परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का कार्य" | अंश 176

पवित्र आत्मा का कार्य कुल मिलाकर लोगों को इस योग्य बनाना है कि वे लाभ प्राप्त कर सकें; यह कुल मिलाकर लोगों की उन्नति के विषय में है; ऐसा कोई कार्य नहीं है जो लोगों को लाभान्वित न करता हो। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि सत्य गहरा है या उथला, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन लोगों की क्षमता किसके समान है जो सत्य को स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी पवित्र आत्मा करता है, यह सब लोगों के लिए लाभदायक है। परन्तु पवित्र आत्मा का कार्य सीधे तौर पर नहीं किया जाता है; इसे उन मनुष्यों से होकर गुज़रना होगा जो उसके साथ सहयोग करते हैं। यह केवल इसी रीति से होता है जिससे पवित्र आत्मा के कार्य के परिणामों को प्राप्त किया जा सकता है। हाँ वास्तव में, जब यह पवित्र आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य है, तो इसमें मिलावट बिलकुल भी नहीं की जाती है; परन्तु जब यह मनुष्य के माध्यम का उपयोग करता है, तो यह अत्यंत मिश्रित हो जाता है और यह पवित्र आत्मा का मूल कार्य नहीं है। इस रीति से, सच्चाई विभिन्न मात्राओं में बदल जाती है। अनुयायी पवित्र आत्मा के मूल अर्थ को प्राप्त नहीं करते हैं परन्तु पवित्र आत्मा के कार्य और मनुष्य के अनुभव एवं ज्ञान के संयोजन को प्राप्त करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य का भाग जिसे अनुयायियों के द्वारा प्राप्त किया जाता है वह सही होता है। मनुष्य का अनुभव एवं ज्ञान जिन्हें प्राप्त किया जाता है वे भिन्न होते हैं क्योंकि कार्यकर्ता भिन्न होते हैं। जब एक बार कार्यकर्ताओं को पवित्र आत्मा का अद्भुत प्रकाशन एवं मार्गदर्शन प्राप्त होता है, तो वे इसके बाद इस अद्भुत प्रकाशन एवं मार्गदर्शन के आधार पर अनुभव करते हैं। इन अनुभवों के अंतर्गत मनुष्य का मस्तिष्क एवं अनुभव, साथ ही साथ मानवता का अस्तित्व भी मिला हुआ होता है, जिसके बाद वे उस ज्ञान को हासिल करते हैं या उन चीज़ों को देखते हैं जिन्हें उन्हें देखना चाहिए। जब मनुष्य सत्य का अनुभव कर लेता है उसके पश्चात् यह अभ्यास का मार्ग है। अभ्यास का यह मार्ग हमेशा एक समान नहीं होता है क्योंकि लोगों के पास भिन्न भिन्न अनुभव होते हैं और ऐसी चीज़ें जिनका लोग अनुभव करते हैं वे भिन्न भिन्न होती हैं। इस रीति से, पवित्र आत्मा का वही अद्भुत प्रकाशन भिन्न भिन्न ज्ञान एवं अभ्यास में परिणित होता है क्योंकि ऐसे लोग जिन्होंने अद्भुत प्रकाशन को प्राप्त किया है वे भिन्न भिन्न लोग हैं। कुछ लोग अभ्यास के दौरान छोटी छोटी ग़लतियां करते हैं जबकि कुछ लोग बड़ी बड़ी ग़लतियां करते हैं, और कुछ लोग और कुछ नहीं सिर्फ ग़लतियां ही करते हैं। यह इसलिए है क्योंकि लोगों की समझने की योग्यताएं भिन्न होती हैं और इसलिए क्योंकि उनकी वास्तविक क्षमता भी भिन्न होती है। किसी सन्देश को सुनने के बाद कुछ लोग इसे इस तरह से समझते हैं, और एक सच्चाई को सुनने के बाद कुछ लोग इसे उस तरह से समझते हैं। कुछ लोग थोड़ा सा भटक जाते हैं; और कुछ लोग सत्य के अर्थ को बिलकुल भी समझ नहीं पाते हैं। इसलिए, चाहे कोई इसे जैसे भी समझे वह इस प्रकार ही दूसरों की अगुवाई करेगा; यह बिलकुल सच है, क्योंकि उसका कार्य मात्र उसके अस्तित्व को अभिव्यक्त कर रहा है। ऐसे लोग जिनकी अगुवाई उन लोगों के द्वारा की जाती है उनके पास भी सत्य की सही समझ होती है। भले ही ऐसे लोग हैं जिनकी समझ में त्रुटियां होती हैं, फिर भी उनमें से बहुत कम लोग ही ऐसे होते हैं, और सभी लोगों में त्रुटियां नहीं होती हैं। ऐसे लोग जिनकी अगुवाई उन लोगों के द्वारा की जाती है जिनमें सत्य की समझ को लेकर त्रुटियां होती हैं तो वे निःसन्देह त्रुटिपूर्ण होते हैं। ये लोग वचन के प्रत्येक एहसास में ग़लत होंगे। अनुयायियों के मध्य सत्य को समझने की मात्रा वृहद रूप से कार्यकर्ताओं पर निर्भर होती है। हाँ वास्तव में, ऐसा सत्य जो परमेश्वर से है वह त्रुटिहीन है, और पूरी तरह से निश्चित होता है। परन्तु, कार्यकर्ता पूरी तरह से सही नहीं होते हैं और ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि वे पूरी तरह से विश्वसनीय हैं। यदि कार्यकर्ताओं के पास सत्य का अभ्यास करने के लिए एक तरीका होता जो काफी व्यावहारिक है, तो अनुयायियों के पास भी अभ्यास का एक तरीका होता। यदि कार्यकर्ताओं के पास सत्य का अभ्यास करने के लिए कोई तरीका नहीं होता परन्तु केवल सिद्धान्त ही होता, तो अनुयायियों के पास कोई वास्तविकता नहीं होती। अनुयायियों की क्षमता एवं स्वभाव जन्म से ही तय होते हैं और उन्हें कार्यकर्ताओं के साथ जोड़ा नहीं जाता है। परन्तु जिस हद तक अनुयायी सत्य को समझते हैं और परमेश्वर को जानते हैं यह उन कार्यकर्ताओं पर निर्भर होता है (यह केवल कुछ लोगों के लिए ही ऐसा है)। चाहे कोई कार्यकर्ता जिसके भी समान हो, वे अनुयायी जिनकी वह अगुवाई करता है उनको ऐसा ही होना होगा। जो कुछ एक कार्यकर्ता अभिव्यक्त करता है वह उसका स्वयं का अस्तित्व है, और यह बिना किसी सन्देह के है। वे मांगें जिन्हें वह अपने अनुयायियों से करता है वे ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें वह स्वयं प्राप्त करना चाहता है या जिसे प्राप्त करने के लिए वह योग्य है। अधिकांश कार्यकर्ता जो कुछ वे स्वयं करते हैं उसके आधार पर अपने अनुयायियों से मांग करते हैं, इसके बावजूद ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जिन्हें लोग बिलकुल भी हासिल नहीं कर सकते हैं। जिसे लोग प्राप्त नहीं कर सकते हैं वह उनके प्रवेश में बाधा बन जाती है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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