परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 138

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 138

91 |02 अगस्त, 2020

मनुष्य के लिए यहोवा परमेश्वर की आज्ञा

(उत्पत्ति 2:15-17) तब यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को लेकर अदन की वाटिका में रख दिया, कि वह उसमें काम करे और उसकी रक्षा करे। और यहोवा परमेश्‍वर ने आदम को यह आज्ञा दी, "तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्य मर जाएगा।"

सर्प के द्वारा स्त्री को बहकाया जाना

(उत्पत्ति 3:1-5) यहोवा परमेश्‍वर ने जितने बनैले पशु बनाए थे, उन सब में सर्प धूर्त था; उसने स्त्री से कहा, "क्या सच है कि परमेश्‍वर ने कहा, 'तुम इस वाटिका के किसी वृक्ष का फल न खाना'?" स्त्री ने सर्प से कहा, "इस वाटिका के वृक्षों के फल हम खा सकते हैं; पर जो वृक्ष वाटिका के बीच में है, उसके फल के विषय में परमेश्‍वर ने कहा है कि न तो तुम उसको खाना और न उसको छूना, नहीं तो मर जाओगे।" तब सर्प ने स्त्री से कहा, "तुम निश्‍चय न मरोगे! वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।"

ये दोनों अंश बाइबिल की किस किताब के लघु अंश हैं? (उत्पत्ति।) क्या तुम सभी इन दोनों अंशों से परिचित हो? यह कुछ ऐसा था जो आरम्भ में हुआ था जब पहली बार मानवजाति को सृजा गया था; यह एक वास्तविक घटना है। सबसे पहले आओ हम यह देखें कि यहोवा परमेश्वर ने आदम और हव्वा को किस प्रकार की आज्ञा दी थी, जैसे कि इस आज्ञा की विषयवस्तु आज हमारे शीर्षक के लिए अत्यंत आवश्यक है। "और यहोवा परमेश्वर ने आदम को यह आज्ञा दी...." निम्नलिखित अंश को निरन्तर पढ़ते रहो। ("तू वाटिका के सब वृक्षों का फल बिना खटके खा सकता है; पर भले या बुरे के ज्ञान का जो वृक्ष है, उसका फल तू कभी न खाना: क्योंकि जिस दिन तू उसका फल खाएगा उसी दिन अवश्‍य मर जाएगा।") इस अंश में मनुष्य को दी गई परमेश्वर की आज्ञा में क्या शामिल है? पहला, परमेश्वर मनुष्य को बताता है कि वह क्या खा सकता है, वहाँ सभी किस्म के पेड़ों के फल मौजूद थे। इसमें कोई खतरा या ज़हर नहीं है, सब कुछ खाया जा सकता है और बिना किसी सन्देह के अपनी इच्छा के अनुसार खाया जा सकता है। यह एक भाग है। दूसरा भाग एक चेतावनी है। यह चेतावनी मनुष्य को बताता है कि वह किस वृक्ष के फल को नहीं खा सकता है? (भले और बुरे के ज्ञान का वृक्ष।) उसे भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष से फल नहीं खाना चाहिए। यदि वह ऐसा करता है तब क्या होगा? (वह निश्चय ही मर जाएगा।) परमेश्वर ने मनुष्य से कहाः यदि तुम इसे खाओगे तो निश्चय ही मर जाओगे। क्या ये वाक्य स्पष्ट नहीं