परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 179

30 जुलाई, 2020

जब से परमेश्वर ने उन्हें सृजा, उन नियमों के आधार पर जिन्हें उसने निर्धारित किया था, तब से सभी चीज़ें नियमित रूप से संचालित हो रही हैं और निरन्तर विकसित हो रही हैं। उसकी टकटकी लगाती हुई निगाहों के अधीन, और उसके शासन के अधीन, सभी चीज़ें मनुष्यों के जीवित रहने के साथ-साथ नियमित रूप से विकसित हो रही हैं। कोई भी चीज़ इन विधियों को बदलने में सक्षम नहीं है, और न ही कोई भी चीज़ इन विधियों को नष्ट कर सकती है। यह परमेश्वर के शासन के कारण है कि सभी प्राणी बहुगुणित हो सकते हैं, और उसके शासन और प्रबंधन के कारण सभी प्राणी जीवित रह सकते हैं। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर के शासन के अधीन, सभी प्राणी अस्तित्व में आते हैं, पनपते हैं, लुप्त हो जाते हैं, और एक सुव्यवस्थित विधि से फिर से शरीर में आते हैं। जब बसंत का आगमन होता है, हल्की-हल्की बारिश बसंत के उस एहसास को लेकर आती है और पृथ्वी को नम करती है। बर्फीली ज़मीन पिघलना प्रारम्भ कर देती है, घास अंकुरित होती है और मिट्टी में से ऊपर की ओर बढ़ती है और वृक्ष धीरे-धीरे हरे हो जाते हैं। ये सभी जीवित चीज़ें पृथ्वी पर नई जीवन शक्ति लेकर आती हैं। यह सभी प्राणियों के अस्तित्व में आने और फलने-फूलने का दृश्य है। सभी प्रकार के पशु भी बसंत की गर्माहट को महसूस करने के लिए अपनी मांदों से बाहर आ जाते हैं और एक नए वर्ष की शुरूआत करते हैं। सभी प्राणी ग्रीष्म ऋतु की गर्माहट के दौरान धूप सेंकते हैं और मौसम के द्वारा लाई गई तपन का मज़ा लेते हैं। वे तीव्रता से बढ़ते हैं; पेड़, घास, और सभी प्रकार के पौधे बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं, फिर वे खिलते और फल उत्पन्न करते हैं। ग्रीष्म ऋतु के दौरान सभी प्राणी बहुत व्यस्त हैं, जिनमें मनुष्य भी शामिल हैं। वर्षा ऋतु में, बारिश शरद ऋतु की ठंडक को लेकर लाती है, और सब प्रकार के जीवित प्राणी फसलों की कटाई के मौसम का अनुभव लेना शुरू कर देते हैं। सभी प्राणी फल उत्पन्न करते हैं, और मनुष्य भी इन प्राणियों के वर्षा उत्पाद के कारण शीत ऋतु के लिए भोजन तैयार करने हेतु सब प्रकार की चीज़ों की फसल काटना शुरू कर देते हैं। शीत ऋतु में सभी प्राणी धीरे-धीरे ठंडक में आराम करना, एवं शांत होना प्रारम्भ कर देते हैं, और साथ ही लोग भी इस मौसम के दौरान विराम लेते हैं। बसंत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु और ग्रीष्म ऋतु से वर्षा ऋतु और वर्षा ऋतु से शरद ऋतु के ये परिवर्तनकाल-ये सभी परिवर्तन परमेश्वर द्वारा स्थापित नियमों के अनुसार घटित होते हैं। वह इन नियमों का उपयोग करके सभी प्राणियों और मनुष्यों की अगुवाई करता है और उसने मानवजाति के लिए एक समृद्ध और रंग बिरंगा जीवन का मार्ग स्थापित किया है, जीवित रहने के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार किया है जिसमें अलग अलग तापमान और अलग ऋतुएं होती हैं। जीवत रहने हेतु इन सुव्यवस्थित वातावरण के अंतर्गत, मनुष्य भी सुव्यवस्थित तरीके से जीवित रह सकता है और बहुगुणित हो सकता है। मनुष्य इन नियमों को नहीं बदल सकता है और न ही कोई व्यक्ति या प्राणी इन्हें तोड़ सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि दुनिया में क्या मूल परिवर्तन होते हैं, ये नियम लगातार अस्तित्व में बने रहते हैं और ये अस्तित्व में हैं क्योंकि परमेश्वर अस्तित्व में है। यह परमेश्वर के शासन और उसके प्रबंधन की वजह से है। इस प्रकार के सुव्यवस्थित, एवं कहीं बड़े वातावरण के साथ, इन नियमों और विधियों के अंतर्गत लोगों की ज़िन्दगियाँ आगे बढ़ती हैं। इन नियमों ने पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों को विकसित किया था, और लोग पीढ़ी दर पीढ़ी इन नियमों के भीतर रहकर जीवित बचे हैं। लोगों ने जीवित रहने के लिए प्राणियों और इस सुव्यवस्थित वातावरण का आनन्द लिया है जिसे परमेश्वर के द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्यों के लिए सृजा गया था। हालांकि लोगों को महसूस होता है कि इस प्रकार के नियम स्वाभाविक हैं, यद्यपि वे उन्हें पूरी तरह से मन से अलग कर देते हैं, और भले ही वे महसूस नहीं कर सकते हैं कि परमेश्वर इन नियमों का आयोजन कर रहा है, कि परमेश्वर इन नियमों पर शासन कर रहा है, फिर भी चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर इस अपरिवर्तनीय कार्य में हमेशा से लगा हुआ है। इस अपरिवर्तनीय कार्य में उसका उद्देश्य मानवता को जीवित रखने के लिए है, और इसलिए है कि मनुष्य निरन्तर बना रहे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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