परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IX" | अंश 183

चौथा, परमेश्वर ने विभिन्न जातियों के बीच सीमाएं खींची हैं। पृथ्वी पर गोरे लोग, काले लोग, भूरे लोग, और पीले लोग हैं। ये अलग प्रकार के लोग हैं। साथ ही परमेश्वर ने इन विभिन्न प्रकार के लोगों की ज़िन्दगियों के लिए दायरा भी तय किया है, और इसकी जानकारी के बगैर, लोग परमेश्वर के प्रबंधन के अधीन जीवित रहने के लिए अपने उचित वातावरण के भीतर रहते हैं। कोई भी इस से बाहर कदम नहीं रख सकता। उदाहरण के लिए, गोरी जाति-अर्थात्, गोरे लोग—वे अधिकांशतः किन इलाकों में रहते हैं? वे अधिकांशतः यूरोप और अमेरिकन देशों में रहते हैं। काले लोग मुख्य रूप से अफ्रीका में रहते हैं। और भूरे लोग किन क्षेत्रों में रहते हैं? मुख्य रूप से दक्षिणी एशिया जैसे थाइलैण्ड, भारत, म्यांमार, वियतनाम और लाओस में रहते हैं। अर्थात्, दक्षिणी एशिया के प्रदेश। पीले लोग मुख्य रूप से एशिया में रहते हैं, अर्थात्, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, और अन्य समान देशों में। परमेश्वर ने इन अलग अलग प्रकार की सभी जातियों को उचित रूप से विभाजित किया है ताकि ये अलग अलग जातियां संसार के विभिन्न भागों में विभाजित हो जाएं। संसार के इन अलग अलग भागों में, परमेश्वर ने बहुत पहले से ही मनुष्यों की प्रत्येक भिन्न जाति के लिए जीवित रहने हेतु उपयुक्त वातावरण तैयार किया है। जीवित रहने के लिए इस प्रकार के वातावरण के अंतर्गत, परमेश्वर ने उनके लिए मिट्टी के रंग और तत्वों को बनाया है। गोरे लोगों के शरीरों और काले लोगों के शरीरों के तत्व एक समान नहीं हैं, और साथ ही वे अन्य रंगों के लोगों के शरीरों के तत्वों से भी भिन्न हैं। जब परमेश्वर ने सभी जीवों को बनाया, तब उसने पहले से ही जीवित रहने के लिए एक ऐसा वातावरण तैयार कर लिया था। उसमें उसका उद्देश्य था कि जब उस प्रकार के लोगों ने बहुगुणित होना शुरू किया, जब उन्होंने संख्या में बढ़ना शुरू किया, तो उन्हें उस दायरे के भीतर स्थायी किया जा सके। इससे पहले कि परमेश्वर ने मनुष्य को रचा उसने पहले से ही यह सब सोच लिया था—वह गोरे लोगों को विकसित होने और जीवित रहने हेतु अनुमति देने के लिए एक निश्चित क्षेत्र प्रदान करेगा। अतः जब परमेश्वर पृथ्वी की सृष्टि कर रहा था तब उसके पास पहले से ही एक योजना थी, जो कुछ वह भूमि के उस टुकड़े में रख रहा था, और भूमि के उस टुकड़े पर जिसका पालन पोषण किया जाएगा उस में उसका अभिप्राय और उद्देश्य था। उदाहरण के लिए, परमेश्वर ने बहुत पहले तैयारी की थी कि कौन कौन से पर्वत, कितने मैदान, कितने पानी के स्रोत, किस प्रकार के पक्षी और पशु, कौन कौन सी मछलियां, और कौन कौन से पौधे उस भूमि पर होंगे। एक प्रकार के मानव प्राणी के लिए, एवं एक जाति के लिए जीवित रहने हेतु एक वातावरण तैयार करते समय, परमेश्वर ने मामलों के कई पहलुओं पर विचार किया था: भौगोलिक वातावरण, मिट्टी के तत्व, कई प्रकार के पशु और पक्षी, विभिन्न प्रकार की मछलियों के आकार, मछलियों के तत्व, पानी की भिन्न-भिन्न विशेषताएं, साथ ही साथ विभिन्न प्रकार के सभी पौधे...। परमेश्वर ने इन सभी को बहुत पहले ही बना