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परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 57परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 57 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 42परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 42 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 45परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 45 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 9परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 9 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 44परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 44 परमेश्वर के वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 5परमेश्वर के वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 5 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 53परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 53 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 34परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 34 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 33परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 33 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 29परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 29 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 38परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" | अंश 38 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 17परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 17 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 20परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 20 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 15परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 15 परमेश्वर के वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 14परमेश्वर के वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 14 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 25परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 25 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 12परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 12 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 18परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 18 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 19परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 19 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 21परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 21 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 27परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 27 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 22परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 22 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 16परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 16 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 13परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 13 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 10परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 10 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 7परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 7 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 6परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 6 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 1परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 1 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 8परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 8 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 3परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 3 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 2परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 2 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 4परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है" | अंश 4 परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 24परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I" | अंश 24

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 17

परमेश्वर के दैनिक वचन   49  

परिचय

परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 17

मनुष्य की नियति परमेश्वर के प्रति उसकी मनोवृत्ति के द्वारा निर्धारित होती है

परमेश्वर एक जीवित परमेश्वर है, और जैसे लोग अलग अलग स्थितियों में भिन्न भिन्न रूप में प्रदर्शन करते हैं, वैसे ही इन प्रदर्शनों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति भी अलग अलग होती है क्योंकि वह एक कठपुतली नहीं है, और न ही वह खाली हवा है। परमेश्वर की मनोवृत्ति को जानना मानवजाति के लिए एक योग्य अनुसरण (उद्यम) है। परमेश्वर की मनोवृत्ति को जानने के द्वारा लोगों को सीखना चाहिए कि वे किस प्रकार परमेश्वर के स्वभाव को जान सकते हैं और थोड़ा थोड़ा करके उसके हृदय को समझ सकते हैं। जब तुम थोड़ा थोड़ा करके परमेश्वर के हृदय को समझने लगते हो, तो तुम्हें यह नहीं लगेगा कि परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने को अंजाम देना एक कठिन कार्य है। इससे अधिक, जब तुम परमेश्वर को समझते हो, तो तुम्हारे लिए उसके विषय में निष्कर्षों को बनाना और अधिक कठिन होता है। जब तुम परमेश्वर के विषय में निष्कर्षों को बनाना बन्द कर देते हो, तो इसकी कम संभावना है कि तुम उसे ठेस पहुंचाओ, और अनजाने में परमेश्वर तुम्हारी अगुवाई करेगा कि तुम उसके ज्ञान को पाओ, और इसके द्वारा तुम अपने हृदय में परमेश्वर का भय मानोगे। तुम उन सिद्धान्तों, पत्रियों, एवं मतों (थ्योरी) का उपयोग करते हुए परमेश्वर को परिभाषित करना बन्द करोगे जिनमें तुमने महारत हासिल की है। इसके बजाए, सभी चीज़ों में सदैव परमेश्वर के इरादों को खोजने के द्वारा, तुम अनजाने में ही ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो परमेश्वर के हृदय के अनुसार है।

