परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 127

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 127

0 |13 जुलाई, 2020

नियति पर विश्वास करना सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान के लिए कोई स्थानापन्न (के बदले में) नहीं है

इतने वर्षों तक परमेश्वर के अनुयायी बने रहने के पश्चात्, क्या नियति के विषय में तुम लोगों के ज्ञान एवं संसारिक लोगों के ज्ञान के मध्य कोई ठोस अन्तर है? क्या तुम सब सचमुच में सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारण को समझ गए हो, और सचमुच में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जान गए हैं? कुछ लोगों के पास इस वाक्यांश "यह नियति है" की गहन, एवं गहराई से महसूस की जाने वाली समझ होती है, फिर भी वे परमेश्वर की संप्रभुता पर जरा सा भी विश्वास नहीं करते हैं, यह विश्वास नहीं करते हैं कि मनुष्य की नियति को परमेश्वर के द्वारा व्यवस्थित एवं आयोजित किया जाता है, और वे परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन होने के लिए तैयार नहीं हैं। इस प्रकार के लोग मानो ऐसे हैं जो महासागर में इधर-उधर बहते रहते हैं, लहरों के द्वारा उछाले जाते हैं, जलधारा के साथ साथ तैरते रहते हैं, निष्क्रियता से इंतज़ार करने और अपने आपको नियति पर छोड़ देने के आलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं होता है। फिर भी वे नहीं पहचानते हैं कि मानव की नियति परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; वे अपने स्वयं के प्रारम्भिक प्रयासों से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान सकते हैं, उसके द्वारा परमेश्वर के अधिकार की पहचान को हासिल नहीं कर सकते हैं, परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों के अधीन नहीं हो सकते हैं, नियति का प्रतिरोध करना बन्द नहीं कर सकते हैं, और परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा एवं मार्गदर्शन के अधीन नहीं जी सकते हैं। दूसरे शब्दों में, नियति को स्वीकार करना सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन होने के समान नहीं है; नियति में विश्वास करने का अर्थ यह नहीं है कि कोई व्यक्ति सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता, पहचानता एवं जानता है; नियति में विश्वास करना मात्र इस तथ्य एवं इस बाहरी घटना की पहचान है, जो इस बात को जानने से अलग है कि किस प्रकार सृष्टिकर्ता मानवता की नियति पर शासन करता है, और इस बात को पहचानने से अलग है कि सभी चीज़ों की नियति से बढ़कर सृष्टिकर्ता ही प्रभुत्व का स्रोत है, और उससे बढ़कर मानवता की नियति के लिए सृष्टिकर्ता के आयोजनों एवं इंतज़ामों के प्रति समर्पण से अलग है। यदि कोई व्यक्ति केवल नियति पर ही विश्वास करता है—यहाँ तक कि इसके विषय में गहराई से एहसास करता है—परन्तु इसके द्वारा मानवता की नियति के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने, पहचानने, उसके अधीन होने, एवं उसे स्वीकार करने में समर्थ नहीं है, तो उस पुरुष या स्त्री का जीवन इसके बावजूद भी एक त्रासदी, व्यर्थ में बिताया गया जीवन, एवं खाली होगा; वह तब भी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन होने, उस वाक्यांश के सच्चे अर्थ के रूप में एक सृजा गया मानव प्राणी बनने, और सृष्टिकर्ता की मंज़ूरी का आनन्द उठाने में असमर्थ होगा या होगी। कोई व्यक्ति जो सचमुच में सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानता एवं अनुभव करता है उसे सक्रिय अवस्था में होना चाहिए, न कि निष्क्रिय या असहाय अवस्था में। जबकि उसी समय यह स्वीकार करना कि सभी चीज़ें नियति के द्वारा तय हैं, तो वह जीवन एवं नियति के विषय में एक सटीक परिभाषा को धारण करता है या करती है: यह कि प्रत्येक जीवन सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन है। जब कोई व्यक्ति पीछे मुड़कर उस मार्ग को देखता है जिस पर वह चला था, जब कोई व्यक्ति अपनी यात्रा के हर एक पहलू को पुनः स्मरण करता है, तो वह देखता है कि हर एक कदम पर, चाहे उसका मार्ग कठिन था या सरल, परमेश्वर उसके पथ का मार्गदर्शन कर रहा था, और उसकी योजना बना रहा था। ये परमेश्वर के बहुत सावधानी से किए गए इंतज़ाम थे, और उसकी सतर्क योजना थी, जिन्होंने आज तक, अनजाने में, किसी व्यक्ति की अगुवाई की है। सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करने, एवं उसके उद्धार को प्राप्त करने के योग्य होना—यह कितना महान सौभाग्य है! यदि नियति के प्रति किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति निष्क्रिय है, तो यह साबित करता है कि वह हर एक चीज़ का विरोध कर रहा है या कर रही है जिसे परमेश्वर ने उस पुरुष या स्त्री के लिए बनाया है, और यह कि उस पुरुष या स्त्री के पास समर्पण की मनोवृत्ति नहीं है। यदि परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति सक्रिय है, तो जब वह अपनी यात्रा को पीछे मुड़कर देखता है, जब वह सचमुच में परमेश्वर की संप्रभुता को समझना शुरू कर देता है, तो वह और भी अधिक निष्ठा से हर एक चीज़ के अधीन होना चाहेगा जिसका परमेश्वर ने इंतज़ाम किया है, उसके पास उसकी नियति को प्रदर्शित करने हेतु परमेश्वर को अनुमति देने के लिए, और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह रोकने के लिए और अधिक दृढ़ निश्चय एवं दृढ़ विश्वास होगा। क्योंकि वह देखता है कि जब वह नियति को नहीं बूझ पाता है, जब वह परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझता है, जब वह जानबूझकर अंधेरे में टटोलते हुए आगे बढ़ता है, कोहरे के बीच लड़खड़ाता एवं डगमगाता है, तो यात्रा बहुत ही कठिन है, और बहुत ही दुखदाई। अतः जब लोग मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता को पहचान जाते हैं, तो बुद्धिमान मनुष्य इसे जानने एवं स्वीकार करने, और दर्द से भरे हुए उन दिनों को अलविदा कहने का चुनाव करते हैं जब उन्होंने अपने दोनों हाथों से एक अच्छे जीवन का निर्माण करने के लिए प्रयास किया था, बजाए इसके कि अपने स्वयं के तरीकों से नियति के विरुद्ध लगातार संघर्ष करें और अपने तथाकथित जीवन के लक्ष्यों का अनुसरण करें। जब किसी व्यक्ति के पास परमेश्वर नहीं है, जब वह उसे देख नहीं सकता है, जब वह स्पष्ट रूप से परमेश्वर की संप्रभुता को देख नहीं सकता है, तो हर एक दिन निरर्थक, बेकार, एवं दयनीय है। कोई व्यक्ति जहाँ कहीं भी हो, उसका कार्य जो कुछ भी हो, उसके जीवन जीने का अर्थ एवं उसके लक्ष्यों का अनुसरण उसके लिए अंतहीन मर्मभेदी दुख एवं असहनीय कष्ट के सिवाय और कुछ लेकर नहीं आता है, कुछ इस तरह कि पीछे मुड़कर देखना वह बर्दाश्त नहीं कर सकता है। जब वह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करता है, उसके आयोजनों एवं इंतज़ामों के अधीन होता है, और सच्चे मानव जीवन की खोज करता है, केवल तभी वह धीरे-धीरे सभी अंतहीन मर्मभेदी दुखों एवं कष्टों से छूटकर आज़ाद होगा, और जीवन के सम्पूर्ण खालीपन से छुटकारा पाएगा।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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