परमेश्वर के दैनिक वचन | "संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन : अध्याय 17" | अंश 226

मैं अपने कार्य को उसकी सम्पूर्णता में प्रकट करते हुए पृथ्वी पर अपने अधिकार का उपयोग करता हूँ। जो कुछ मेरे कार्य में है वह पृथ्वी की सतह पर दिखाई देता है; पृथ्वी पर मानवजाति कभी भी न तो स्वर्ग पर मेरी हलचलों को समझने में, न ही सुविस्तृत रूप से मेरी आत्मा के कार्यक्षेत्र और प्रक्षेप-पथ पर चिंतन करने में समर्थ रही है। अधिकांश मानवजाति, आत्मा की वास्तविक अवस्था को समझने में सक्षम हुए बिना, केवल ज़रा सी बातों को ही ग्रहण करती है, जो आत्मा के बाहर हैं। मैं मानवजाति से जो माँगें करता हूँ वे उस अस्पष्ट मैं से जो स्वर्ग में हूँ, या उस अनुमान न लगाने के योग्य मैं से जो पृथ्वी पर हूँ जारी नहीं होती हैं: मैं पृथ्वी पर मनुष्य की कद-काठी के अनुसार उपयुक्त माँग करता हूँ। मैंने कभी भी किसी को कठिनाईयों में नहीं डाला है, न ही मैंने कभी भी किसी से अपने आनन्द के लिए "उसके खून को निचोड़ने" के लिए कहा है: क्या ऐसा हो सकता है कि मेरी माँगें केवल इन्हीं शर्तों तक सीमित हैं? पृथ्वी पर असंख्य प्राणियों में से, कौनसा मेरे मुँह के वचनों के स्वभाव के प्रति समर्पित नहीं होता है? इनमें से कौनसा प्राणी मेरे सामने आ कर, मेरे वचनों और मेरी जलती हुई आग के माध्यम से पूरी तरह से जल नहीं जाता है? इनमें से कौन सा प्राणी मेरे सामने गर्वीले उन्माद से अकड़ कर चलता है? इनमें से कौन सा प्राणी मेरे सामने झुकता नहीं है? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जो सृष्टि पर सिर्फ़ अपनी चुप्पी को अधिरोपित करता है? सृष्टि की असंख्य चीजों में से, मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे इरादों को संतुष्ट करती हैं; मानवजाति में असंख्य मनुष्यों में से मैं उन्हें चुनता हूँ जो मेरे हृदय की परवाह करते हैं। मैं समस्त सितारों में से सर्वोत्तम को चुनता हूँ, परिणामस्वरूप अपने राज्य के लिए प्रकाश की एक हल्की सी चमक बढ़ाता हूँ। मैं पृथ्वी पर पैदल चलता हूँ, अपनी खुशबू को हर जगह बिखेरता हूँ, और प्रत्येक स्थान पर मैं अपने स्वरूप को पीछे छोड़ जाता हूँ। प्रत्येक और हर एक स्थान पर मेरी वाणी की ध्वनि गूँजती रहती है। हर जगह लोग बीते हुए कल के रमणीय दृश्यों पर आतुर हो कर टिके रहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण मानवजाति अतीत को याद करती है ...

