परमेश्वर के दैनिक वचन : परमेश्वर को जानना | अंश 141

17 अक्टूबर, 2021

परमेश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और तब से उसने हमेशा मानव-जाति के जीवन का मार्गदर्शन किया है। चाहे मानव-जाति को आशीष देना हो, मनुष्य के लिए व्यवस्थाएँ और आज्ञाएँ जारी करना हो, या जीवन के लिए विभिन्न नियम निर्धारित करना हो, क्या तुम लोग जानते हो कि इन चीज़ों को करने में परमेश्वर का अभिप्रेत उद्देश्य क्या है? पहला, क्या तुम निश्चित रूप से कह सकते हो कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सब मानव-जाति की भलाई के लिए है? तुम लोगों को ये भव्य, खोखले शब्दों की तरह लग सकते हैं, किंतु भीतर के विवरण की जाँच करने पर क्या वह सब जो परमेश्वर करता है, एक सामान्य जीवन जीने की दिशा में मनुष्य की अगुआई और मार्गदर्शन करने के लिए नहीं है? चाहे वह मनुष्य से अपने नियमों का पालन करवाना हो या अपनी व्यवस्थाओं का पालन करवाना, परमेश्वर का उद्देश्य है कि मनुष्य शैतान की आराधना न करने लगे और उसके कारण हानि न उठाए; यह सबसे मूलभूत बात है, और यही वह काम है जिसे बिलकुल शुरुआत में किया गया था। बिलकुल शुरुआत में, जब मनुष्य परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझता था, तब उसने कुछ सरल व्यवस्थाएँ और नियम बनाए और ऐसे विनियम बनाए, जिनमें हर ऐसे पहलू का समावेश था, जिसकी कल्पना की जा सकती थी। ये विनियम सरल हैं, फिर भी उनमें परमेश्वर की इच्छा शामिल है। परमेश्वर मानव-जाति को सँजोता है, उसका पोषण करता है और उससे बहुत प्रेम करता है। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) तो क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय पवित्र है? क्या हम कह सकते हैं कि उसका हृदय साफ है? (हाँ।) क्या परमेश्वर के कोई अतिरिक्त इरादे हैं? (नहीं।) तो क्या उसका यह उद्देश्य सही और सकारात्मक है? (हाँ।) अपने कार्य के दौरान परमेश्वर ने जो भी विनियम बनाए हैं, उन सबका प्रभाव मनुष्य के लिए सकारात्मक है, और वे उसका मार्ग प्रशस्त करते हैं। तो क्या परमेश्वर के मन में कोई स्वार्थपूर्ण विचार हैं? जहाँ तक मनुष्य का संबंध है, क्या परमेश्वर के कोई अतिरिक्त उद्देश्य हैं? क्या परमेश्वर किसी तरह से मनुष्य का उपयोग करना चाहता है? (नहीं।) जरा भी नहीं। परमेश्वर वही करता है, जो वह कहता है और उसके वचन और कार्य उसके हृदय के विचारों से मेल खाते हैं। इसमें कोई दूषित उद्देश्य नहीं है, कोई स्वार्थपूर्ण विचार नहीं हैं। वह अपने लिए कुछ नहीं करता, जो कुछ भी वह करता है, मनुष्य के लिए करता है, बिना किसी व्यक्तिगत उद्देश्य के। हालाँकि उसकी अपनी योजनाएँ और इरादे हैं, जिन्हें वह मनुष्य पर लागू करता है, पर उनमें से कुछ भी उसके अपने लिए नहीं है। वह जो कुछ भी करता है, विशुद्ध रूप से मानव-जाति के लिए करता है, मानव-जाति को बचाने के लिए, उसे गुमराह न होने देने के लिए करता है। तो क्या उसका यह हृदय बहुमूल्य नहीं है? क्या तुम इस बहुमूल्य हृदय का लेशमात्र संकेत भी शैतान में देख सकते हो? तुम इसका लेशमात्र संकेत भी शैतान में नहीं देख सकते। परमेश्वर जो कुछ करता है, वह सहज रूप से प्रकट होता है। आओ, अब परमेश्वर के कार्य करने के तरीके को देखें; वह अपना काम कैसे करता है? क्या परमेश्वर इन व्यवस्थाओं और अपने वचनों को लेकर वशीकरण मंत्र की तरह हर आदमी के सिर पर कसकर बाँध देता है और इस प्रकार उन्हें प्रत्येक मनुष्य पर थोपता है? क्या वह इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) तो फिर परमेश्वर किस तरह से अपना कार्य करता है? (वह हमारा मार्गदर्शन करता है। वह हमें सलाह और प्रोत्साहन देता है।) क्या वह धमकाता है? क्या वह तुमसे गोल-मोल बात करता है? (नहीं।) जब तुम सत्य को नहीं समझते, तो परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे