परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 28" | अंश 228

जब चमकता हुआ चाँद उगता है, शांत रात तत्काल ही बिखर जाती है। यद्यपि चन्द्रमा चिथड़ों में है, मनुष्य उमंग में है, और रोशनी के नीचे उस सुंदर दृश्य की प्रशंसा करता हुआ शांति से उस चाँद की चाँदनी में बैठता है, मनुष्य अपनी भावनाओं का बखान नहीं कर सकता है। यह ऐसा है मानो वह अपने विचारों को पीछे अतीत में फेंक देना चाहता है, मानोआगे भविष्य की ओर देखना चाहता है, मानो वह वर्तमान का आनंद उठा रहा है। एक मुस्कुराहट उसके चेहरे पर उभरती है, और उस आनंददायक हवा में एक अच्छी सी खुशबू व्याप्त हो जाती है; जैसे ही मंद हवा का झोंका बहना शुरू होता है, मनुष्य को उस मनमोहक खुशबू का पता चल जाता है, और ऐसा लगता है कि वह उस से मदहोश हो गया है, अपने को जगाने में असमर्थ है। यही वह समय है जब मैं मनुष्य के मध्य में व्यक्तिगत रूप से आता हूँ, और मनुष्य को तीव्र सुगन्ध का ऊँचा एहसास मिलता है, और इस प्रकार से सभी मनुष्य इस महक के बीच जीवन बिताते हैं। मैं मनुष्य के साथ शान्ति से हूँ, वह मेरे साथ मेल से रहता है, मेरा सम्मान करने में वह विचलित नहीं होता, अब मैं मनुष्य की कमियों को काटता छांटता नहीं हूँ, अब मनुष्य के चेहरे पर तनाव नहीं दिखता, और न ही अब मृत्यु सम्पूर्ण मानवजाति को धमकाती है। आज, मैं मनुष्य के साथ कदम से कदम मिलाते हुए ताड़ना के युग मे आगे बढ़ता हूँ। मैं अपना कार्य कर रहा हूँ, यानी कि, मैं मनुष्यों के मध्य अपनी लाठी से प्रहार करता हूँ और मनुष्यों में जो विद्रोही है यह उस पर गिरती है। मनुष्य की नज़रों में, ऐसा दिखाई देता है कि मेरी लाठी में विशेष शक्तियाँ हैं: यह उन सभी पर आ पड़ती है जो मेरे शत्रु हैं और आसानी से उन्हें छोड़ती नहीं; उन सब पर जो मेरा विरोध करते हैं, यह लाठी अपना निहित कार्य करती है; वे सभी जो मेरे हाथों में हैं वे मेरे मूल इरादों के अनुसार अपने कर्तव्यों को निभाते हैं, और उन्होंने कभी मेरी इच्छाओं की अवहेलना नहीं की है या अपने मूल तत्व को नहीं बदला है। परिणाम स्वरूप, पानी गरजेंगे, पहाड़ गिर जायेंगे, बड़ी बड़ी नदियाँ विभाजित हो जायेंगी, मनुष्य सदा सर्वदा बदलता रहेगा, सूर्य धुँधला हो जाएगा, चाँद अंधकारमय हो जाएगा, मनुष्यके पास शांति से जीने के लिए और अधिक दिन नहीं होंगे, भूमि पर शान्ति का और अधिक समय नहीं होगा, आकाश फिर दोबारा कभी शांत नहीं रहेगा, न चुप रहेगा, और न फिर कभी स्थिर बना नहीं रहेगा। सभी चीज़े नई कर दी जाएँगी और अपने मूल रूप में आ जायेंगी। पृथ्वी पर सारे घर परिवार अलग-अलग बिखेर दिए जाएँगे, और पृथ्वी पर सारे राष्ट्र अलग अलग कर दिए जाएँगे; पति और पत्नी के बीच पुनर्मिलन के वे दिन चले जाएँगे, माँ और बेटा दोबारा आपस में नहीं मिलेंगे, और न ही पिता और बेटी फिर कभी आपस में मिल पाएँगे। जो कुछ भी पृथ्वी पर पाया जाता है वह मेरे द्वारा नष्ट कर दिया जाएगा। मैं लोगों को अपनी भावनाओं को प्रकट करने का अवसर नहीं देता, क्योंकि मैं भावना रहित हूँ, और एक हद तक लोगों की भावनाओं से घृणा करते हुए बढ़ा हूँ। लोगों के बीच की भावनाओं के कारण ही मुझे एक तरफ कर दिया गया, और इस रीति से मैं उनकी नज़रों में "अन्य" बन गया; लोगों के बीच भावनाओं के कारण ही मैं भुला दिया गया। यह मनुष्य की भावनाओं के कारण है कि वह अपने "विवेक" का चयन करने के लिए इस अवसर को पकड़ लेता है। यह मनुष्य की भावनाओं के कारण है कि वह हमेशा मेरी ताड़नाओं से थकता जाता है। यह मनुष्य की भावनाओं के कारण है कि वह मुझे पक्षपाती और अन्यायी कहता है, और कहता है कि जब मैं किसी चीज़ को करता हूँ तो मैं मनुष्य की भावनाओं के प्रति असावधान होता हूँ। क्या पृथ्वी पर मेरे भी सगे संबंधी हैं? किसने कभी, मेरी तरह, मेरे पूरे प्रबन्धन की योजना के लिए भोजन या नींद के बारे में न सोचते हुए दिन रात काम किया है? मनुष्य कैसे परमेश्वर के तुलनीय हो सकता है? वह कैसे परमेश्वर के संयोज्य हो सकता है? कैसे परमेश्वर, जो बनाता है, उस मनुष्य के जैसा हो सकता है, जिसे बनाया गया है? मैं कैसे पृथ्वी पर मनुष्य के साथ हमेशा रह सकता हूँ और उसके साथ मिलकर कार्य कर सकता हूँ? कौन मेरे हृदय की चिंता करता है? क्या ये मनुष्य की प्रार्थनाएँ हैं? मैं मनुष्य के साथ जुड़ने और उसके साथ चलने के लिए एक बार सहमत हो गया था—और हाँ, आज के दिन तक मनुष्य ने मेरी देखभाल और सुरक्षा में जीवन बिताया है, परन्तु वह कौन सा दिन है जब मनुष्य मेरी देखभाल से अपने आपको अलग कर सकता है? चाहे मनुष्य ने मेरे हृदय की कभी परवाह नहीं की, कौन बिना प्रकाश के भूमि पर निरन्तर रह सकता है? यह केवल मेरी आशीषों के कारण है कि मनुष्य ने आज के दिन तक जीवन बिताया है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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