परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 184

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 184

69 |07 अगस्त, 2020

सभी चीज़ों की बढ़ोत्तरी के लिए परमेश्वर के द्वारा निर्धारित नियमों के दृष्टिकोण से देखने पर, क्या सम्पूर्ण मानवजाति, इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वे किस प्रकार के हैं, परमेश्वर के प्रावधानों के अंतर्गत नहीं जी रही है—क्या वे सभी उसके पोषण के अंतर्गत नहीं जी रहे हैं? यदि ये नियम नष्ट हो गए होते या यदि परमेश्वर मानवजाति के लिए इस प्रकार के नियमों को निर्धारित नहीं करता, तो उनके भविष्य की संभावनाएं क्या होतीं? मनुष्य जीवित रहने के लिए अपने मूल वातावरण को खो देते उसके बाद, क्या उनके पास भोजन का कोई स्रोत होता? यह संभव है कि भोजन के स्रोत एक समस्या बन जाते। यदि लोगों ने अपने भोजन के स्रोत को खो दिया होता, अर्थात्, उन्हें खाने के लिए कुछ नहीं मिला होता, तो सम्भवतः वे एक महीने के लिए भी बने रहने में सक्षम नहीं हो पाते। लोगों का जीवित बचे रहना एक समस्या बन जाता। अतः हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर लोगों के जीवित रहने के लिए, उनके लगातार अस्तित्व में बने रहने के लिए और बहुगुणित होने के लिए करता है वह अति महत्वपूर्ण है। हर एक चीज़ जिसे परमेश्वर सभी चीज़ों के मध्य करता है वह लोगों के जीवित बचे रहने से नज़दीकी से सम्बद्ध और अविभाज्य है। यह उनके जीवित रहने से अविभाज्य है। यदि मानवजाति का जीवित रहना एक समस्या बन जाता, तो क्या परमेश्वर का प्रबंधन जारी रह पाता? क्या परमेश्वर का प्रबंधन तब भी अस्तित्व में बना रहता? अतः परमेश्वर का प्रबंधन सम्पूर्ण मानवजाति के जीवित रहने के साथ साथ मौज़ूद है जिसका वह पालन पोषण करता है, और जो कुछ परमेश्वर सभी चीज़ों के लिए तैयार करता है और जो कुछ वह मनुष्यों के लिए करता है उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, क्योंकि यह सब उसके लिए ज़रूरी है, और यह मानवजाति के जीवित रहने के लिए अति महत्वपूर्ण है। यदि ये नियम जिन्हें परमेश्वर ने सभी चीज़ों के लिए निर्धारित किया था यहां से चले जाते, यदि इन नियमों को तोड़ा या नष्ट-भ्रष्ट कर दिया जाता, तो सभी चीज़ें आगे से अस्तित्व में बने रहने में सक्षम नहीं होतीं, जीवित रहने के लिए मानवजाति का वातावरण निरन्तर अस्तित्व में नहीं रहता, और न ही उनका दैनिक जीवन आधार, और न ही वे स्वयं निरन्तर अस्तित्व में रहते। इस कारण से, मानवजाति के उद्धार हेतु परमेश्वर का प्रबंधन भी आगे से अस्तित्व में नहीं रहता। यह कुछ ऐसा है जिसे लोगों को स्पष्ट रूप से देखना होगा।