लिया था। उस प्रकार का वातावरण जीवित रहने के लिए एक देशीय वातावरण है जिसे परमेश्वर ने गोरे लोगों के लिए सृजा और तैयार किया था। तुम लोगों को यह देखने में सक्षम होना चाहिए कि जब परमेश्वर ने सभी जीवों की सृष्टि की, तो उसने उस में बहुत ज़्यादा सोच-विचार किया था। उसने चीज़ों को एक योजना के साथ अंजाम दिया। अब तुम सब देख सकते हो, है ना? (विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए परमेश्वर के विचार बहुत ही विचारशील थे। विभिन्न प्रकार के मनुष्यों के लिए जीवित रहने हेतु उस वातावरण के लिए, उसने उस प्रकार के पक्षियों और पशुओं और उस प्रकार की मछलियों को बनाया, तो वहां कितने सारे पर्वत और कितने सारे मैदान होंगे। इन सभी पर बहुत विचारपूर्वक और ठीक रीति से विचार किया गया था।) उदाहरण के लिए, गोरे लोग मुख्य रूप से कौन सा आहार खाते हैं? (यह मुख्य रूप से उच्च प्रोटीन युक्त आहार है—कई प्रकार के मांस, दुग्ध उत्पाद, और गेहूँ पर आधारित आहार।) वे आहार जो गोरे लोग खाते हैं वे उन आहारों से बिलकुल अलग है जो एशिया के लोग खाते हैं। मुख्य खाद्य पदार्थ जो गोरे लोग खाते हैं वे मुख्य रूप से मांस, अण्डे, दूध और मुर्गीपालन के पदार्थ हैं। अनाज जैसे रोटी और चावल सामान्यतः मुख्य आहार नहीं हैं उन्हें थाली के किनारे पर रखा जाता है। यहां तक कि सलाद खाते समय, जो सब्जियों से बनता है, वे इस में कुछ भुना हुआ गोमांस या चिकन डालते हैं। भले ही वे गेहूं पर आधारित कुछ आहार खाते हैं, फिर भी वे इसमें चीज़, अण्डे, और मांस डाल देते हैं। दूसरे शब्दों में, उनके मुख्य भोज्य पदार्थ मुख्य रूप से गेहूं पर आधारित आहार या चावल से नहीं बने होते हैं; वे तो बहुत सारा मांस और चीज़ खाते हैं। वे प्रायः बर्फीला पानी पीते हैं क्योंकि वे वास्तव में उच्च कैलोरी युक्त आहार खाते हैं। जब वे एक समय का भोजन करते हैं, तो भोजन परोसे जाने से पहले हर कोई पहले एक गिलास बर्फीला पानी पीता है, अतः गोरे लोग वास्तव में तगड़े होते हैं। ये उनके जीवन के लिए स्रोत हैं, जीने के लिए उनके वातावरण हैं जिन्हें परमेश्वर के द्वारा उनके लिए तैयार किया गया था, जो उन्हें उस तरह की जीवनशैली पाने की अनुमति देते हैं। वह जीवनशैली अन्य रंगों के लोगों की जीवनशैलियों से अलग है। इस जीवनशैली में कुछ सही या ग़लत नहीं है—यह जन्मजात, परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित और परमेश्वर के शासन और उसके इंतज़ामों के कारण है। इस प्रकार की जाति के पास अपनी जीविका के लिए एक निश्चित जीवनशैली और निश्चित स्रोत हैं जो उनकी जाति के कारण है, साथ ही साथ जीवित रहने के लिए उस वातावरण के कारण है जिसे परमेश्वर द्वारा उनके लिए तैयार किया गया था। तुम लोग कह सकते होकि जीवित रहने के लिए वह वातावरण जिसे परमेश्वर ने गोरे लोगों के लिए तैयार किया था और वह दैनिक आहार जिसे वे उस वातावरण से प्राप्त करते हैं वह पौष्टिक और बहुतायत से है।