परमेश्वर का कार्य अदृष्ट है और मानवजाति के द्वारा अस्पर्शनीय है, परन्तु जहाँ तक परमेश्वर की बात है, और हर एक व्यक्ति के कार्य, साथ में उसके प्रति उनकी मनोवृत्ति की बात है—परमेश्वर के द्वारा मात्र इनका एहसास ही नहीं किया जाता है, बल्कि ये दृश्यमान भी हैं। यह कुछ ऐसा है जिसे हर किसी को पहचानना चाहिए और उसके विषय में स्पष्ट होना चाहिए। तुम शायद स्वयं से हमेशा पूछते रहते हो: "क्या परमेश्वर जानता है कि मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? क्या परमेश्वर जानता है कि मैं ठीक इस समय क्या सोच रहा हूँ? शायद वह जानता है, शायद वह नहीं जानता है।" यदि तुम इस प्रकार के दृष्टिकोण को अपनाते हो, परमेश्वर का अनुसरण करते हो और उस में विश्वास करते हो फिर भी उसके कार्य एवं उसके अस्तित्व पर सन्देह करते हो, तो उसके पश्चात् जल्द ही या देर से ही सही ऐसा दिन आएगा जब तुम परमेश्वर को क्रोधित करते हो, क्योंकि तुम पहले से ही एक खतरनाक खड़ी चट्टान की छोर पर डगमगा रहे हो। मैंने ऐसे लोगों को देखा है जिन्होंने बहुत वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास किया है, परन्तु उन्होंने अभी तक सत्य की वास्तविकता को प्राप्त नहीं किया है, और यहाँ तक कि वे परमेश्वर की इच्छा को भी नहीं समझते हैं। उनके जीवन की महत्ता ने कोई उन्नति नहीं की है, केवल अत्यंत छिछले सिद्धान्तों के के मुताबिक चलते हैं। यह इसलिए है क्योंकि ऐसे लोगों ने कभी भी परमेश्वर के वचन को अपने स्वयं के जीवन के रूप में नहीं लिया है, और उन्होंने कभी परमेश्वर के अस्तित्व का सामना और उसे स्वीकार नहीं किया है। क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर ऐसे व्यक्तियों को देखता है और आनन्द से भर जाता है? क्या वे उसे राहत देते हैं? उस स्थिति में, यह परमेश्वर में विश्वास करने की लोगों की रीति है जो उनकी नियति को निर्धारित करती है। चाहे यह ऐसा प्रश्न हो कि तुम किस प्रकार परमेश्वर की खोज करते हो या तुम परमेश्वर से किस प्रकार व्यवहार करते हो, यह तुम्हारीस्वयं की मनोवृत्ति है जो अत्यंत महत्वपूर्ण बात है। परमेश्वर की ऐसी उपेक्षा न करो मानो वह तुम्हारे सिर के पीछे की खाली हवा है। अपने विश्वास के परमेश्वर को हमेशा एक जीवित परमेश्वर, एवं एक वास्तविक परमेश्वर के रूप में सोचो। वह वहाँ ऊपर उस तीसरे स्वर्ग में नहीं है जहाँ उसके पास करने के लिए कुछ भी नहीं है। इसके बजाए, वह लगातार प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में देख रहा है, यह देख रहा है कि तुम क्या करने वाले हो, हर एक छोटे संसार एवं हर एक छोटे कार्य को देख रहा है, यह देख है कि तुम किस प्रकार व्यवहार करते हो और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति क्या है। चाहे तुम स्वयं को परमेश्वर को देने के लिए तैयार हो या नहीं, तुम्हारा सम्पूर्ण व्यवहार