हैं? (हाँ।) यदि परमेश्वर ने तुम सब से यह कहा है किन्तु तुम लोग इसे नहीं समझ पाते हो कि ऐसा क्यों कहा, तो क्या तुम सब इसके साथ एक नियम या एक आज्ञा के रूप में व्यवहार करते जिसका पालन किया जाना चाहिए? इसका पालन किया जाना चाहिए, पालन नहीं किया जाना चाहिए? परन्तु मनुष्य इसका पालन करने के योग्य है या नहीं, परमेश्वर के वचन पूरी तरह से स्पष्ट हैं। परमेश्वर ने मनुष्य को बिलकुल साफ-साफ कहा कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है, और क्या होगा यदि वह उसे खाता है जिसे उसे नहीं खाना चाहिए। क्या तुम सब ने इन संक्षिप्त शब्दों में परमेश्वर के स्वभाव को देखा है जिसे परमेश्वर ने कहा था? क्या परमेश्वर के ये वचन सत्य हैं? (हाँ।) क्या इसमें कोई छलावा है? (नहीं।) क्या इसमें कोई झूठ है? (नहीं।) क्या इसमें कुछ भी डरावना है? (नहीं।) परमेश्वर ने ईमानदारी से, सच्चाई से और सत्यनिष्ठा से मनुष्य को बताया था कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है, जो स्पष्ट और सरल है। क्या इन वचनों में कोई छिपा हुआ अर्थ है? क्या ये वचन सरल हैं? एक झलक में उनका अर्थ स्पष्ट है, जैसे ही तुम सब इसे देखते हो तुम सब इसे समझ जाते हो। क्या अनुमान लगाने की कोई आवश्यकता है? (नहीं।) अंदाज़ा लगाना जरुरी नहीं है, ठीक है? यह पहले से ही बिल्कुल स्पष्ट है। परमेश्वर के मस्तिष्क में, जो कुछ वह कहना चाहता है, जो कुछ वह अभिव्यक्त करना चाहता है, वह उसके हृदय से आता है। ऐसी चीज़ें जिन्हें परमेश्वर व्यक्त करता है वे स्पष्ट, सरल एवं साफ हैं। यहाँ गुप्त इरादे या कोई छिपा हुआ अर्थ नहीं हैं। वह मनुष्य से सीधे बातचीत करता है, यह कहते हुए कि वह क्या खा सकता है और क्या नहीं खा सकता है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर के इन वचनों के माध्यम से मनुष्य देख सकता है कि परमेश्वर का हृदय पारदर्शी है, और यह कि उसका हृदय सच्चा है। यहाँ पर बिल्कुल भी झूठ नहीं है, तुम लोगों को यह कहते हुए कि जो खाने के लायक है उसे तुम सब नहीं खा सकते हो या यह कहते हुए कि "इसे करो और देखो कि क्या होता है" उन चीज़ों के साथ जिन्हें तुम सब नहीं खा सकते हो। क्या इसका अर्थ यह है? (नहीं।) जो कुछ भी परमेश्वर अपने हृदय में सोचता है वही कहता है। यदि मैं कहूँ कि परमेश्वर पवित्र है क्योंकि वह इस प्रकार से इन वचनों में अपने आपको दिखाता और प्रगट करता है, तो हो सकता है कि तुम सब थोड़ा बहुत ऐसा महसूस करो कि मैंने बिना किसी बात पर बहुत बड़ा सौदा कर लिया है या मैंने अपनी व्याख्या को थोड़ी दूर तक खींच दिया है। यदि ऐसा है, तो चिंता मत करो, हमने अभी तक समाप्त नहीं किया है।

