परमेश्वर के दैनिक वचन | "बाहरी परिवर्तन और स्वभाव में परिवर्तन के बीच अंतर" | अंश 382

30 दिसम्बर, 2020

लोगों का व्यवहार अच्छा हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके अंदर सत्य है। लोगों का उत्साह उनसे केवल सिद्धांतों का अनुसरण और नियम का पालन करवा सकता है; लेकिन जो लोग सत्य से रहित हैं उनके पास मूलभूत समस्याओं का समाधान करने का कोई रास्ता नहीं होता, न ही सिद्धांत सत्य का स्थान ले सकता है। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव किया है, वे अलग हैं; उन्होंने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य-सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो वे प्रकट करते हैं। जब उनके अपने विचार और धारणाएँ प्रकट होती हैं, तो वे विवेकी बनकर देह की इच्छाओं को छोड़ सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है। जो लोग स्वभाव में परिवर्तन से गुज़रे हैं, उनके बारे में मुख्य बात यह है कि उन्होंने स्पष्ट रूप से सत्य समझ लिया है, और कार्य करते समय तो वे सापेक्ष सटीकता के साथ सत्य का अभ्यास करते हैं और वे अक्सर भ्रष्टता नहीं दिखाते। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे खासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्म-तुष्टि और दंभ नहीं दिखाते। वे अपनी प्रकट हुई भ्रष्टता में से काफ़ी कुछ समझ-बूझ लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता। मनुष्य का क्या स्थान है, कैसे उचित व्यवहार करना है, कैसे कर्तव्यनिष्ठ होना है, क्या कहना और क्या नहीं कहना है, और किन लोगों से क्या कहना और क्या करना है, इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि इस प्रकार के लोग अपेक्षाकृत तर्कसंगत होते हैं। जिन लोगों का स्वभाव बदल जाता है, वे वास्तव में एक मनुष्य के समान जीवन जीते हैं, और उनमें सत्य होता है। वे हमेशा सत्य के अनुरूप बोलने और चीज़ों को देखने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं, सैद्धांतिक रूप से करते हैं; वे किसी व्यक्ति, मामले या चीज़ के प्रभाव में नहीं होते, उन सभी का अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य-सिद्धांत को कायम रख सकते हैं। उनका स्वभाव सापेक्षिक रूप से स्थिर होता है, वे असंतुलित नहीं होते, चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे समझते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाना है और परमेश्वर की संतुष्टि के लिए कैसे व्यवहार करना है। जिन लोगों के स्वभाव वास्तव में बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि सतही तौर पर स्वयं को अच्छा दिखाने के लिए क्या किया जाए; परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है, इस पर उन्होंने आंतरिक स्पष्टता पा ली है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से वे इतने उत्साही न दिखें या ऐसा न लगे कि उन्होंने कुछ बड़ा किया है, लेकिन वो जो कुछ भी करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और उसके परिणाम व्यावहारिक होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके अंदर निश्चित रूप से बहुत सत्य होता है, और इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोण और सैद्धांतिक कार्यों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों में सत्य नहीं है, उनके स्वभाव में कोई बिलकुल परिवर्तन नहीं हुआ है। स्वभाव में परिवर्तन का अर्थ परिपक्व और कुशल मानवता से युक्त होना नहीं है; यह मुख्य रूप से उन घटनाओं को संदर्भित करता है जिसमें लोगों की प्रकृति के भीतर के कुछ शैतानी विष, परमेश्वर का ज्ञान पा लेने और सत्य समझ लेने के परिणामस्वरूप बदल जाते हैं। कहने का अर्थ यह है कि उन शैतानी विषों को दूर कर दिया जाता है, और परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ऐसे लोगों के भीतर जड़ें जमा लेता है, उनका जीवन बन जाता है, और उनके अस्तित्व की नींव बन जाता है। तभी वे नए लोग बनते हैं, और इस तरह उनका स्वभाव रूपांतरित होता है। स्वभाव में रूपांतरण का मतलब यह नहीं है कि उनका बाहरी स्वभाव पहले की तुलना में विनम्र हो गया है, कि वे अभिमानी हुआ करते थे लेकिन अब तर्कसंगत ढंग से बोलते हैं, या वे पहले किसी की नहीं सुनते थे, लेकिन अब वे दूसरों की बात सुन सकते हैं; ऐसे बाहरी परिवर्तन स्वभाव के रूपान्तरण नहीं कहे जा सकते। बेशक स्वभाव के रूपांतरण में ये अवस्थाएँ और अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं, लेकिन सर्वाधिक महत्व की बात यह है कि अंदर से उनका जीवन बदल गया है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य ही उनका जीवन बन जाता है, उनके भीतर का शैतानी विष निकाल दिया गया है, उनका दृष्टिकोण पूरी तरह से बदल गया है और उनमें से कुछ भी दुनिया के अनुसार नहीं है। ये लोग बड़े लाल अजगर की योजनाओं और विष को उनके असल रूप में स्पष्टता से देख सकते हैं; उन्होंने जीवन का सच्चा सार समझ लिया है। इस तरह उनके जीवन के मूल्य बदल गए हैं, और यह सबसे मौलिक किस्म का रूपांतरण है और स्वभाव में परिवर्तन का सार है।

— 'मसीह की बातचीत के अभिलेख' से उद्धृत

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