परमेश्वर के दैनिक वचन : देहधारण | अंश 105

देहधारी परमेश्वर मसीह कहलाता है, तथा मसीह परमेश्वर के आत्मा के द्वारा धारण किया गया देह है। यह देह किसी भी मनुष्य की देह से भिन्न है। यह भिन्नता इसलिए है क्योंकि मसीह मांस तथा खून से बना हुआ नहीं है बल्कि आत्मा का देहधारण है। उसके पास सामान्य मानवता तथा पूर्ण परमेश्वरत्व दोनों हैं। उसकी दिव्यता किसी भी मनुष्य द्वारा धारण नहीं की जाती है। उसकी सामान्य मानवता देह में उसकी समस्त सामान्य गतिविधियों को बनाए रखती है, जबकि दिव्यता स्वयं परमेश्वर के कार्य करती है। चाहे यह उसकी मानवता हो या दिव्यता, दोनों स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति समर्पित हैं। मसीह का सार पवित्र आत्मा, अर्थात्, दिव्यता है। इसलिए, उसका सार स्वयं परमेश्वर का है; यह सार उसके स्वयं के कार्य में बाधा उत्पन्न नहीं करेगा, तथा वह संभवतः कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकता है जो उसके स्वयं के कार्य को नष्ट करता हो, ना वह ऐसे वचन कहेगा जो उसकी स्वयं की इच्छा के विरूद्ध जाते हों। इसलिए, देहधारी परमेश्वर अवश्य ही कभी भी कोई ऐसा कार्य नहीं करेगा जो उसके अपने प्रबंधन में बाधा उत्पन्न करता हो। यह वह बात है जिसे सभी मनुष्यों को समझना चाहिए। पवित्र आत्मा के कार्य का सार मनुष्य को बचाना तथा परमेश्वर के अपने प्रबंधन के वास्ते है। इसी प्रकार, मसीह का कार्य मनुष्य को बचाना है तथा यह परमेश्वर की इच्छा के वास्ते है। यह देखते हुए कि परमेश्वर देह बन जाता है, वह अपने देह में अपने सार का, इस प्रकार एहसास करता है कि उसका देह उसके कार्य का भार उठाने के लिए पर्याप्त है। इसलिए देहधारी होने के समय के दौरान परमेश्वर के आत्मा का संपूर्ण कार्य मसीह के कार्य के द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया जाता है, तथा देहधारण के पूरे समय के दौरान संपूर्ण कार्य के केन्द्र में मसीह का कार्य होता है। इसे किसी भी अन्य युग के कार्य के साथ मिलाया नहीं जा सकता है। और चूँकि परमेश्वर देहधारी हो जाता है, इसलिए वह अपनी देह की पहचान में कार्य करता है; चूँकि वह देह में आता है, इसलिए वह अपनी देह में उस कार्य को समाप्त करता है जो उसे करना चाहिए। चाहे वह परमेश्वर का आत्मा हो या वह मसीह हो, दोनों परमेश्वर स्वयं हैं, तथा वह उस कार्य को करता है जो उसे करना चाहिए है तथा उस सेवकाई को करता है जो उसे करनी चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है

सार में मसीह स्वर्गिक पिता की इच्छा का पालन करता है

मसीह का सार आत्मा है, ये सार तो दिव्यता है।

1

मसीह का सार स्वयं ईश्वर का सार है, जो उसके काम को बाधित नहीं करेगा। वो ऐसा कोई काम नहीं कर सकता जो उसके ही काम को नष्ट करे। मसीह ऐसे वचन नहीं बोल सकता जो उसकी ही इच्छा के विरुद्ध हों। देहधारी ईश्वर ऐसा काम नहीं करेगा जो उसके ही प्रबंधन को रोके। ईश्वर में कोई विद्रोह नहीं; ईश्वर का सार सिर्फ अच्छाई है। वो सारी सुंदरता, अच्छाई और प्रेम को व्यक्त करे। देह में भी, पिता की आज्ञा माने। अपना जीवन देना पड़े तो भी, वो हमेशा पूरे मन से तैयार रहेगा।

2

ईश्वर में कोई आत्मतुष्टि नहीं; कोई छल या घमंड नहीं। काम कितना भी कठिन हो, देह कितना भी कमजोर हो, देहधारी ईश्वर ईश-कार्य बाधित नहीं करेगा। अपनी अवज्ञा से पिता की इच्छा को कभी नहीं त्यागेगा। पिता की इच्छा न मानने के बजाय वो देह के कष्ट सहना पसंद करेगा। इंसान अपने मन से चुन सकता है, पर मसीह ऐसा कभी नहीं करेगा। भले ही उसकी पहचान ईश्वर की है, फिर भी वो पिता की इच्छा खोजे, देह में पूरा करे वो जो ईश्वर उसे सौंपे। इंसान इसे हासिल न कर सके।

3

मसीह के अलावा सभी इंसान ईश-विरोधी चीज़ें कर सकें। कोई भी सीधे वो काम न कर सके जो ईश्वर सौंपे; कोई भी ईश्वर के प्रबंधन को अपना कर्तव्य न मान सके। पिता परमेश्वर की इच्छा का पालन करना, ये बस मसीह का सार है। ईश्वर की आज्ञा न मानना, शैतान की विशेषता है। ये दोनों बातें परस्पर विरोधी हैं। शैतान के लक्षणों वाला मसीह नहीं कहला सकता। इंसान कभी ईश-कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें ईश्वर का सार नहीं। इंसान काम करे अपने हितों, अपने भविष्य के लिए, जबकि मसीह काम करे पिता की इच्छा पूरी करने को।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वर्गिक परमपिता की इच्छा के प्रति आज्ञाकारिता ही मसीह का सार है से रूपांतरित

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