आओ हम "सर्प के द्वारा स्त्री को प्रलोभन" देने के विषय में बातचीत करें। यह सांप कौन है? (शैतान।) शैतान ने परमेश्वर के छः हज़ार वर्षों की प्रबंधकीय योजना में एक महीन परत की भूमिका निभाई है, और यह वह भूमिका है जिसका जिक्र करने से हम नहीं चूकते हैं जब हम परमेश्वर की पवित्रता की संगति करते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? (क्योंकि शैतान उन सब का प्रतिनिधि एवं रचनाकार है जो घिनौना एवं भ्रष्ट है।) यदि तू शैतान और शैतान के स्वभाव की बुराई एवं भ्रष्टता को नहीं जानता है, तो तेरे पास इसे पहचानने का कोई तरीका नहीं है, न ही तू यह जान सकता है कि पवित्रता वास्तव में क्या है। भ्रम की स्थिति में, लोग यह विश्वास करते हैं कि शैतान जो कुछ करता है वह सही है, क्योंकि वे इस प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव के अंतर्गत जीते हैं। बिना किसी महीन परत के, जहाँ तुलना करने के लिए कुछ भी नहीं है, तो तू नहीं जान सकता है कि पवित्रता क्या है, अतः यहाँ पर इस विषय का उल्लेख करना होगा। हमने शून्य से इस विषय को इकट्ठानहीं किया है, परन्तु इसके बजाय हम इसके शब्दों एवं कार्यों से देखेंगे कि शैतान कैसे काम करता है, वह मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है, उसके पास किस प्रकार का स्वभाव है और उसका चेहरा किसके समान है। अतः इस स्त्री ने सर्प से क्या कहा था? जो कुछ यहोवा परमेश्वर ने स्त्री से कहा था उसने उसे सांप के सामने दोहराया। जो कुछ उसने कहा था उसके द्वारा न्याय करते हुए, जो कुछ परमेश्वर ने उससे कहा था क्या उसने उन सबकी पुष्टि की? वह इसकी पुष्टि नहीं कर सकती थी, क्या वह कर सकती थी? एक ऐसे प्राणी के रूप में जिसे नए रूप में सृजा गया था, उसके पास भले एवं बुरे को परखने की कोई योग्यता नहीं थी, न ही उसमें उसके आस पास की किसी भी चीज़ को जानने की योग्यता थी। ऐसे शब्द जो उसने सर्प से कहा था वे हमें बताते हैं कि उसने अपने हृदय में सही रीति से परमेश्वर के वचनों की पुष्टि नहीं की थी; उसके पास संशयवादी मनोवृत्ति थी। अतः जब सर्प ने देखा कि स्त्री के पास परमेश्वर के वचनों के प्रति कोई निश्चित मनोवृत्ति नहीं है, तो उसने कहा, "तुम निश्‍चय न मरोगे! वरन् परमेश्‍वर आप जानता है कि जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी, और तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।" क्या इन शब्दों में कुछ ग़लत है? जब तुम सब इस वाक्य को पढ़ना समाप्त कर लेते हो, तो क्या तुम लोगों को सर्प के इरादों का कोई आभास होता है? (हाँ।) सर्प के पास क्या इरादे हैं? (मनुष्य को पाप करने के लिए लुभाने हेतु।) वह उस स्त्री को लुभाना चाहता है ताकि वह परमेश्वर के वचनों को ध्यान से सुनने से उसे रोके, परन्तु क्या उसने इसे सीधे तौर पर कहा था? (नहीं।) उसने सीधे तौर पर नहीं कहा था, अतः हम कह सकते हैं कि वह बहुत ही चालाक है। वह अपने इच्छित उद्देश्य तक पहुंचने के लिए धूर्त एवं कपटपूर्ण तरीके से इसके अर्थ को व्यक्त करता है जिससे यह मनुष्य के भीतर ही छिपा रहे—यह सर्प की धूर्तता है। शैतान ने सदा इस प्रकार से ही बातचीत और कार्य किया है। एक अर्थ या दूसरे अर्थ की पुष्टि किए बिना ही, वह कहता है "निश्चय नहीं।" परन्तु इसे सुनने के बाद, क्या इस अबोध स्त्री का हृदय द्रवित हुआ था? (हाँ।) शैतान प्रसन्न हो गया चूँकि उसके शब्दों ने इच्छित प्रभाव को प्राप्त कर लिया था—यह सर्प का धूर्त इरादा था। इसके अतिरिक्त, एक परिणाम का वादा करके जिसे मनुष्य एक अच्छा परिणाम मानता था, उसने उसे बहका दिया था, यह कहते हुए कि, "जिस दिन तुम उसका फल खाओगे उसी दिन तुम्हारी आँखें खुल जाएँगी।" इसलिए वह विचार करती है, "मेरी आखों का खुलना तो एक अच्छी बात है!" तब सर्प और भी अच्छे शब्दों को बोलता है, ऐसे शब्द जो मनुष्य के लिए अनजान हैं, ऐसे शब्द जो उन लोगों के ऊपर प्रलोभन का एक बड़ा सामर्थ्य रखते हैं जो उन्हें सुनते हैं: "तुम भले बुरे का ज्ञान पाकर परमेश्‍वर के तुल्य हो जाओगे।" क्या ये शब्द उसके लिए बहुत ही अधिक प्रलोभन देनेवाले हैं? (हाँ।) यह किसी ऐसे के समान है