एवं तुम्हारे आंतरिक विचार एवं सोच परमेश्वर के सामने हैं, और उन्हें परमेश्वर के द्वारा देखा जा रहा है। यह तुम्हारे व्यवहार के अनुसार है, तुम्हारे कार्यों के अनुसार है, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति के अनुसार है, कि तुम्हारे विषय में उसकी राय, और तुम्हारे प्रति उसकी मनोवृत्ति लगातार बदल रही है। मैं उन लोगों को कुछ परामर्श देना चाहूंगा जो अपने आपको छोटे बच्चों के समान परमेश्वर के हाथों में दे देते हैं, मानो उसे तुम से लाड़ प्यार करना चाहिए, मानो वह तुम्हें कभी नहीं छोड़ सकता है, मानो तुम्हारे प्रति उसकी मनोवृत्ति स्थिर है और कभी नहीं बदल सकती है: सपने देखना बन्द करो! परमेश्वर हर एक एवं प्रत्येक व्यक्ति के प्रति अपने व्यवहार में धर्मी है। वह ईमानदारी से मानवजाति को जीतने और उसके उद्धार के कार्य के प्रति व्यवहार करता है। यह उसका प्रबंधन है। वह प्रत्येक व्यक्ति से गंभीरतापूर्वक व्यवहार करता है, पालतू जानवर के समान नहीं कि उसके साथ खेले। मनुष्य के लिए परमेश्वर का प्रेम बहुत लाड़ दुलार करने वाला या बिगाड़ने वाला प्रेम नहीं है; मानवजाति के प्रति उसकी दया एवं सहनशीलता पक्षपातपूर्ण या बेपरवाह नहीं है। इसके विपरीत, मानवजाति के लिए परमेश्वर का प्रेम पोषण करने के लिए है, दया करने के लिए है, और जीवन का सम्मान करने के लिए है; उसकी दया एवं सहनशीलता मनुष्य के विषय में उसकी अपेक्षाओं को सूचित करती है; उसकी दया एवं सहनशीलता ऐसी चीज़ें हैं जो मानवता के ज़िन्दा बचे रहने के लिए ज़रूरी हैं। परमेश्वर जीवित है, और परमेश्वर वास्तव में मौजूद है; मानवजाति के प्रति उसकी मनोवृत्ति सैद्धान्तिक है, कट्टर नियम बिलकुल भी नहीं है, और यह बदल सकती है। मानवजाति के लिए उसकी इच्छा समय के साथ, परिस्थितियों के साथ, और प्रत्येक व्यक्ति की मनोवृत्ति के साथ धीरे धीरे परिवर्तित एवं रूपान्तरित हो रही है। अतः तुम्हें इस पर बिल्कुल स्पष्ट होना चाहिए, और यह समझना चाहिए कि परमेश्वर का सार-तत्व अपरिवर्तनीय है, और उसका स्वभाव विभिन्न समयों पर, और विभिन्न सन्दर्भों में जारी होगा। शायद तुम न सोचो कि यह एक गंभीर मामला है, और तुम यह कल्पना करने के लिए अपनी स्वयं की व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करते हो कि परमेश्वर को किस प्रकार कार्यों को अंजाम देना चाहिए। परन्तु ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारे दृष्टिकोण के बिल्कुल विपरीत चीज़ें ही सही होती हैं, और यह कि अपनी व्यक्तिगत धारणाओं का उपयोग करने के द्वारा तुम परमेश्वर को आंकने का प्रयास करते हो, तो तुमने पहले ही उसे क्रोधित कर दिया है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर वैसे संचालन नहीं करता है जैसे तुम सोचते हो कि वह करता है, और परमेश्वर इस मामले से उस तरह व्यवहार नहीं करेगा जैसा तुम सोचते हो कि वह