परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 185

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 185

19 |04 अगस्त, 2020

लोगों के हृदयों में परमेश्वर की समझ जितनी अधिक होती है वह यह निर्धारित करती है कि वह उनके हृदयों में कितनी जगह रखता है। उनके हृदयों में परमेश्वर का ज्ञान जितना विशाल होता है उनके हृदयों में उसकी हैसियत उतनी ही बड़ी होती है। यदि वह परमेश्वर जिसे तुम जानते हो खाली और अस्पष्ट है, तो तुम्हारे हृदय में वह परमेश्वर भी खाली और अस्पष्ट है। यदि वह परमेश्वर जिसे तुम जानते हो वह स्वयं के दायरे के भीतर ही सीमित है, तो वह बहुत ही छोटा परमेश्वर है-वह परमेश्वर सच्चे परमेश्वर से जुड़ा हुआ नहीं है और उसका उसके साथ कुछ लेना देना नहीं है। इस तरह, परमेश्वर के वास्तविक कार्यों को जानना, परमेश्वर की वास्तविकता और उसकी सर्वसामर्थता को जानना, स्वयं परमेश्वर की सच्ची पहचान को जानना, जो उसके पास है और जो वह है उसे जानना, जो कुछ उसने सभी चीज़ों के बीच प्रदर्शित किया है उसे जानना-ये हर एक व्यक्ति के लिए अति महत्वपूर्ण है जो परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करता है। ये प्रत्येक व्यक्ति के जीवन से, और सत्य के अनुसरण के विषय में प्रत्येक व्यक्ति के व्यावहारिक जीवन से अलग नहीं हो सकते हैं। यदि तुम परमेश्वर के विषय में अपनी समझ को केवल शब्दों तक ही सीमित रखते हो, यदि तुम इसे अपने स्वयं के छोटे छोटे अनुभवों, परमेश्वर के अनुग्रह जिसका तुम हिसाब रखते हो, या परमेश्वर के लिए अपनी छोटी छोटी गवाहियों तक ही सीमित रखते हो, तब मैं कहता हूँ कि तुम्हारा परमेश्वर बिलकुल भी सच्चा परमेश्वर नहीं है। यह बिलकुल भी स्वयं सच्चा परमेश्वर नहीं है, यह भी कहा जा सकता है कि जिस परमेश्वर पर तुम विश्वास करते हो वह परमेश्वर नहीं है। यह इसलिए है क्योंकि जिस परमेश्वर के बारे में मैं बोल रहा हूँ यह वही है जो हर चीज़ के ऊपर शासन करता है, जो हर चीज़ के मध्य में चलता फिरता है, और हर चीज़ का प्रबन्ध करता है। यह वही है जो सारी मानवजाति की नियति को थामे रहता है-वही जो हर चीज़ की नियति को थामे रहता है। उस परमेश्वर का कार्य और क्रियाएं जिसके बारे में मैं बात कर रहा हूँ वे मात्र लोगों के एक छोटे से भाग तक ही सीमित नहीं हैं। अर्थात्, यह बस उन लोगों तक ही सीमित नहीं है जो वर्तमान में उसका अनुसरण करते हैं। उसके कार्यों को सभी चीज़ों के मध्य, सभी चीज़ों के जीवित रहने में, और सभी वस्तुओं के परिवर्तन के नियमों में प्रदर्शित किया गया है।