जो तूझे कहता है: "तुम्हारे चेहरे को बहुत ही अच्छी तरह आकार दिया गया है। बस नाक के पास थोड़ा सा छोटा रह गया है, परन्तु यदि तू इसे सुधार ले, तो तेरी सुन्दरता विश्वस्तरीय होगी!" क्योंकि कोई ऐसा व्यक्ति जिसने कभी सौन्दर्य शल्यचिकित्सा नहीं कराना चाहा है, क्या इन शब्दों को सुनकर उनका हृदय द्रवित नहीं हो जाएगा? (हाँ।) अतः क्या ये शब्द प्रलोभन देने वाले हैं? क्या यह प्रलोभन तेरी परीक्षा ले रहा है? क्या यह एक परीक्षण है? (हाँ।) क्या परमेश्वर ऐसी बातें कहता है जो इसके समान है? (नहीं।) क्या इसके विषय में परमेश्वर के वचनों में कोई संकेत था जिसे हमने बस अभी अभी देखा था? (नहीं।) क्यों? क्या परमेश्वर उसे कहता है जिसे वह अपने दिल में सोचता है? क्या मनुष्य परमेश्वर के वचनों के माध्यम से उसके हृदय को देख सकता है? (हाँ।) परन्तु जब सर्प ने स्त्री से उन शब्दों को कहा था, तब क्या तू उसके हृदय को देख सकता था? (नहीं।) और मनुष्य की अज्ञानता के कारण, सर्प के शब्दों के द्वारा उन्हें आसानी से बहकाया गया था, उन्हें आसानी से कांटे में फंसाया गया था, और आसानी से ले जाया गया था। अतः क्या तू शैतान के इरादों को देख सकता था? जो कुछ उसने कहा था क्या तू उसके पीछे के उद्देश्य को देख सकता था? क्या तू उसकी साजिश एवं उसकी धूर्त युक्तियों को देख सकता था? (नहीं।) शैतान की बातचीत के तरीके के द्वारा किस प्रकार के स्वभाव को दर्शाया जाता है? इन शब्दों के माध्यम से तूने शैतान में किस प्रकार का सार देखा है? (बुरा।) बुरा। क्या यह भयानक है? कदाचित् ऊपर से वह तुझ पर मुस्कुराता है या किसी भी प्रकार की भाव भंगिमा को प्रकट नहीं करता है। परन्तु अपने हृदय में वह गणना कर रहा है कि किस प्रकार अपने उद्देश्य तक पहुंचा जाए, और यही वह उद्देश्य है जिसे देखने में तू असमर्थ है। तब तू उन सभी प्रतिज्ञाओं के द्वारा बहकाया जाता है जो वह तुझसे करता है, उन सभी फायदों के द्वारा बहकाया जाता है जिनके विषय में वह बात करता है। तुझे वे अच्छे दिखाई देते हैं, और तुझे महसूस होता है कि जो कुछ वह कहता है वह और भी अधिक उपयोगी है, और जो कुछ परमेश्वर कहता है उससे भी अधिक बड़ा है। जब यह होता है, तब क्या मनुष्य एक अधीन कैदी नहीं बन जाता है? (हाँ।) अतः क्या इसका अर्थ यह है कि शैतान के द्वारा उपयोग किया जाना पैशाचिक नहीं है? तू स्वयं को नीचे डूबाने देता है। बिना कुछ किए, इन दो वाक्यों द्वारा तुझसे खुशी-खुशी इसका अनुसरण करवाया जाता है, तुझसे इसका पालन करवाया जाता है। इसके उद्देश्य को प्राप्त कर लिया गया है। क्या ऐसा ही नहीं है? (हाँ।) क्या यह इरादा भयंकर नहीं है? क्या यह शैतान का असली चेहरा नहीं है? (हाँ।) शैतान के शब्दों से, मनुष्य उसके भयंकर इरादों को देख सकता है, उसके भयंकर चेहरे और उसके सार को देख सकता है। क्या यह सही नहीं है? (हाँ।) बिना समीक्षा किए, इन वाक्यों की तुलना करके, शायद तू सोच सकता है कि यहोवा के वचन सुस्त, साधारण एवं सामान्य हैं, यह कि वे परमेश्वर की ईमानदारी की स्तुति करने के विषय में बहुत अधिक ध्यान दिए जाने के लायक नहीं हैं। जब हम शैतान के शब्दों और उसके भयंकर चेहरे को लेते हैं और उन्हें एक महीन परत के रूप में उपयोग करते हैं, फिर भी, क्या आज के लोगों के लिए परमेश्वर के ये वचन बड़ा प्रभाव रखते हैं? (हाँ।) इस महीन परत के माध्यम से, मनुष्य परमेश्वर की पवित्र त्रुटिहीनता का आभास कर सकता है। क्या ऐसा कहने में मैं सही हूँ? (हाँ।) हर एक शब्द जिसे शैतान कहता है साथ ही साथ उसके प्रयोजन, इसके इरादे और जिस रीति से वह बोलता है—वे सब मिलावटी हैं। उसके बोलने के तरीके की मुख्य विशेषता क्या है? तुझे बिना दिखाए ही वह तुझे मोहित करने के लिए वाक्छल का उपयोग करता है, न ही वह तुझे यह परखने देता है कि उसका उद्देश्य क्या है; वह तुझे चारे को लेने देता है, और तुझसे अपनी स्तुति करवाता है और अपनी विशेष योग्यताओं के गीत गवाता है। क्या यह मामला है? (हाँ।) क्या यह शैतान की सतत चाल नहीं है? (हाँ।)

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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