परमेश्वर के दैनिक वचन : देहधारण | अंश 115

परमेश्वर इस आशय से देह धारण नहीं करता कि मनुष्य उसे जाने, या देहधारी परमेश्वर के देह और मनुष्य के देह के अंतर पहचाने; न ही वह मनुष्य के विवेक की शक्तियों को प्रशिक्षित करने के लिए देह बनता है, और इस अभिप्राय से तो बिलकुल नहीं बनता कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा धारित देह की आराधना करे, जिससे उसे बड़ी महिमा मिले। इसमें से कोई भी परमेश्वर के देह बनने का मूल उद्देश्य नहीं है। न ही परमेश्वर मनुष्य की निंदा करने के लिए देह धारण करता है, न ही जानबूझकर मनुष्य को उजागर करने के लिए, और न ही उसके लिए चीज़ों को कठिन बनाने के लिए। इनमें से कोई भी परमेश्वर का मूल इरादा नहीं है। हर बार जब परमेश्वर देह बनता है, तो यह कार्य का एक अपरिहार्य रूप होता है। वह अपने महत्तर कार्य और महत्तर प्रबंधन की खातिर ऐसा करता है, न कि उन कारणों से, जिनकी मनुष्य कल्पना करता है। परमेश्वर पृथ्वी पर केवल अपने कार्य की अपेक्षाओं और आवश्यकताओं के अनुसार आता है। वह पृथ्वी पर मात्र इधर-उधर देखने के इरादे से नहीं आता, बल्कि उस कार्य को करने लिए आता है जो उसे करना चाहिए। अन्यथा वह इतना भारी बोझ क्यों उठाएगा और इस कार्य को करने के लिए इतना बड़ा जोखिम क्यों लेगा? परमेश्वर केवल तभी देह बनता है, जब उसे बनना होता है, और वह हमेशा एक विशिष्ट अर्थ के साथ देह बनता है। यदि यह सिर्फ इसलिए होता कि मनुष्य उसे देखे और अपने अनुभव का क्षितिज व्यापक करे, तो वह निश्चित ही इतने हलकेपन से लोगों के बीच कभी नहीं आता। वह पृथ्वी पर अपने प्रबंधन और अपने महत्तर कार्य के लिए, और इस उद्देश्य से आता है, कि बहुत-से लोगों को प्राप्त कर सके। वह युग का प्रतिनिधित्व करने के लिए आता है, वह शैतान को पराजित करने के लिए आता है, और वह शैतान को पराजित करने के लिए देह धारण करता है। इसके अतिरिक्त, वह जीवन जीने में समस्त मानवजाति का मार्गदर्शन करने के लिए आता है। यह सब उसके प्रबंधन से संबंध रखता है, और यह पूरे ब्रह्मांड के कार्य से संबंध रखता है। यदि परमेश्वर मनुष्य को मात्र अपनी देह को जानने देने और मनुष्य की आँखें खोलने के लिए देह बनता, तो वह हर देश की यात्रा क्यों न करता? क्या यह अत्यधिक आसान बात न होती? परंतु उसने ऐसा नहीं किया, इसके बजाय वह रहने और उस कार्य को आरंभ करने के लिए, जो उसे करना चाहिए, एक उपयुक्त स्थान चुनता है। बस यह अकेला देह ही काफी अर्थपूर्ण है। वह संपूर्ण युग का प्रतिनिधित्व करता है, और संपूर्ण युग का कार्य भी करता है; वह पुराने युग का समापन और नए युग का सूत्रपात दोनों करता है। यह सब एक महत्वपूर्ण मामला है, जो परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित है, और यह सब कार्य के उस एक चरण के मायने हैं, जिसे संपन्न करने परमेश्वर पृथ्वी पर आता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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