यदि तुम सभी चीज़ों के मध्य परमेश्वर के कार्यों में से किसी को देख या पहचान नहीं सकते हो, तो तुम उसके कार्यों में से किसी की गवाही नहीं रखते हो। यदि तुम परमेश्वर के लिए कोई गवाही नहीं रखते हो, यदि तुम निरन्तर उस छोटे तथाकथित परमेश्वर की बात करते हो जिसे तुम जानते हो, वह परमेश्वर जो तुम्हारे स्वयं के विचारों तक ही सीमित है, और तुम्हारे संकीर्ण मस्तिष्क के भीतर है, यदि तुम निरन्तर उस किस्म के परमेश्वर के बारे में बोलते हो, तो परमेश्वर कभी तुम्हारे विश्वास की प्रशंसा नहीं करेगा। जब तुम परमेश्वर के लिए गवाही देते हो, और यदि तुम सिर्फ इन शब्दों का उपयोग करते हो कि तुमने किस प्रकार परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लिया, परमेश्वर के अनुशासन और उसकी ताड़ना को कैसे स्वीकार किया, और उसके लिए अपनी गवाही में उसकी आशीषों का आनन्द कैसे लिया, तो यह बिलकुल ही अपर्याप्त है, और यह उसको संतुष्ट करने से दूर है। यदि तुम परमेश्वर के लिए एक ऐसे तरीके से गवाही देना चाहते हो जो उसकी इच्छा के साथ एक मेल में है, और स्वयं सच्चे परमेश्वर के लिए गवाही देना चाहते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के कार्यों से जो उसके पास है और जो वह है उसे देखना होगा। हर चीज़ पर उसके नियंत्रण से तुम्हें उसका अधिकार देखना होगा, और उस सच्चाई को देखना होगा कि कैसे वह समस्त मानवजाति की लिए आपूर्ति करता है। यदि तुम केवल यही स्वीकार करते हो कि तुम्हारा दैनिक भोजन और पेय और जीवन में तुम्हारी जरूरतें परमेश्वर से आती हैं, लेकिन तुम उस सच्चाई को नहीं देखते हो कि परमेश्वर सभी चीज़ों के माध्यम से सम्पूर्ण मानवजाति के लिए आपूर्ति करता है, कि वह सभी चीज़ों पर अपने शासन के माध्यम से सम्पूर्ण मानवजाति की अगुवाई करता है, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाही देने में कभी भी सक्षम नहीं होगे। अब तुम यह सब समझ गए, सही है? यह सब कहने में मेरा क्या उद्देश्य है? यह इसलिए है ताकि तुम सब इसे हल्के में न लो, ताकि तुम यह विश्वास न करो कि ये विषय जिनके बारे में मैंने कहा है वे जीवन में तुम लोगों के व्यक्तिगत प्रवेश से असम्बद्ध हैं, और ताकि तुम लोग इन विषयों को मात्र एक प्रकार के ज्ञान या सिद्धान्त के रूप में न लो। यदि तुम सब इसे उस तरह की मनोवृत्ति के साथ सुनते हो, तो तुम सब एक भी चीज़ प्राप्त नहीं करोगे। तुम लोग परमेश्वर को जानने के लिए इस महान अवसर खो दोगे।

इन सब चीज़ों के बारे में बात करने में मेरा लक्ष्य क्या है? मेरा लक्ष्य है कि लोग परमेश्वर को जानें, और लोग परमेश्वर के व्यावहारिक कार्यों को समझें। जब एक बार तुम परमेश्वर को समझ जाते हो और तुम उसके कार्यों को जान जाते हो, केवल तभी तुम्हारे पास उसे जानने के लिए अवसर या संभावना होती है। उदाहरण के लिए, यदि तुम एक व्यक्ति को समझना चाहते हो, तो तुम उसे कैसे समझोगे? क्या यह उसके बाहरी रूप को देखने के माध्यम से होगा? क्या यह जो वो पहनता है उसे देखने के माध्यम से होगा, वो कैसे कपड़े पहनता है? क्या यह कि वो कैसे चलता है उसे देखने के माध्यम से होगा? क्या यह उसके ज्ञान के दायरे को देखने के माध्यम से होगा? निश्चित रूप से यह नहीं होगा। अतः तुम एक व्यक्ति को कैसे समझते हो? तुम एक व्यक्ति के विचारों के माध्यम से, उसकी बोली और व्यवहार के माध्यम से, जो कुछ वो व्यक्त और प्रकट करता है उसके माध्यम से एक फैसला करते हो। इस तरह से तुम एक व्यक्ति को जानते हो, और इस तरह से तुम एक व्यक्ति को समझते हो। उसी प्रकार, यदि तुम लोग परमेश्वर को जानना चाहते हो, यदि तुम सभी उसके व्यावहारिक पक्ष को समझना चाहते हो, उसके सच्चे पक्ष को, तो तुम लोगों को उसे उसके कार्यों के माध्यम से और हर एक व्यावहारिक चीज़ के माध्यम से जानना होगा जो वह करता है। यह सबसे अच्छा तरीका है, और यह ही एकमात्र तरीका है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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