़ है जो लोगों के अनुभव में आनी चाहिए। यदि आज भी लोग अपने अनुगमन में कुछ भी अंतर नहीं करते, और उनका मानवता-बोध अभी भी नहीं बढ़ा है, तो लोग बहुत मूर्ख हैं, और उनकी खोज ग़लत और भटकी हुई है। आज तुम्हारी खोज में थोड़ा-सा भी विभेदन नहीं है, और जबकि यह सत्य है, जैसा कि तुम कहते हो, कि तुमने सच्चा मार्ग तलाश कर लिया है, क्या तुमने उसे प्राप्त कर लिया है? क्या तुम कुछ भी अंतर करने में समर्थ रहे हो? सच्चे मार्ग का सार क्या है? सच्चे मार्ग में, तुमने सच्चा मार्ग प्राप्त नहीं किया है; तुमने कुछ भी सत्य प्राप्त नहीं किया है। अर्थात्, तुमने वह प्राप्त नहीं किया है, जिसकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है, और इसलिए तुम्हारी भ्रष्टता में कोई परिवर्तन नहीं आया है। यदि तुम इसी तरह खोज करते रहे, तो तुम अंततः हटा दिए जाओगे। आज के दिन तक अनुसरण करके, तुम्हें निश्चित हो जाना चाहिए कि जिस मार्ग को तुमने अपनाया है वह सच्चा मार्ग है, और तुम्हें कोई और संदेह नहीं होने चाहिए। कई लोग हमेशा अनिश्चित रहते हैं और छोटी-छोटी बातों के कारण सत्य की खोज करना बंद कर देते हैं। ये ऐसे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर के कार्य का कोई ज्ञान नहीं है; ये वे लोग हैं, जो भ्रम में परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते, वे उसके अंतरंग होने या उसकी गवाही देने में असमर्थ हैं। जो लोग केवल आशीषों की तलाश करते हैं और केवल उसकी खोज करते हैं जो कि अज्ञात और अमूर्त है, मैं उन्हें यथाशीघ्र सत्य की खोज करने की सलाह देता हूँ, ताकि उनके जीवन का कोई अर्थ हो सके। अपने आपको अब और मूर्ख मत बनाओ!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

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