करता है? (वह ज्योति चमकाता है।) वह तुम पर एक ज्योति चमकाकर तुम्हें स्पष्ट रूप से बताता है कि यह चीज़ सत्य के अनुरूप नहीं है, और फिर वह तुम्हें बताता है कि तुम्हें क्या करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य करने के इन तरीकों से तुम्हें क्या लगता है, परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता कैसा है? क्या तुम्हें लगता है कि परमेश्वर तुम्हारी समझ से परे है? (नहीं।) तो परमेश्वर के कार्य करने के इन तरीकों को देखकर तुम्हें कैसा महसूस होता है? परमेश्वर विशेष रूप से तुम्हारे बहुत करीब है; तुम्हारे और परमेश्वर के बीच में कोई दूरी नहीं है। जब परमेश्वर तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, जब वह तुम्हारी ज़रूरतें पूरी करता है, तुम्हारी सहायता करता है और तुम्हें सहारा देता है, तो तुम्हें महसूस होता है कि परमेश्वर कितना सौम्य है, तुम्हारे मन में उसके प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, तुम महसूस करते हो कि वह कितना प्यारा है, तुम उसकी गर्मजोशी महसूस करते हो। लेकिन जब परमेश्वर तुम्हारी भ्रष्टता के लिए तुम्हारी भर्त्सना करता है, या जब वह अपने विरुद्ध विद्रोह करने के लिए तुम्हारा न्याय करता है और तुम्हें अनुशासित करता है, तो परमेश्वर किन तरीकों का इस्तेमाल करता है? क्या वह वचनों से तुम्हारी भर्त्सना करता है? क्या वह तुम्हारे वातावरण और लोगों, मामलों और चीज़ों के माध्यम से तुम्हें अनुशासित करता है? (हाँ।) परमेश्वर किस सीमा तक तुम्हें अनुशासित करता है? क्या परमेश्वर मनुष्य को उतनी ही मात्रा में अनुशासित करता है, जितनी मात्रा में शैतान मनुष्य को नुकसान पहुँचाता है? (नहीं, परमेश्वर मनुष्य को केवल उसी सीमा तक अनुशासित करता है, जिस सीमा तक वह सह सकता है।) परमेश्वर सौम्य, कोमल, प्यारे और परवाह करने के तरीके से कार्य करता है, जो असाधारण रूप से नपा-तुला और उचित होता है। उसका तरीका तुम्हारे भीतर तीव्र भावनात्मक प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न नहीं करता, जैसे कि : "परमेश्वर को मुझे यह करने देना चाहिए" या "परमेश्वर को मुझे वह करने देना चाहिए।" परमेश्वर कभी तुम्हें उस किस्म की मानसिक या भावनात्मक तीव्रता नहीं देता, जो चीज़ों को असहनीय बना देती है। क्या ऐसा नहीं है? यहाँ तक कि जब तुम परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के वचनों को स्वीकार करते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? जब तुम परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्य को समझते हो, तब तुम कैसा महसूस करते हो? क्या तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर दिव्य और अनुल्लंघनीय है? (हाँ।) क्या उस समय तुम अपने और परमेश्वर के बीच दूरी महसूस करते हो? क्या तुम्हें परमेश्वर से डर लगता है? नहीं—बल्कि तुम परमेश्वर के लिए भयपूर्ण श्रद्धा महसूस करते हो। क्या लोग ये चीज़ें परमेश्वर के कार्य के कारण महसूस नहीं करते? यदि शैतान मनुष्य पर काम करता, तो क्या तब भी उनमें ये भावनाएँ होतीं? (नहीं।) परमेश्वर अपने वचनों, अपने सत्य और अपने जीवन का प्रयोग मनुष्य को निरंतर पोषण प्रदान करने और उसे सहारा देने के लिए करता है। जब मनुष्य कमज़ोर होता है, जब मनुष्य मायूसी महसूस करता है, तब निश्चित रूप से परमेश्वर यह कहते हुए कठोरता से बात नहीं करता कि, "मायूस मत हो! इसमें मायूस होने की क्या बात है? तुम कमज़ोर क्यों हो? इसमें कमज़ोर होने का क्या कारण है? तुम हमेशा कितने कमज़ोर हो, और तुम हमेशा कितने नकारात्मक रहते हो! तुम्हारे जिंदा रहने का क्या फायदा है? मर जाओ और किस्सा खत्म करो!" क्या परमेश्वर इस तरह से कार्य करता है? (नहीं।) क्या परमेश्वर के पास इस तरह से कार्य करने का अधिकार