करेगा। और इस प्रकार मैं तुम्हें स्मरण दिलाता हूँ कि तुम आसपास की हर एक चीज़ के प्रति अपनी पहुंच में सावधान एवं बुद्धिमान हो, और सीखो कि किस प्रकार सभी हालातों में परमेश्वर के मार्ग में चलने के सिद्धान्त का अनुसरण करते हैं—परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। तुम्हें परमेश्वर की इच्छा एवं उसकी मनोवृत्ति के मामलों पर एक स्थिर समझ विकसित करनी होगी; अद्भुत प्रकाशन पानेवाले लोगों को खोजो ताकि वे इसका संवाद तुम से करें, और ईमानदारी से खोजो। अपने विश्वास के परमेश्वर को एक कठपुतली के रूप में न देखो—मनमाने ढंग से न्याय करना, मनमाने निष्कर्षों पर आना, उस सम्मान के साथ परमेश्वर से व्यवहार न करना जिसका वह हकदार है। परमेश्वर के उद्धार की प्रक्रिया में, जब वह तुम्हारे परिणाम को परिभाषित करता है, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है यदि वह तुम्हें दया प्रदान करता है, या सहनशीलता, या न्याय एवं ताड़ना, तुम्हारे प्रति उसकी मनोवृत्ति स्थिर नहीं है। यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारी मनोवृत्ति, एवं परमेश्वर की तुम्हारी समझ पर निर्भर होता है। परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान या समझ के किसी अस्थायी पहलु को यह अनुमति न दो कि वह परमेश्वर को सदा के लिए परिभाषित करे। एक मृत परमेश्वर में विश्वास न करो; एक जीवित परमेश्वर में विश्वास करो। इसे स्मरण रखो! यद्यपि मैंने यहाँ पर कुछ सच्चाईयों पर चर्चा की है, ऐसी सच्चाईयां जिन्हें तुम लोगों को सुनने की आवश्यकता थी, फिर भी तुम सबकी वर्तमान दशा एवं तुम लोगों के वर्तमान डीलडौल के प्रकाश में, मैं तुम्हारे उत्साह को खत्म करने के लिए कोई बड़ी मांग नहीं करूंगा। ऐसा करने से तुम लोगों का हृदय अत्यधिक वीरानेपन से भर सकता है, और परमेश्वर के प्रति तुम सब को बहुत अधिक निराशा महसूस करा सकता है। इसके बदले मुझे आशा है कि तुम अपने हृदय में परमेश्वर के प्रेम का उपयोग कर सकते हो, और जब आगे के पथ पर चलते हो तो तुम लोग उस मनोवृत्ति का उपयोग कर सकते हो जो परमेश्वर के प्रति सम्मानजनक है। उस मामले में न गड़बड़ा जाओ कि परमेश्वर के विश्वास के प्रति किस प्रकार व्यवहार करना है। इसके साथ ऐसा व्यवहार करो मानो कि यह बहुत बड़े प्रश्नों में से एक है। इसे अपने हृदय में रखो, इसका अभ्यास करो, और इसे वास्तविक जीवन के साथ जोड़ो—केवल होठों से इसका आदर न करो। क्योंकि यह ज़िन्दगी और मौत की बात है, और ऐसी बात है जो तुम्हारी नियति को निर्धारित करेगी। इससे एक मजाक के रूप में, या किसी बच्चे के खेल के रूप में व्यवहार न करो! आज तुम सब के साथ इन वचनों को बांटने के बाद, मैं जानने को उत्सुक हूँ कि तुम लोगों के मनों में समझ की फसल क्या है। जो कुछ आज मैं ने यहाँ पर कहा है क्या उसके विषय में कोई प्रश्न है जिसे तुम सब पूछना चाहते हो?

