परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर द्वारा धारण किये गए देह का सार" | अंश 101

इससे पहले कि यीशु अपना कार्य करता, वह अपनी सामान्य मानवता में जीया। कोई नहीं कह सकता था कि वह परमेश्वर है, किसी को भी पता नहीं चला कि वह देहधारी परमेश्वर है; लोग उसे केवल एक पूर्णतः साधारण व्यक्ति समझते थे। उसकी सर्वथा सामान्य, साधारण मानवता इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर ने देह में देहधारण किया है, और यह कि अनुग्रह का युग देहधारी परमेश्वर के कार्य का युग है, न कि पवित्रात्मा के कार्य का युग। यह इस बात का प्रमाण थी कि परमेश्वर का आत्मा पूरी तरह से देह में साकार हुआ है, कि परमेश्वर के देहधारण के युग में उसका देह पवित्रात्मा का समस्त कार्य करेगा। सामान्य मानवता वाला मसीह ऐसा देह है जिसमें सामान्य मानवता, सामान्य विवेक, और मानविक विचार को धारण करते हुए, आत्मा साकार होता है। "साकार होना" का अर्थ है परमेश्वर का मानव बनना, पवित्रात्मा का देह बनना; इसे स्पष्ट रूप से कहें, तो यह तब होता है जब परमेश्वर स्वयं सामान्य मानवता वाली देह में वास करता है, और इसके माध्यम से अपने दिव्य कार्य को व्यक्त करता है—यही है साकार होने या देहधारी होने का अर्थ। अपने पहले देहधारण के दौरान, बीमारों को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना परमेश्वर के लिए आवश्यक था क्योंकि उसका कार्य छुटकारा दिलाना था। सम्पूर्ण मानव जाति को छुटकारा दिलाने के लिए, उसे दयालु और क्षमाशील होने की आवश्यकता थी। सलीब पर चढ़ने से पहले उसने जो कार्य किया वह बीमार को चंगा करना और दुष्टात्माओं को निकालना था, जो उसके द्वारा मनुष्य के पाप और गंदगी से उद्धार के पूर्वलक्षण थे। क्योंकि यह अनुग्रह का युग था, इसलिए बीमारों को चंगा करना, उसके द्वारा संकेतों और चमत्कारों को दिखाना परमेश्वर के लिए आवश्यक था, जो उस युग में अनुग्रह के प्रतिनिधि थे; क्योंकि अनुग्रह का युग अनुग्रह प्रदान करने के आस-पास केन्द्रित था, जिसका प्रतीक शान्ति, आनन्द और भौतिक आशीष थे, जो कि सभी यीशु में लोगों के विश्वास की निशानियाँ थी। अर्थात् बीमार को चंगा करना, दुष्टात्माओं को निकालना, और अनुग्रह प्रदान करना, अनुग्रह के युग में यीशु के देह की सहज क्षमताएँ थीं, ये देह में साकार हुए पवित्रात्मा के कार्य थे। किन्तु जब वह ऐसे कार्य कर रहा था, तब वह देह में रह रहा था, वह देह से ऊपर नहीं गया। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता है कि उसने चंगाई का कौन सा कार्य किया, वह तब भी सामान्य मानवता को धारण किए हुए था, तब भी एक सामान्य मानव जीवन जी रहा था। परमेश्वर के देहधारण के युग में देह ने पवित्रात्मा के सभी कार्य किए, मेरा ऐसा कहने का कारण यह है, कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उसने क्या कार्य किया, उसने यह देह में किया। किन्तु उसके कार्य की वजह से, लोगों ने उसकी देह को पूरी तरह से दैहिक सार रखने वाला नहीं माना, क्योंकि उसकी देह चमत्कार कर सकती थी, और कुछ विशेष क्षणों में ऐसे कार्य कर सकती थी जो देह से ऊपर जाते थे। वास्तव में, ये सब घटनाएँ उसकी सेवकाई आरम्भ करने के बाद हुईं, जैसे कि उसका चालीस दिनों तक परीक्षण किया जाना या पहाड़ पर रूपान्तरित होना। इसलिए यीशु के साथ, परमेश्वर के देहधारण का अर्थ पूर्ण नहीं हुआ था, किन्तु केवल आंशिक तौर पर पूर्ण हुआ था। अपने कार्य को आरम्भ करने से पहले उसने देह में जो जीवन जीया वह सर्वथा बिल्कुल सामान्य था। अपना कार्य आरम्भ करने के बाद उसने केवल अपनी देह के बाहरी आवरण को बनाए रखा। क्योंकि उसका कार्य दिव्यता की एक अभिव्यक्ति था, इसलिए यह देह के सामान्य प्रकार्यों से बढ़कर था। आख़िरकार, परमेश्वर का देहधारी देह मांस-और-रक्त वाले मानव से भिन्न था। वास्तव में, अपने दैनिक जीवन में, उसे भोजन, कपड़ों, नींद और आश्रय की उसी तरह आवश्यकता थी