हर चीज़ जिसकी हमने चर्चा की, हर एक चीज़, और हर एक मद प्रत्येक व्यक्ति के जीवित रहने से घनिष्टता से जुड़ा हुआ है। शायद तुम लोग कह सकते हो, "जिसके विषय में तुम बात कर रहे हो वह बहुत ही बड़ी है, हम इसे नहीं देख सकते हैं," और कदाचित् ऐसे लोग हैं जो कहेंगे "जो कुछ तुम कह रहे हो उसका मेरे साथ कोई लेना-देना नहीं है।" फिर भी, यह न भूलो कि तुम सभी चीज़ों के बस एक भाग के रूप में जी रहे हो; तुम परमेश्वर के शासन के अंतर्गत सभी चीजों के एक सदस्य हो। सभी चीज़ों को परमेश्वर के शासन से अलग नहीं किया जा सकता है, और न ही एक अकेला व्यक्ति स्वयं को उसके शासन से अलग कर सकता है। उसके नियम को खोने और उसके प्रयोजनों को खोने का अर्थ होगा कि लोगों का जीवन, अर्थात् देह में लोगों का जीवन लुप्त हो जाएगा। यह मानवजाति के लिए जीवित रहने हेतु परमेश्वर द्वारा स्थापित विभिन्न वातावरण का महत्व है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि तुम किस जाति के हो या तुम भूमि के किस हिस्से पर रहते हो, चाहे पश्चिम में हो या पूर्व में—तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए स्थापित किया है, और तुम जीवित रहने के लिए उस वातावरण के पोषण और प्रयोजनों से अपने आपको अलग नहीं कर सकते हो जिसे उसने मनुष्यों के लिए स्थापित किया है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी आजीविका क्या है, तुम जीने के लिए किस पर आश्रित हो, और देह में अपने जीवन को बनाए रखने के लिए तुम किस पर आश्रित हो, क्योंकि तुम स्वयं को परमेश्वर के शासन और प्रबंधन से अलग नहीं कर सकते हो। कुछ लोग कहते हैं: "मैं एक किसान नहीं हूं, मैं जीने के लिए फसल नहीं उगाता हूँ। मैं अपने भोजन के लिए आसमानों पर आश्रित नहीं हूँ, अतः मैं कह सकता हूँ कि मैं जीवित रहने के लिए परमेश्वर के द्वारा स्थापित उस वातावरण में नहीं जी रहा हूँ। उस प्रकार के वातावरण ने मुझे कुछ नहीं दिया है।" लेकिन यह सही नहीं है। और क्यों नहीं? तुम कहते हो कि तुम अपने जीने के लिए फसल नहीं उगाते हो, लेकिन क्या तुम अनाज नहीं खाते हो? क्या तुम मांस नहीं खाते हो? क्या तुम अण्डे नहीं खाते हो? क्या तुम सब्जियां और फल नहीं खाते हो? हर चीज़ जो तुम खाते हो, वे सभी चीज़ें जिनकी तुम्हें ज़रूरत है, वे जीवित रहने के लिए उस वातावरण से अविभाज्य हैं जिसे परमेश्वर के द्वारा मानवजाति के लिए स्थापित किया गया था। और हर चीज़ का स्रोत जिसकी ज़रूरत मानवजाति को है उसे परमेश्वर के द्वारा सृजी गई सभी चीज़ों से, और जीवित रहने के लिए इस प्रकार के विभिन्न वातावरण से अलग नहीं किया जा सकता है। वह जल जो तुम पीते हो, वे कपड़े जो तुम पहनते हो, और वे सभी चीज़ें जिन्हें तुम इस्तेमाल करते हो—इन में से किसे सभी चीज़ों के मध्य से प्राप्त नहीं किया जाता है? कुछ लोग कहते हैं: "कुछ ऐसे सामान हैं जिन्हें सभी चीज़ों से प्राप्त नहीं किया जाता है!" जैसे क्या? मुझे एक उदाहरण दो। कुछ कहते हैं: "तुम देखो, प्लास्टिक सभी चीज़ों से प्राप्त नहीं किया जाता है। यह एक रासायनिक चीज़, एवं मानव-निर्मित चीज़ है।" लेकिन यह सही नहीं है। क्यों नहीं? प्लास्टिक मानव-निर्मित है, यह एक रासायनिक चीज़ है, किन्तु प्लास्टिक के मूल तत्व कहां से आए थे? (वे परमेश्वर द्वारा निर्मित मूल चीज़ों से निकले थे।) मूल तत्वों को परमेश्वर द्वारा सृजी गई सामग्रियों से प्राप्त किया जाता है। वे चीज़ें जिनका तुम आनन्द उठाते हो, जो तुम देखते हो, हर एक चीज़ जिसका तुम उपयोग करते हो उन सब को सभी चीज़ों से प्राप्त किया जाता है जिन्हें परमेश्वर द्वारा सृजा गया है। दूसरे शब्दों में, कोई फर्क नहीं पड़ता कि जाति क्या है, कोई फर्क नहीं पड़ता कि जीविका कितनी है, या जीवित रहने के लिए लोग किस प्रकार के वातावरण में रहते हैं, क्योंकि वे अपने आपको परमेश्वर के प्रयोजनों से अलग नहीं कर सकते हैं।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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