यद्यपि ये विषय थोड़े बहुत नए हैं, और तुम लोगों के दृष्टिकोण से और जो कुछ तुम लोग सामान्यतः अनुसरण करते हो और जिस पर ध्यान देते हो उससे थोड़ा बहुत दूर हट गए हैं, फिर भी मैं सोचता हूँ कि एक समय अवधि के लिए उनका संवाद किए जाने के पश्चात्, जो कुछ भी मैं ने कहा है उसके विषय में तुम सभी एक सामान्य समझ विकसित कर लोगे। चूँकि ये नए विषय हैं, ऐसे विषय हैं जिन पर तुम सब ने पहले कभी विचार नहीं किया था, तो मुझे आशा है कि ये तुम लोगों के बोझ को और नहीं बढ़ाएंगे। मैं आज इन वचनों को तुम लोगों को भयभीत करने के लिए नहीं बोलता हूँ, और न ही मैं तुम सब के साथ कोई सौदा करना चाहता हूँ; इसके बजाए, मेरा लक्ष्य यह है कि मैं तथ्य की सच्चाई को समझने में तुम लोगों की सहायता करूं। आखिरकार, मानवजाति एवं परमेश्वर के बीच में एक दूरी हैः यद्यपि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसने परमेश्वर को कभी समझा नहीं है; उसने परमेश्वर की मनोवृत्ति को कभी नहीं जाना है। मनुष्य परमेश्वर की मनोवृत्ति के लिए अपने उद्यमों में कभी उत्साही भी नहीं रहा है। इसके बजाए, उसने आंखें मूंदकर विश्वास किया है, वह आंखें मूंदकर आगे बढ़ा है, और वह परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान एवं समझ में लापरवाह रहा है। अतः इन मामलों को तुम लोगों के लिए स्पष्ट करने हेतु, और यह समझने में तुम सब की सहायता करने हेतु मैं विवश महसूस करता हूँ कि वह परमेश्वर किस प्रकार का परमेश्वर है जिस में तुम लोग विश्वास करते हो; वह क्या सोच रहा है; विभिन्न प्रकार के लोगों के प्रति उसके व्यवहार में उसकी मनोवृत्ति क्या है; उसकी अपेक्षाओं को पूरा करने से तुम सब कितनी दूर हो; और तूम लोगों के कार्य और उस मानक (स्तर) के बीच की असमानता क्या है जिसकी वह मांग करता है। तुम सब को जानकारी देने का लक्ष्य यह है कि तुम लोगों को तुम्हारे हृदय में नापने की एक छड़ी दी जाए जिसके साथ तुम सब यह नापो और जानो कि जिस मार्ग पर तुम लोग चलते हो वह किस प्रकार की फसल की ओर ले जाता है, तुम सब ने इस मार्ग पर क्या प्राप्त नहीं किया है, और तुम लोग किन क्षेत्रों में शामिल ही नहीं हुए हो। जब तुम सब आपस में वार्तालाप कर रहे हो, तो आप लोग आम तौर पर कुछ सामान्य रूप से चर्चित विषयों पर ही बोलते हो; दायरा संकरा है, और विषयवस्तु बिलकुल सतही है। जिस पर तुम लोग चर्चा करते हो और परमेश्वर के इरादों के बीच में, तथा आप सब की चर्चाओं और परमेश्वर की मांगों के दायरे एवं मानक के बीच में एक दूरी है एवं एक अंतर है। समय के बीतने के साथ साथ इस प्रकार से आगे बढ़ना तुम लोगों को परमेश्वर के मार्ग से दूर और दूर करता जाएगा। तुम सब बस परमेश्वर से मौजूद वचनों को ले रहे हो और उन्हें आराधना की वस्तुओं में, एवं रीति विधियों एवं नियमों में बदल रहे हो। जो है बस इतना ही है! वास्तव में, परमेश्वर का तुम लोगों के हृदय में कोई स्थान ही नहीं है, और परमेश्वर ने तुम सब के हृदय को कभी प्राप्त नहीं किया है। कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर को जानना बहुत कठिन है—यही सच्चाई है। यह कठिन है! यदि लोगों से अपने कर्तव्य को निभाने के लिए कहा जाए और कार्यों को बाहरी तौर पर करने को कहा जाए, यदि उनसे कठिन परिश्रम करने के लिए कहा जाए, तब लोग सोचेंगे कि परमेश्वर पर विश्वास करना बहुत आसान है, क्योंकि यह सब मनुष्य की योग्यताओं के दायरे के भीतर आता है। फिर भी जिस क्षण यह विषय परमेश्वर के इरादों एवं मनुष्य के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति के क्षेत्रों की ओर हस्तांतरित होता है, तब जहाँ तक हर एक व्यक्ति की बात है चीज़ें और भी अधिक कठिन हो जाती हैं। यह इसलिए है क्योंकि यह सत्य के विषय में लोगों की समझ और वास्तविकता में उनके प्रवेश को शामिल करता है; निश्चित रूप से इसमें थोड़ी कठिनाई है! परन्तु जब तुम लोग पहले द्वार से होकर आगे निकल जाते हो उसके बाद, जब तुम इसके भीतर प्रवेश करना शुरू करते हो उसके बाद, यह धीरे धीरे और अधिक आसान होता जाता है।

— "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" से उद्धृत

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