है? (हाँ।) फिर भी परमेश्वर इस तरह से कार्य नहीं करता। परमेश्वर के इस तरह से कार्य नहीं करने की वजह है उसका सार, परमेश्वर की पवित्रता का सार। मनुष्य के लिए उसके प्रेम को, उसके द्वारा मनुष्य को सँजोकर रखने और उसका पोषण करने को, स्पष्ट रूप से एक-दो वाक्यों में अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता। यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है, जो मनुष्य की डींगों में घटित होती हो, बल्कि परमेश्वर इसे वास्तविक रूप से अमल में लाता है; यह परमेश्वर के सार का प्रकटीकरण है। क्या ये सभी तरीके, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, मनुष्य को परमेश्वर की पवित्रता दिखा सकते हैं? इन सभी तरीकों से, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे शामिल हैं, जिनमें वे प्रभाव शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर लागू करना चाहता है, जिनमें वे विभिन्न तरीके शामिल हैं जिन्हें परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करने के लिए अपनाता है, जिनमें उस प्रकार का कार्य शामिल है जिसे वह करता है, वह मनुष्य को क्या समझाना चाहता है—क्या तुमने परमेश्वर के अच्छे इरादों में कोई बुराई या धोखा देखा है? (नहीं।) तो जो कुछ परमेश्वर करता है, जो कुछ परमेश्वर कहता है, जो कुछ वह अपने हृदय में सोचता है, उसमें और साथ ही परमेश्वर के समस्त सार में, जिसे वह प्रकट करता है—क्या हम परमेश्वर को पवित्र कह सकते हैं? (हाँ।) क्या किसी मनुष्य ने संसार में, या अपने अंदर कभी ऐसी पवित्रता देखी है? परमेश्वर को छोड़कर, क्या तुमने इसे कभी किसी मनुष्य या शैतान में देखा है? (नहीं।) अपनी अब तक की चर्चा के आधार पर, क्या हम परमेश्वर को अद्वितीय, स्वयं पवित्र परमेश्वर कह सकते हैं? (हाँ।) परमेश्वर के वचनों सहित वह सब-कुछ, जो परमेश्वर मनुष्य को देता है, वे विभिन्न तरीके जिनके द्वारा परमेश्वर मनुष्य पर कार्य करता है, जो परमेश्वर मनुष्य से कहता है, जिसकी परमेश्वर मनुष्य को याद दिलाता है, वह जो सलाह और प्रोत्साहन देता है—यह सब एक सार से उत्पन्न होता है : परमेश्वर की पवित्रता से। यदि कोई ऐसा पवित्र परमेश्वर न होता, तो कोई मनुष्य उसके कार्य को करने के लिए उसका स्थान न ले पाता। यदि परमेश्वर ने इन लोगों को पूरी तरह से शैतान को सौंप दिया होता, तो क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि तुम किस हालत में होते? क्या तुम सब यहाँ सही-सलामत बैठे होते? क्या तुम भी यह कहोगे : "इधर-उधर घूमते-फिरते और डोलते-डालते आया हूँ"? क्या तुम इतने बेशरम, ढीठ और अकड़ू होगे कि ऐसे शब्द बोलो और परमेश्वर के सामने निर्लज्जता से डींग हाँको? (हाँ।) बेशक, तुम बिलकुल ऐसा ही करोगे! मनुष्य के प्रति शैतान का रवैया उसे यह देखने का मौका देता है कि शैतान का स्वभाव और सार परमेश्वर से पूर्णतः अलग है। शैतान के सार की वह कौन-सी बात है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है? (शैतान की दुष्टता।) शैतान का दुष्ट स्वभाव परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत है। अधिकतर लोगों द्वारा परमेश्वर के इस प्रकटीकरण और परमेश्वर की पवित्रता के इस सार को न पहचान पाने का कारण यह है कि वे शैतान के प्रभुत्व के अधीन, शैतान की भ्रष्टता के अंतर्गत और शैतान के जीवन जीने के दायरे के भीतर रहते हैं। वे नहीं जानते कि पवित्रता क्या है या पवित्रता को कैसे परिभाषित किया जाए। यहाँ तक कि परमेश्वर की पवित्रता को समझ लेने के बाद भी तुम किसी निश्चय के साथ उसे परमेश्वर की पवित्रता के रूप में परिभाषित नहीं कर सकते। यह परमेश्वर की पवित्रता के संबंध में मनुष्य के ज्ञान की विसंगति है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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