परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 100

परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" | अंश 100

0 |13 जुलाई, 2020

स्वयं अधिकार को परमेश्वर की सामर्थ के रूप में वर्णन नहीं किया जा सकता है। पहले, यह निश्चितता के साथ कहा जा सकता है कि अधिकार और सामर्थ दोनों सकारात्मक हैं। उन का किसी नकारात्मक चीज़ से कोई संबंध नहीं है, और किसी भी सृजे गए प्राणी और न सृजे गए प्राणी से जुड़ा हुआ नहीं हैं। परमेश्वर अपनी सामर्थ से किसी भी तरह की चीज़ की सृष्टि कर सकता है जिनके पास जीवन और चेतना हो, और यह परमेश्वर के जीवन के द्वारा निर्धारित होता है। परमेश्वर जीवन है, इस प्रकार वह सभी जीवित प्राणियों का स्रोत है। इसके आगे, परमेश्वर का अधिकार सभी जीवित प्राणियों को परमेश्वर के हर एक वचन का पालन करवा सकता है, अर्थात् परमेश्वर के मुँह के वचनों के अनुसार अस्तित्व में आना, और परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार जीना और पुनः उत्पन्न करना, उसके बाद परमेश्वर सभी जीवित प्राणियों पर शासन करता और आज्ञा देता है, और उस में कभी कोई भूल नहीं होगी, हमेशा हमेशा के लिए। किसी व्यक्ति या तत्व में ये चीज़ें नहीं हैं; केवल सृष्टिकर्ता ही ऐसी सामर्थ को धारण करता और रखता है, और इसलिए इसे अधिकार कहा जाता है। यह सृष्टिकर्ता का अनोखापन है। इस प्रकार, इसके बावजूद कि वह शब्द स्वयं "अधिकार" है या इस अधिकार की हस्ती, प्रत्येक को सिर्फ सृष्टिकर्ता के साथ ही जोड़ा जा सकता है, क्यों क्योंकि यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीय पहचान व हस्ती का एक प्रतीक है, और यह सृष्टिकर्ता की पहचान और हैसियत को दर्शाता है; सृष्टिकर्ता के अलावा, किसी भी व्यक्ति या तत्व को इस शब्द "अधिकार" के साथ जोड़ा नहीं जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का अर्थ है।

