परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है IV" | अंश 146

(मत्ती 4:8-11) फिर इब्लीस उसे एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, "यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।" तब यीशु ने उससे कहा, "हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा है: तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।

शैतान ने, अपनी पिछली दो चालों में असफल होने के बाद एक और कोशिश की: उसने प्रभु यीशु को सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाया और उससे शैतान की आराधना करने को कहा। इस स्थिति में शैतान का कौन सा वैशिष्ट्य देखते हैं? क्या शैतान पूरी तरह से बेशर्म नहीं है? (हां।) वह कैसे बेशर्म हो सकता है? प्रत्येक वस्तु परमेश्वर द्वारा रची गई थी। फिर भी शैतान इसे पलटता है और परमेश्वर को दिखाते हुए कहता है कि "इन सारे राज्यों के धन और वैभव को देख। यदि तू मेरी उपासना करे तो मैं यह सब तुझे दे दूंगा"। क्या यह उल्टा चलन नहीं है? क्या शैतान बेशर्म नहीं है? परमेश्वर ने सब कुछ बनाया, पर क्या यह उसके आनन्द के लिए था? परमेश्वर ने सब कुछ मनुष्य जाति को दे दिया, परन्तु शैतान उन सब को अपने कब्ज़े में करना चाहता था और बाद में उसने कहा, "मेरी आराधना कर। मेरी आराधना कर और मैं यह सब तुझे दे दूंगा।" यह शैतान का बदसूरत चेहरा है, वह पूर्णतया बेशर्म है, सही है न? शैतान "शर्म" शब्द का मतलब भी नहीं जानता, और यह उसकी बुराई का दूसरा सबूत है। वह यह भी नहीं जानता कि "शर्म" क्या होती है। शैतान निश्चय जानता है कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और वह उसे सम्भालता है और उस पर उसकी प्रभुता है। सब परमेश्वर का है, मनुष्य का नहीं और शैतान का तो बिल्कुल नहीं, फिर भी शैतान ने निर्लज्जतापूर्वक कहा कि वह सब कुछ परमेश्वर को दे देगा। क्या शैतान फिर से कुछ घृणास्पद और शर्मनाक नहीं कर रहा है? परमेश्वर अब शैतान से और भी अधिक नफरत करता है, सही? शैतान ने भले ही कुछ भी करने की कोशिश की, लेकिन क्या प्रभु यीशु उसके झांसे में आये? (नहीं।) प्रभु यीशु ने क्या कहा? (तू अपने प्रभु परमेश्वर ही की उपासना करना।) क्या इस वाक्यांश का कोई व्यवहारिक अर्थ है? (हां।) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? हम शैतान की बुराई और बेशर्मी को उसके वक्तव्य में देखते हैं। अतः यदि मनुष्य शैतान की उपासना करे, तो निष्कर्ष क्या होगा? क्या वे राज्य का धन ओर वैभव प्राप्त करेंगे? (नहीं।) वे क्या प्राप्त करेंगे? क्या मनुष्य शैतान के ही समान बेशर्म और हास्यपद बन जाएंगे? (हां।) तब वे शैतान से भिन्न नहीं होंगे। इसलिए प्रभु यीशु ने यह वाक्यांश कहा जो सब और प्रत्येक इंसान के लिए महत्वपूर्ण है, "तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर," जिसका अर्थ है कि प्रभु के अलावा, स्वयं परमेश्वर को छोड़, यदि आप दूसरे की उपासना करते हो, यदि आप शैतान जो इबलीस् है, उसकी उपासना करते हो, तब आप उसी गंदगी में लोटते हो जैसा शैतान है। जब आप शैतान की बेशर्मी और उसकी बुराई में भागीदार होते हो, तब आप शैतान के जैसे ही परमेश्वर की परीक्षा और हमला करने लगोगे। तब आपका अंत क्या होगा? आप परमेश्वर द्वारा घृणा किए जाने लगोगे, नीचे धकेल दिए जाओगे, और परमेश्वर द्वारा नाश किए जाओगे। क्या यह सही नहीं है? जब शैतान ने असफल होते हुए भी कई बार प्रभु यीशु को परखा, क्या उसने फिर प्रयास किया? शैतान ने फिर प्रयास नहीं किया और वह चला गया। ये क्या साबित करता है? यह शैतान के बुरे स्वभाव को सिद्ध करता है, उसकी दुर्भावना, उसका बेतुकापन, और निरर्थकता इस योग्य नहीं कि उसका वर्णन परमेश्वर से किया जाए क्योंकि प्रभु यीशु ने केवल तीन वाक्यों में शैतान को हरा दिया, उसके बाद शैतान अपने पैरों के बीच दुम दबा कर खिसक गया और उसने उसे फिर नहीं परखा। चूंकि प्रभु यीशु ने शैतान को इस परीक्षा में हरा दिया, तो अब वह आसानी से अपने उस काम को जारी रख सकता था, जो कार्य उसके सामने पड़ा था। जो कुछ प्रभु यीशु ने कहा और किया, क्या वह इस परिस्थिति में प्रत्येक के लिये व्यवहारिक अर्थ रखता है? (हां।) किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? क्या शैतान को हराना आसान काम है? (नहीं।) तब यह क्या होगा? लोगों को क्या शैतान के बुरे स्वभाव की समझ होनी चाहिए? क्या लोगों को शैतान के प्रलोभनों की सही समझ होनी चाहिए? (हां।) यदि आपने अपने जीवन में शैतान के प्रलोभनों का अनुभव किया है और आप शैतान के बुरे स्वभाव को देख सकते हैं, क्या आप उसे हराने के योग्य होंगे? यदि आप शैतान के बेतुकेपन और निरर्थकता को जानते, तो क्या फिर भी आप शैतान के साथ परमेश्वर पर हमला करने को खड़े होंगे? (नहीं, हम नहीं होंगे।) यदि आप समझ जाएं कि कैसे शैतान की दुर्भावना और बेशर्मी आपके द्वारा प्रगट हुई है—यदि आप स्पष्ट रूप से इस बात को पहचान जायें और जान जायें—तो क्या आप फिर भी परमेश्वर पर इस प्रकार हमला करेंगे और उसकी परीक्षा लेंगे? (नहीं, हम नहीं करेंगे।) आप क्या करोगे? (हम शैतान का सामना करेंगे और उसे छोड़ देंगे।) क्या यह आसान कार्य है? (नहीं।) यह सरल नहीं है, ऐसा करने के लिये, लोगों को निरंतर प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें स्वयं को परमेश्वर के सामने रखना चाहिए और उन्हें स्वयं को हमेशा जांचते रहना चाहिए। उन्हें अपने आप को परमेश्वर के अनुशासन, और उसके न्याय और दण्ड के अधीन समर्पित करना चाहिए और यही एक राह है जिससे वे अपने आपको शैतान के राज्य और नियंत्रण से धीरे-धीरे मुक्त कर पाएंगे।