साथ ही परमेश्वर ने दूसरी जातियों के जीवित रहने के लिए भी आवश्यक वातावरण को तैयार किया। साथ ही काले लोग भी हैं-काले लोगों को कहां स्थापित किया गया है? उन्हें मुख्य रूप से मध्य और दक्षिणी अफ्रीका में स्थापित किया गया है। उस प्रकार के वातावरण में जीने के लिए परमेश्वर ने उनके लिए क्या तैयार किया था? उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन, सभी प्रकार के पक्षी और पशु, साथ ही मरुस्थल, और सभी प्रकार के पौधे जो उनके साथ बढ़ते हैं। उनके पास जल के स्रोत, अपनी जीवनशैलियां, और भोजन हैं। परमेश्वर उनके विरूद्ध पक्षपाती नहीं था। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि उन्होंने हमेशा क्या किया, उनका ज़िन्दा रहना कभी भी एक मुद्दा नहीं रहा है। साथ ही वे संसार के एक निश्चित स्थान और एक निश्चित क्षेत्र पर काबिज़ हैं।

आओ, अब हम पीले लोगों के बारे में कुछ बातें करें। पीले लोगों को मुख्य रूप से पूर्व में स्थापित किया गया है। पूरब और पश्चिम के वातावरण और भौगोलिक स्थितियों के बीच क्या भिन्नताएं हैं? पूरब में, अधिकांश भूमि उपजाऊ है, और यह भौतिक और खनिज भण्डारों से भरपूर है। अर्थात्, भूमि के ऊपर और भूमि के नीचे की सब प्रकार की सम्पदाएं बहुतायत से हैं। और इस समूह के लोगों के लिए, अर्थात् इस जाति के लिए, परमेश्वर ने अनुकूल मिट्टी, जलवायु, और विभिन्न भौगोलिक वातावरण को भी तैयार किया था जो उनके लिए उपयुक्त हैं। हालांकि भौगोलिक वातावरण और पश्चिम के वातावरण के बीच बहुत भिन्नताएं हैं, फिर भी लोगों के आवश्यक भोजन, उनकी जीविका, और जीवित रहने के लिए उनके स्रोत को परमेश्वर के द्वारा तैयार किया गया था। पश्चिम में गोरे लोगों के पास जो वातावरण है यह उसकी तुलना में बस एक अलग वातावरण है। लेकिन वह एक चीज़ क्या है, जिस पर मैं तुम लोगों का ध्यान खींचना चाहता हूँ, जिसे मुझे तुम्हें बताने की आवश्यकता है? पूर्वी जाति की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है, अतः परमेश्वर ने बहुत सारे तत्वों को भूमि के उस हिस्से में जोड़ दिया है जो पश्चिम से भिन्न हैं। संसार के उस भाग में, उसने बहुत सारे अलग अलग भू-दृश्यों और सब प्रकार की भरपूर भौतिक सामग्रियों को जोड़ दिया था। वहां प्राकृतिक संसाधन प्रचुर मात्रा में हैं; साथ ही भूभाग भी विभिन्न एवं विविध प्रकार के हैं, और पूर्वी जाति की भारी संख्या का पालन पोषण करने के लिए पर्याप्त हैं। कोई चीज़ जो पश्चिम से अलग है वह पूर्व में है—दक्षिण से उत्तर तक, पूर्व से लेकर पश्चिम तक—जलवायु पश्चिम से बेहतर है। चारों ऋतुओं का स्पष्ट रूप से वर्णन किया गया है, तापमान अनुकूल हैं, प्राकृतिक सम्पदाएं प्रचुर मात्रा में हैं, और प्राकृतिक दृश्य और विभिन्न प्रकार के भूभाग पश्चिम से बहुत बेहतर हैं। परमेश्वर ने ऐसा क्यों किया था? परमेश्वर ने गोरे लोगों और पीले लोगों के बीच में एक बहुत ही तर्कसंगत सन्तुलन बनाया था। इसका क्या अर्थ है? गोरे लोग जिसका आनन्द ले सकते हैं, उसका हर एक पहलु उससे बेहतर है जिसका आनन्द लेने में पीले लोग सक्षम हैं। उनका भोजन और वे चीज़ें जिन्हें वे उपयोग करते हैं बहुत ही बेहतर हैं। फिर भी, परमेश्वर किसी भी जाति के विरुद्ध पक्षपाती नहीं है। परमेश्वर ने जीवित रहने के लिए पीले लोगों को कहीं अधिक ख़ूबसूरत और बेहतर वातावरण दिया। यह वह संतुलन है। तो अब तुम लोग अच्छी तरह समझ गए हो ना?