सम्पूर्ण मानवजाति मेरे चेहरे को देखने की लालसा करती है, परन्तु जब मैं पृथ्वी पर व्यक्तिगत रूप से उतरता हूँ, तो वे सब मेरे आगमन के विरुद्ध हो जाते हैं, वे सभी रोशनी को आने से भगा देते हैं, मानो कि मैं स्वर्ग में मनुष्यों का शत्रु हूँ। मनुष्य अपनी आँखों में एक रक्षात्मक रोशनी के साथ मेरा स्वागत करता है और इस बात से गहराई से भयभीत होकर कि मेरे पास उसके लिए कुछ अन्य योजनाएँ हो सकती हैं, हमेशा सतर्क बना रहता है। क्योंकि मानवजाति मुझे एक अपरिचित मित्र के रूप में मानती है, इसलिए वह ऐसा महसूस करती है मानो कि मैं उसे बिना किसी भेद विचार के मारने का इरादा रखता हूँ। मनुष्य की नज़रों में, मैं एक घातक विरोधी हूँ। विपत्तियों के बीच मेरी गर्मजोशी का अनुभव ले कर, मनुष्य तथापि अभी भी मेरे प्रेम से अनभिज्ञ है, और अभी भी मुझे रोकने और मेरी उपेक्षा करने पर दृढ़ है। उसके विरुद्ध कार्रवाई करने के लिए उसके इस हालात में होने का लाभ उठाने से कहीं दूर, मैं मनुष्य को आलिंगन की गर्मजोशी में आच्छादित कर लेता हूँ, उसके मुँह को मिठास से भर देता हूँ, और उसके पेट में आवश्यक भोजन रख देता हूँ। परन्तु, जब मेरी क्रोध से भरी नाराज़गी पहाड़ों और नदियों को हिलाएगी, तो मैं मनुष्य की कायरता के कारण, उस पर ये विभिन्न रूपों की राहत अब और प्रदान नहीं करूँगा। इस क्षण में, मैं अपने प्रचण्ड क्रोध को बढ़ाऊँगा, सभी जीवित प्राणियों को पश्चाताप करने का एक मौका देने से इनकार करते हुए, और मनुष्य की समस्त आशा का बहिष्कार करते हुए, मैं वह दण्ड दूँगा जिसके लिए वह पूर्ण रूप से योग्य है। इस समय, बिजली की गर्जना होती है और बिजली कौंधती है और गड़गड़ाहट होती है जैसे कि महासागर की लहरें गुस्से में उग्र हो रही हों, जैसे दस हजार पहाड़ टूट कर गिर रहे हों। अपनी विद्रोहशीलता के कारण, मनुष्य बिजली की गर्जना और बिलजी के चमकने से कट कर गिर जाता है, अन्य प्राणी भी बिजली की गर्जना और बिलजी की चमक में मिट जाते हैं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अचानक अराजकता में पड़ जाता है और सृष्टि जीवन की मौलिक साँस लेने में असमर्थ भी हो जाती है। मानवजाति के असंख्य समुदाय बिजली की गर्जना की दहाड़ से बच कर निकल नहीं सकते हैं; बिजली की कौंध के बीच, मानवजाति के, झुंड के झुंड, प्रपात की तरह गिरती हुए प्रचण्ड धाराओं द्वारा बहा लिए जाने के लिए, तेजी से बहती हुई धारा में गिरते हैं। अचानक, मानवजाति के आश्रय के स्थान में मनुष्यों का एक संसार मिलता है। महासागर की सतह पर लाशें बहती हैं। मेरे कोप के कारण संपूर्ण मानवजाति मुझसे बहुत दूर चली जाती है, क्योंकि मनुष्य ने मेरी आत्मा के सार के विरुद्ध अपमान किया है, उसके विद्रोह ने मुझे अप्रसन्न किया है। परन्तु, जल से रिक्त स्थान में, अन्य लोग, हँसी और गीत के बीच, अभी भी उन प्रतिज्ञाओं का आनन्द ले रहे हैं, जो मैनें उन्हें कृपापूर्वक प्रदान की हैं।

जब सम्पूर्ण मानवजाति शांत हो जाती है, तो मैं उसकी निगाह के सामने प्रकाश की किरण छोड़ता हूँ। फलस्वरूप, मनुष्य के मन साफ़ हो जाते हैं और उनकी दृष्टि उज्जवल हो जाती है और वे मौन रहने की इच्छा को छोड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं; इस प्रकार, उनके हृदय में आध्यात्मिक भावनाएँ तुरन्त जाग जाती हैं। इस समय, सम्पूर्ण मानवजाति पुनर्जीवित हो जाती है। अपनी अनकही शिकायतों को बेक़ार समझ कर छोड़ते हुए, मेरे कहे हुए वचन के माध्यम से जीवित रहने का एक और अवसर प्राप्त करके, सभी मनुष्य मेरे सामने आते हैं। ऐसा इस कारण होता है क्योंकि समस्त मानवजाति इस धरती की सतह पर जीवित रहना चाहती है। फिर भी उनमें से किसने कभी भी मेरे वास्ते जीने का इरादा किया है? उनमें से किस ने भी कभी भी अपने अंदर की शानदार चीजों को मुझे आनन्द प्रदान करने के लिए अनावृत किया है? उनमें से किसने मुझ में मौजूद मोहक खुशबू का पता लगाया है? समस्त मानवजाति सभी प्रकार के घटिया और अपरिष्कृत पदार्थ से बनी है: बाहर की तरफ, वे आँखों को चैंधियाने वाले प्रतीत होते हैं, परन्तु अपने तात्विक अहम् में वे मुझे ईमानदारी से प्रेम नहीं करते हैं, क्योंकि मनुष्य के हृदय के गहरे कोने में मेरा कभी भी थोड़ा सा भी महत्व नहीं रहा है। मनुष्य में बहुत कमियाँ हैं: मुझसे तुलना करने पर, ऐसा प्रतीत होगा कि हम इतने दूर हैं जैसे कि स्वर्ग से पृथ्वी। तब भी, मैं मनुष्य के कमज़ोर और सुभेद्य स्थलों पर आक्रमण नहीं करता हूँ, न ही मैं उसका तिरस्कार करने के लिए उसकी कमियों के कारण उसकी हँसी उड़ाता हूँ। मेरे हाथ हज़ारों सालों से पृथ्वी पर कार्य कर रहे हैं, और इस पूरे समय में मेरी आँखों ने सम्पूर्ण मानवजाति पर निगरानी रखी हैं। लेकिन मैंने कभी भी एक भी मानव जीवन को लापरवाही से खेलने के लिए नहीं लिया है मानो कि यह खिलौना हो। मैं मनुष्य के हृदय के रक्त को देखता हूँ, और मैं उस कीमत को समझता हूँ जो उसने चुकाई है। जब वह मेरे सामने खड़ा होता है, तो मैं न तो उसे ताड़ित करने के लिए, और न ही उसे अवांछनीय चीजें प्रदान करने के लिए, मनुष्य की असहायता का लाभ उठाना चाहता हूँ। इसके बजाय, मैंने इस पूरे समय में केवल मनुष्य का भरण पोषण किया है, और मनुष्य को दिया है। और इसलिए, मनुष्य जो आनन्द लेता है वह पूरी तरह से मेरा अनुग्रह ही है, और पूरी तरह से उपहार है जो मेरे हाथों से आया है। क्योंकि मैं पृथ्वी पर हूँ, इसलिए मनुष्य को किसी भी प्रकार की भूख की यंत्रणा से पीड़ित नहीं होना पड़ा। बल्कि, मैं मनुष्य को अपने हाथों से उन चीजों को प्राप्त करने देता हूँ जिनका वह आनन्द ले सकता है, और मानवजाति को अपने आशीषों के अंदर रहने देता हूँ। क्या सम्पूर्ण मानवजाति मेरी ताड़ना के अधीन नहीं रहती है? जिस प्रकार से, आनन्द लिए जाने के लिए, पहाड़ अपनी गहराई में समृद्धि की चीजों को और बहुतायता से, और समुद्र अपनी विशालता में आनंद ली जाने वाली चीजों को धारण करता है, क्या उसी तरह आज मेरे वचनों के भीतर रह रहे लोगों के पास और भी अधिक भोजन नहीं है जिसकी वे सराहना करते और स्वाद लेते हैं? मैं पृथ्वी पर हूँ, और पृथ्वी पर मानवजाति मेरी आशीषों का आनन्द लेती है। जब मैं पृथ्वी को पीछे छोड़ जाता हूँ, जो कि तब भी होता है जब मेरा कार्य अपनी पूर्णता पर पहुँच जाता है, तो उस समय, मानवजाति अपनी कमज़ोरियों के वास्ते मुझसे अब और कोई भी सुविधा प्राप्त नहीं करेगी।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