हम उन बातों का निष्कर्ष निकाल सकते है जो उसके कहने से शैतान के तत्व का निर्माण करती है। सर्वप्रथम, शैतान के तत्व को सामान्य रूप से बुरा कहा जाता है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विरूद्ध खड़ा होता है। मैं शैतान के तत्व को बुरा क्यों कहता हूं? इसे देखने के लिए कि शैतान लोगों के साथ क्या करता है, उसके परिणाम को देखना होगा। शैतान लोगों को दूषित और नियंत्रित करता है और मनुष्य शैतान के दूषित स्वभाव के अधीन कार्य करता है, और ऐसी दुनिया और दूषित लोगों के बीच रहता है जो शैतान के द्वारा दूषित कर दिये गये हैं। बहुत सारे लोग शैतान द्वारा अनजाने में ग्रसित और सम्मिलित कर लिये गये हैं और इसलिए मनुष्य में शैतान का बुरा स्वभाव आ गया है। प्रत्येक बात जो शैतान ने कहीं और की है, उसमें हम उसके अंहकार को देखते हैं, हम उसके छल और उसकी दुर्भावना को देखते हैं। शैतान का अंहकार सर्वप्रथम कैसे दिखता है? क्या शैतान सदा से ईश्वर का स्थान लेना चाहता है? शैतान हमेशा से परमेश्वर के कार्य को बिगाड़ने, और परमेश्वर का स्थान लेने की चाह रखता आया है कि वह स्वयं के लिए इसे ले ले जिससे लोग उसके पीछे चलें, उसका साथ दें, और शैतान की उपासना करें; यह शैतान के अंहकार का स्वभाव है। परन्तु जब शैतान लोगों को बिगाडता है तब वह इस चालाकी और षडयंत्रकारी तरीके से कार्य करता है: जब शैतान लोगों में अपना कार्य करता है, तो वह सीधे तौर पर लोगों को नहीं बताता कि परमेश्वर को कैसे ठुकरायें और उसका विरोध करें। जब शैतान परमेश्वर की परीक्षा लेता है तब वह आकर यह नहीं कहता, "मैं तुझे परख रहा हूं, मैं तुझ पर हमला कर रहा हूं" तो शैतान कौन से तरीके का उपयोग करता है। (धोखेबाज़ी।) वह धोखा देता, हमला करता है, और जाल बिछाता है, और यहां तक कि पवित्रशास्त्र का उल्लेख भी करता है। शैतान कई तरीकों से बोलता और कार्य करता है ताकि अपना बुरा उद्देश्य पूरा कर सके, शैतान के ऐसा कर लेने के बाद हम क्या देखते हैं कि मनुष्यों पर क्या प्रभाव पड़ा है? क्या मनुष्य अंहकारी़ नहीं है? हजारों साल मनुष्य ने शैतान के भ्रष्टाचार से दुख उठाया है इसलिए मनुष्य हेकड़ीबाज़ और असाधारण रूप से दम्भी बन गया है, वह धूर्त, दुर्भावनाग्रस्त और अनुचित हो गया है, सही? ये सारी बातें शैतान के स्वभाव के कारण हुई हैं। चूंकि शैतान का स्वभाव बुरा है, इसने मनुष्य को बुरा स्वभाव और मनुष्य को दूषित स्वभाव दिया है। इसलिए मनुष्य दूषित शैतानी स्वभाव के अधीन जीता है और मनुष्य शैतान के समान परमेश्वर के विरोध में जाता है, परमेश्वर पर आक्रमण करता है और इस हद तक उसे परखता है कि मनुष्य परमेश्वर की उपासना नहीं करता और अपने हृदय में उसका भय नहीं रखता।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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