परमेश्वर ने पहले से ही निर्धारित किया है कि किस प्रकार के लोग दुनिया के किस भाग में रहते हैं और मनुष्य इस दायरे के बाहर नहीं जा सकता है। यह एक अद्भुत चीज़ है! भले ही विभिन्न युगों या विशेष समयों के दौरान युद्ध या आक्रमण हुए हैं, फिर भी ये युद्ध, और ये आक्रमण जीवित रहने के लिए उन विभिन्न वातावरण को बिल्कुल भी नष्ट नहीं कर सकते हैं जिन्हें परमेश्वर ने प्रत्येक जाति के लिए पूर्वनिर्धारित किया है। अर्थात्, परमेश्वर ने संसार के एक निश्चित भाग में एक निश्चित प्रकार के लोगों को स्थायी किया है और वे उस दायरे के बाहर नहीं जा सकते हैं। भले ही लोगों के पास अपने सीमाक्षेत्रों को बदलने या फैलाने की किसी प्रकार की महत्वाकांक्षा हो, फिर भी परमेश्वर की अनुमति के बिना, इसे हासिल कर पाना बहुत मुश्किल होगा। सफलता प्राप्त करना बहुत ही कठिन होगा। उदाहरण के लिए, गोरे लोग अपने सीमाक्षेत्र का विस्तार करना चाहते थे और उन्होंने अन्य देशों में उपनिवेश बनाए। जर्मनी ने कुछ देशों पर आक्रमण किया, और इंग्लैण्ड ने भारत पर कब्ज़ा कर लिया। परिणाम क्या था? अंत में वे विफल हो गए। हम इस असफलता से क्या देखते हैं? जो कुछ परमेश्वर ने पहले से निर्धारित कर दिया है उसे नष्ट करने की अनुमति नहीं दी गई है। अतः, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह गति कितनी तेज थी जिसे शायद तुम सबने इंग्लैण्ड के विस्तार में देखा होगा, क्योंकि अंत में परिणाम यह है कि उन्हें तब भी पीछे लौटना पड़ा था और वह भूमि अब भी भारत की ही है। वे लोग जो उस भूमि में रहते हैं अभी भी भारतीय हैं, अंग्रेज़ नहीं। यह इसलिए है क्योंकि यह कुछ ऐसा है जिसकी अनुमति परमेश्वर नहीं देता है। उन में से कुछ लोग जो इतिहास या राजनीति की खोज करते हैं उन्होंने इस पर जानकारियां प्रदान की हैं। वे अनेक कारण देते हैं कि इंग्लैण्ड क्यों असफल हुआ था, यह कहते हुए कि ऐसा हो सकता है क्योंकि एक निश्चित जातीय समूह पर विजय प्राप्त नहीं किया जा सकता था, या यह कुछ अन्य मानवीय कारण से हो सकता था...। ये वास्तविक कारण नहीं हैं। वास्तविक कारण है परमेश्वर की वजह से-उसने इसकी अनुमति नहीं दी है। परमेश्वर के पास एक जातीय समूह है जो एक निश्चित भूमि में रहता है और वह उन्हें वहाँ बसाता है, और यदि परमेश्वर उन्हें स्थान बदलने की अनुमति नहीं देता है तो वे कभी भी स्थान बदलने में सक्षम नहीं होंगे। यदि परमेश्वर उनके लिए एक दायरे को निर्धारित करता है, तो वे उस दायरे के भीतर ही रहेंगे। मानवजाति इन दायरों को तोड़ कर मुक्त नहीं हो सकती है या तोड़ कर बाहर नहीं आ सकती है। यह निश्चित है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि आक्रमणकारियों की ताकत कितनी ज़्यादा है या जिन पर आक्रमण किया जा रहा है वे कितने कमज़ोर हैं, क्योंकि अंत में उनकी सफलता परमेश्वर पर ही निर्भर है। उसने पहले से ही इसे पूर्वनिर्धारित कर दिया है और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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