यद्यपि शैतान अय्यूब को लालच भरी नज़रों से देख रहा था, परन्तु बिना परमेश्वर की इजाज़त के उसके पास अय्यूब के शरीर के एक बाल को भी छूने की हिम्मत नहीं थी। यद्यपि वह स्वाभाविक रूप से बुरा और निर्दयी है, किन्तु परमेश्वर के द्वारा उसे आज्ञा देने के बाद, शैतान के पास उसकी आज्ञा में बने रहने के सिवाए और कोई विकल्प नहीं था। और इस प्रकार, जब शैतान अय्यूब के पास आया, तो भले ही वह भेड़ों के बीच में एक भेड़िए के समान उन्माद में था, परन्तु उसने परमेश्वर द्वारा तय की गई सीमाओं को भूलने की हिम्मत नहीं की, और जो कुछ भी उसने किया उसमें उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ने की हिम्मत नहीं की, और शैतान को परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और सीमाओं से दूर जाने की हिम्मत नहीं हुई—क्या यह एक प्रमाणित सत्य नहीं है? इससे यह देखा जा सकता है कि शैतान को यहोवा परमेश्वर के किसी भी वचनों का विरोध करने की हिम्मत नहीं हुई। शैतान के लिए, परमेश्वर के मुँह का हर एक वचन एक आदेश है, और एक स्वर्गीय नियम है, और परमेश्वर के अधिकार का प्रकटीकरण है—क्योंकि परमेश्वर के हर एक वचन के पीछे, उनके लिए जो परमेश्वर के आदेशों को तोड़ते हैं, और जो स्वर्गीय व्यवस्थाओं की अनाज्ञाकारिता और विरोध करते हैं, परमेश्वर का दण्ड निहित है। शैतान स्पष्ट रीति से जानता है कि यदि उसने परमेश्वर के आदेशों को तोड़ा, तो उसे परमेश्वर के अधिकार के उल्लंघन करने, और स्वर्गीय व्यवस्थाओं का विरोध करने का परिणाम स्वीकार करना होगा। और ये परिणाम क्या हैं? ऐसा कहने की आवश्यकता नहीं है, वास्तव में ये परमेश्वर के द्वारा उसे दिए गए दण्ड हैं। अय्यूब के खिलाफ शैतान के कार्य उसके द्वारा मनुष्य की भ्रष्टता का एक छोटा सा दृश्य था, और जब शैतान इन कार्यों को अन्जाम दे रहा था, तब वे सीमाएँ जिन्हें परमेश्वर ने ठहराया था और वे आदेश जिन्हें उसने शैतान को दिया था, वे जो कुछ शैतान करता है उन सब के पीछे के सिद्धांतों की महज एक छोटी सी झलक थी। इसके अतिरिक्त, इस मामले में शैतान की भूमिका और पद परमेश्वर के प्रबन्ध के कार्य में उसकी भूमिका और पद का मात्र एक छोटा सा दृश्य था, और शैतान के द्वारा अय्यूब की परीक्षा में परमेश्वर के प्रति उसकी सम्पूर्ण आज्ञाकारिता की महज एक छोटी सी तस्वीर थी कि किस प्रकार शैतान ने परमेश्वर के प्रबन्ध के कार्य में परमेश्वर के विरूद्ध ज़रा सा भी विरोध करने का साहस नहीं किया। ये सूक्ष्म दर्शन तुम लोगों को क्या चेतावनी देते हैं? शैतान समेत सभी चीजों में से ऐसा कोई व्यक्ति या चीज़ नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा निर्धारित स्वर्गीय कानूनों और संपादनों का उल्लंघन कर सकती है, और किसी व्यक्ति या तत्व की इतनी हिम्मत नहीं है जो सृष्टिकर्ता द्वारा स्थापित की गयी इन स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को तोड़ सके, क्योंकि ऐसा कोई व्यक्ति या तत्व नहीं है जो उस दण्ड को पलट सके या उससे बच सके जिसे सृष्टिकर्ता उसकी आज्ञा न मानने वाले लोगों को देगा। केवल सृष्टिकर्ता ही स्वर्गीय व्यवस्थाओं और आदेशों को बना सकता है, केवल सृष्टिकर्ता के पास ही उन्हें प्रभाव में लाने की सामर्थ है, और किसी व्यक्ति या तत्व के द्वारा मात्र सृष्टिकर्ता की सामर्थ का उल्लंघन नहीं किया जा सकता है। यह सृष्टिकर्ता की अद्वितीय सामर्थ है, यह सामर्थ सभी चीज़ों में सर्वोपरि है, और इस प्रकार, यह कहना नामुमकिन है कि "परमेश्वर सबसे महान है, और शैतान दूसरे नम्बर में है।" उस सृष्टिकर्ता को छोड़ जिस के पास अद्वितीय अधिकार है, और कोई परमेश्वर नहीं है!

क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान है? पहला, परमेश्वर का अधिकार जिसका अभी जिक्र किया गया, और मनुष्य की सामर्थ में एक अन्तर है। और वह अन्तर क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि दोनों के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। यह सही है! यद्यपि लोग कहते हैं कि दोनों के बीच में कोई तुलना नहीं की जा सकती है, फिर भी मनुष्य के विचारों और धारणाओं में कई बार उन दोनों को अगल बगल रखकर तुलना करते हुए मनुष्य की सामर्थ अकसर अधिकार के साथ भ्रम में पड़ जाती है। यहाँ पर क्या हो रहा है? क्या लोग असावधानी से एक को दूसरे से बदलने की ग़लती नहीं कर रहे हैं? ये दोनों जुड़े हुए नहीं हैं, उनके बीच में कोई तुलना नहीं है, फिर भी लोग अपने आपकी सहायता नहीं कर सकते हैं। इस का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? यदि तुम सचमुच में एक समाधान चाहते हो, तो उसका एकमात्र तरीका परमेश्वर के अधिकार को समझना और जानना है। सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ को समझने और जानने के बाद, तुम एक ही साँस में मनुष्य की सामर्थ और परमेश्वर के अधिकार का जिक्र नहीं करोगे।

मनुष्य की सामर्थ किस की ओर संकेत करती है? सरल रीति से कहें, यह एक योग्यता या कुशलता है जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव, उसकी इच्छा और महत्वाकांक्षा को अति विशाल मात्रा में फैलाने या पूरा करने में सक्षम बनाती है। क्या इसे अधिकार के रूप में गिन सकते हैं? इसके बावजूद कि मनुष्य की महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ कितने फूले हुए या हितकारी हैं, उस व्यक्ति के विषय में यह नहीं कहा जा सकता है कि उसके पास अधिकार है; कम से कम, इस प्रकार का फूलना और सफलता मनुष्यों के बीच शैतान के हँसी ठट्ठे का महज एक प्रदर्शन है, कम से कम यह एक हँसी ठिठोली है जिसमें शैतान अपने स्वयं के पूर्वज के समान कार्य करता है जिससे परमेश्वर बनने की अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा कर सके।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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