जैसी किसी भी अन्य को होती है, सभी सामान्य आवश्यकताओं, तर्कसंगत होने और विचार की ज़रूरत थी जैसी कि किसी भी सामान्य इंसान को होती है। लोग उसे अभी भी सामान्य मनुष्य मान रहे थे, सिवाय इसके कि उसने जो कार्य किया वह अलौकिक था। वास्तव में, इससे कुछ फ़र्क नहीं पड़ता है कि उसने क्या किया, वह एक साधारण और सामान्य मानवता में रहा और जहाँ तक उसने जो कार्य किया उसका विचार विशेष रूप से सामान्य था, उसके विचार, किसी भी अन्य सामान्य मनुष्य की अपेक्षा, विशेष रूप से अधिक सुस्पष्ट थे। इस प्रकार से सोचना और तर्क करना यह देहधारी परमेश्वर के लिए आवश्यक था, क्योंकि दिव्य कार्य को ऐसी देह के द्वारा व्यक्त किए जाने की आवश्यकता थी जिसका तर्क बहुत ही सामान्य हो और विचार बहुत ही सुस्पष्ट हो—केवल इसी प्रकार से उसकी देह दिव्य कार्य को व्यक्त कर सकती थी। सम्पूर्ण साढ़े तैतीस साल के दौरान जो यीशु इस पृथ्वी पर रहा, उसने अपनी सामान्य मानवता को बनाए रखा, किन्तु उसकी इन साढ़े तीन साल की सेवकाई के दौरान, लोगों ने सोचा कि वह बहुत ही अत्युत्तम है, कि वह पहले की अपेक्षा बहुत ही अलौकिक है। वास्तविकता में, यीशु की सामान्य मानवता पहले और बाद में अपरिवर्तित रही; पूरे समय उसकी मानवता एक सी थी, किन्तु जब उसने अपनी सेवकाई आरम्भ की उससे पहले और उसके बाद के अंतर के कारण, उसकी देह के बारे में दो भिन्न-भिन्न मत उभरे। इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या सोचते थे, देहधारी परमेश्वर ने पूरे समय अपनी सामान्य मानवता को बनाए रखा, क्योंकि जबसे परमेश्वर देहधारी हुआ, वह देह में रहा, ऐसी देह जिसकी सामान्य मानवता थी। इसकी परवाह किए बिना कि वह अपनी सेवकाई कर रहा है या नहीं, उसकी देह की सामान्य मानवता को मिटाया नहीं जा सकता था, क्योंकि मानवता देह का मूल सार है। इससे पहले कि यीशु अपनी सेवकाई को करता, सभी मानवीय क्रियाकलापों में संलग्न रहते हुए उसकी देह पूरी तरह से सामान्य बनी रही; वह जरा सा अंश मात्र भी अलौकिक प्रकट नहीं हुआ, उसने कोई भी अद्भुत संकेत नहीं दिखाए। उस समय वह केवल बहुत ही आम मानव था जो परमेश्वर की आराधना करता था, यद्यपि उसकी खोज अधिक ईमानदार थी, किसी की भी अपेक्षा अधिक ईमानदार थी। इस प्रकार से उसकी सर्वथा सामान्य मानवता स्वयं प्रकट हुई। क्योंकि अपनी सेवकाई को अपनाने से पहले उसने बिल्कुल भी कार्य नहीं किया, इसलिए उसकी पहचान से कोई भी अवगत नहीं था, कोई भी नहीं बता सकता था कि उसकी देह अन्य सभी से भिन्न है, क्योंकि उसने एक भी चमत्कार नहीं किया था, परमेश्वर स्वयं के कार्य का जरा सा अंश भी नहीं किया था। हालाँकि, उसके अपनी सेवकाई का कार्य प्रारम्भ करने के बाद, उसने सामान्य मानवता के बाहरी आवरण को बनाए रखा और तब भी सामान्य मानवीय सूझबूझ के साथ जीया, किन्तु क्योंकि उसने परमेश्वर स्वयं के कार्य को करना, मसीह की सेवकाई को अपनाना और उन कार्यों को करना आरम्भ कर दिया था जिन्हें करने के लिए नश्वर प्राणी, मांस-और-रक्त से बने प्राणी करने में अक्षम थे, इसलिए लोगों ने मान लिया कि उसकी सामान्य मानवता नहीं थी और पूरी तरह से एक सामान्य देह नहीं थी बल्कि एक अपूर्ण देह थी। उसके द्वारा किए गए कार्य की वजह से लोगों ने कहा कि वह देह में एक परमेश्वर है जिसकी सामान्य मानवता नहीं है। यह एक ग़लत समझ थी, क्योंकि लोगों ने देहधारी परमेश्वर के महत्व को नहीं समझा था। यह गलतफहमी इस तथ्य से उठी थी कि परमेश्वर के द्वारा देह में व्यक्त कार्य दिव्य कार्य था, जो एक देह में व्यक्त हुआ था जिसकी एक सामान्य मानवता थी। परमेश्वर देह में आच्छादित था, वह देह के भीतर रहा, और उसकी मानवता में उसके कार्य ने उसकी मानवता की सामान्यता को धुँधला कर दिया था। इसी कारण से लोगों ने विश्वास किया कि परमेश्वर में मानवता नहीं थी।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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