इंसान का विद्रोह जगाता है परमेश्वर के क्रोध को

हिलायेगा जब परमेश्वर का रोषपूर्ण क्रोध पर्वतों, नदियों को, तो परमेश्वर मदद नहीं देगा कायर इंसानों को। रोष में उन्हें वो पछताने का मौका नहीं देगा, उनसे कोई उम्मीद नहीं रखेगा, जिसके लायक हैं वो सज़ा उन्हें देगा। प्रचंड कुपित लहरों की तरह, भीषण गर्जनाएँ होंगी, जैसे ढह रहे हों पर्वत हज़ारों। इंसानों को उसके विद्रोह की वजह से गिराकर मार दिया जाएगा। गर्जना और कड़कती बिजली में मिटा दिये जाएँगे जीव सारे, जीव सारे। बहुत दूर चला जाता है इंसान परमेश्वर से, उसके क्रोध की वजह से। क्योंकि अपमान किया है पवित्र आत्मा के सार का इंसान ने, नाख़ुश किया है परमेश्वर को इंसान के विद्रोह ने।

एकाएक पूरी कायनात में उथल-पुथल हो जाती है, सृष्टि ले नहीं पाती जीवन का मूल श्वास फिर से। इंसान बच नहीं पाता भीषण गर्जनाओं से; चमकती बिजलियों के बीच, प्रचंड धाराओं में, पर्वतों से आती प्रचंड धारा में, गिरकर बह जाते हैं इंसानी झुण्ड। इंसान के “गंतव्य” में अचानक “मानव” का विश्व जमा हो जाता है, लाशें बहती हैं समंदर में, समंदर में। बहुत दूर चला जाता है इंसान परमेश्वर से, उसके क्रोध की वजह से। क्योंकि अपमान किया है पवित्र आत्मा के सार का इंसान ने, नाख़ुश किया है परमेश्वर को इंसान के विद्रोह ने। बहुत दूर चला जाता है इंसान परमेश्वर से, उसके क्रोध की वजह से। क्योंकि अपमान किया है पवित्र आत्मा के सार का इंसान ने, नाख़ुश किया है परमेश्वर को इंसान के विद्रोह ने। मगर धरती पर बेख़ौफ़, दूसरे लोग गा रहे हैं, हँसी और गीतों के मध्य, परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं का आनंद ले रहे हैं, जो पूरी की हैं परमेश्वर ने महज़ उनके लिये, उनके लिये।

'मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ' से

अब बड़ी-बड़ी विपत्तियाँ आ रही हैं और वह दिन निकट है जब परमेश्वर भलाई का प्रतिफल देगें और बुराई को दण्ड देंगे। हमें एक सुंदर गंतव्य कैसे मिल सकता है?

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