परमेश्वर के दैनिक वचन | "वास्तविकता को कैसे जानें" | अंश 434

0 |15 सितम्बर, 2020

यदि लोगों को परमेश्वर को जानना है, तो सब से पहले उन्हें यह अवश्य जानना चाहिए कि परमेश्वर वास्तविक परमेश्वर है, और परमेश्वर के वचनों को, देह में परमेश्वर के वास्तविक प्रकटन को और परमेश्वर के वास्तविक कार्य को अवश्य जानना चाहिए। केवल यह जानने के बाद ही कि परमेश्वर का समस्त कार्य वास्तविक है तुम वास्तव में परमेश्वर के साथ सहयोग करने में समर्थ हो सकोगे, और केवल इसी मार्ग के माध्यम से तुम अपने जीवन के विकास को प्राप्त करने में समर्थ हो सकोगे। वे सभी जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है उनके पास परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का कोई उपाय नहीं है, वे अपनी धारणाओं में उलझे हुए हैं, वे अपनी कल्पनाओं में जीते हैं, और इस प्रकार उन्हें परमेश्वर के वचनों का कोई ज्ञान नहीं है। वास्तविकता का तुम्हारा ज्ञान जितना अधिक होता है, तुम परमेश्वर के उतने ही करीब होते हो, और तुम उसके उतने ही अधिक घनिष्ठ होते हो; तुम जितना अधिक अज्ञातता और अमूर्तता, तथा सिद्धांत की खोज करते हो, तुम परमेश्वर से उतने ही अधिक भटक जाते हो, और इस प्रकार तुम उतना ही अधिक यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना दुःसाध्य एवं कठिन है, और कि तुम प्रवेश के लिए अक्षम हो। यदि तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में, और अपने आध्यात्मिक जीवन के सही पथ में प्रवेश करने की इच्छा करते हो, तो तुम्हें सबसे पहले वास्तविकता को जानना और अपने आप को अज्ञात एवं अलौकिक चीज़ों से पृथक करना अवश्य चाहिए—जिसका अर्थ है, कि सबसे पहले तुम्हें अवश्य समझना चाहिए कि पवित्र आत्मा किस प्रकार से वास्तव में तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता और तुम्हारा मार्गदर्शन करता है। इस तरह से, यदि तुम सचमुच में अपने भीतर पवित्र आत्मा के वास्तविक कार्य को समझ सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के सही रास्ते में प्रवेश कर चुके होगे।

आज, हर चीज वास्तविकता से शुरू होती है। परमेश्वर का कार्य सर्वाधिक वास्तविक है, और लोगों के द्वारा स्पर्श किया जा सकता है; यह वह है जिसे लोग अनुभव कर सकते हैं और उसे प्राप्त कर सकते हैं। लोगों में ऐसा बहुत कुछ है जो अज्ञात एवं अलौकिक है, जो उन्हें परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानने से रोकता है। इस प्रकार, वे अपने अनुभवों में हमेशा पथभ्रष्ट हो जाते हैं, और हमेशा कठिनाई महसूस करते हैं, जो कि सब कुछ उनकी धारणाओं के कारण होता है। लोग पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों को समझने में असमर्थ हैं, वे वास्तविकता को नहीं जानते हैं और इसलिए वे प्रवेश के अपने मार्ग में हमेशा नकारात्मक होते हैं। वे दूर से परमेश्वर की माँगों को देखते हैं, उन्हें हासिल करने में असमर्थ होते हैं; वे मात्र यह देखते हैं कि परमेश्वर के वचन वास्तव में अच्छे हैं, किन्तु प्रवेश का मार्ग नहीं खोज सकते हैं। पवित्र आत्मा इस सिद्धांत के अनुसार काम करता है: लोगों के सहयोग के माध्यम से, उनके परमेश्वर की सक्रियता से प्रार्थना करने, परमेश्वर को खोजने एवं उसके करीब आने के माध्यम से, परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है और पवित्र आत्मा द्वारा उन्हें प्रबुद्ध और रोशन किया जा सकता है। यह ऐसा मामला नहीं है कि पवित्र आत्मा एकतरफ़ा कार्य करता है, या कि मनुष्य एकतरफ़ा कार्य करता है। दोनों ही अपरिहार्य हैं, और लोग जितना अधिक सहयोग करते हैं, और वे जितना अधिक परमेश्वर की अपेक्षाओं के मानकों को प्राप्त करने की खोज करते हैं, पवित्र आत्मा का कार्य उतना ही अधिक विशाल होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के साथ जोड़ा गया केवल लोगों का वास्तविक सहयोग ही, परमेश्वर के वचनों के वास्तविक अनुभवों एवं सारभूत ज्ञान को उत्पन्न कर सकता है। धीरे-धीरे, इस तरीके से अनुभव करने के माध्यम से, अंततः एक पूर्ण व्यक्ति उत्पन्न होता है। परमेश्वर अलौकिक चीज़ें नहीं करता है; लोगों की धारणाओं में, परमेश्वर सर्वशक्तिमान है, और सब कुछ परमेश्वर के द्वारा किया जाता है—परिणामस्वरूप लोग निष्क्रियता से प्रतीक्षा करते हैं, परमेश्वर के वचनों को नहीं पढ़ते हैं या प्रार्थना नहीं करते हैं, और मात्र पवित्र आत्मा के स्पर्श की प्रतीक्षा करते हैं। हालाँकि, जिनके पास सही समझ है, वे यह विश्वास करते हैं कि: परमेश्वर के कार्यकलाप केवल वहाँ तक जा सकते हैं जहाँ तक मेरा सहयोग होता है, और मुझ पर परमेश्वर के कार्य का जो प्रभाव पड़ता है इस बात पर निर्भर करता है कि मैं किस प्रकार सहयोग करता हूँ। जब परमेश्वर बोलता है, तो परमेश्वर के वचनों को ढूँढ़ने और उनकी ओर प्रयत्न करने के लिए मुझे वह सब करना चाहिए जो मैं कर सकता हूँ; यही है वह जो मुझे प्राप्त करना चाहिए।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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