परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 134

सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के अवसर को मत खो

कुछ मुट्ठी भर दशक जो किसी मानव जीवन को बनाते हैं वे न तो लम्बे होते हैं और न ही छोटे। जन्म एवं व्यस्क होने के बीच के बीस-असाधारण वर्ष पलक झपकते ही गुज़र जाते हैं, और यद्यपि जीवन के इस मुकाम पर किसी व्यक्ति को व्यस्क माना जाता है, फिर भी इस आयु वर्ग के लोग मानव जीवन एवं मानव की नियति के बारे में लगभग कुछ भी नहीं जानते हैं। जैसेजैसे वे और भी अधिक अनुभव प्राप्त करते जाते हैं, वे आहिस्ता आहिस्ता लम्बे लम्बे डग भरते हुए मध्यम आयु की ओर बढ़ने लगते हैं। लोग अपने तीस एवं चालीस वर्ष की आयु में जीवन एवं नियति के विषय में आरम्भिक अनुभव ही अर्जित कर पाते हैं, परन्तु इनके बारे में उनके विचार अभी भी बिलकुल अस्पष्ट होते हैं। यह चालीस वर्ष की आयु तक तो नहीं होता है कि कुछ लोग मानवजाति एवं सृष्टिकर्ता को समझना आरम्भ करें, जिन्हें परमेश्वर के द्वारा सृजा गया था, कि वे आभास करें कि मानव जीवन सम्पूर्ण रीति से किस के विषय में है, और मानव की नियति सम्पूर्ण रीति से किस के विषय में है। कुछ लोग, हालाँकि वे काफी लम्बे समय से परमेश्वर के अनुयायी रहे हैं और अब वे मध्यम आयु के हैं, फिर भी वे अभी भी परमेश्वर की संप्रभुता का सटीक ज्ञान एवं परिभाषा धारण नहीं करते हैं, सच्चे समर्पण की तो बिलकुल भी नहीं। कुछ लोग आशीषों को पाने की खोज करने के आलावा किसी भी चीज़ के विषय में परवाह नहीं करते हैं, और हालाँकि उन्होंने अनेक वर्षों से जीवन बिताया है, फिर भी वे मानव की नियति के ऊपर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के उस तथ्य को बिलकुल भी जानते एवं समझते नहीं हैं, और इस प्रकार उन्होंने परमेश्वर के आयोजनों एवं इंतज़ामों के प्रति समर्पण की थोड़ी सी भी व्यावहारिक शिक्षा में प्रवेश नहीं किया है। ऐसे लोग पूरी तरह से मूर्ख हैं; ऐसे लोग अपने जीवन को व्यर्थ में ही जीते हैं।

यदि किसी मानव जीवन को उसके जीवन के अनुभवों की मात्रा और मानव की नियति के विषय में उसके ज्ञान के अनुसार विभाजित किया जाता, तो यह मोटे तौर पर तीन चरणों में विभक्त होगा। पहला चरण है युवावस्था, जन्म से लेकर मध्यम आयु के बीच के वर्ष, या जन्म से लेकर तीस वर्ष की आयु तक। दूसरा चरण है परिपक्व होने की प्रक्रिया, मध्यम आयु से लेकर वृद्धावस्था तक, या तीस से लेकर साठ वर्ष की आयु तक। तीसरा चरण है परिपक्व समय, वृद्धावस्था से, अर्थात् साठ वर्ष से शुरू होकर, जब तक वह इस संसार से चला नहीं जाता। दूसरे शब्दों में, जन्म से लेकर मध्यम आयु तक, नियति एवं भाग्य के विषय में अधिकतर लोगों का ज्ञान सीमित होता है जिससे वे दूसरों के विचारों को तोते से समान रटते हैं; इसमें लगभग कोई वास्तविक, एवं व्यावहारिक मूल-तत्व नहीं होता है। इस समयावधि के दौरान, जीवन के प्रति उसका नज़रिया और किस प्रकार वह इस संसार में अपना मार्ग बनाता है वे सभी बहुत ही सतही एवं सीधे-सादे होते हैं। यह उसके लड़कपन की समयावधि है। जब किसी व्यक्ति ने जीवन के सभी आनन्द एवं दुखोंका स्वाद चख लिया है, केवल उसके पश्चात् ही वह नियति की वास्तविक समझ को हासिल करता है, केवल उसके पश्चात् ही वह—अवचेतन रूप से, अपने हृदय की गहराई में—धीरेधीरे नियति की अपरिवर्तनीयता की प्रशंसा करने लगता है, और धीरे-धीरे एहसास करता है कि मानव की नियति पर सृष्टिकर्ता की संप्रभुता वाकई मौजूद है। यह किसी व्यक्ति के परिपक्व होने की समयावधि है। जब वह नियति के विरुद्ध संघर्ष करना समाप्त कर देता है, और जब वह आगे से लड़ाई-झगड़ों में पड़ने की इच्छा नहीं करता है, परन्तु अपने भागको जानता है, स्वर्ग की इच्छा के अधीन होता है, अपनी स्वयं की उपलब्धियों और जीवन में हुई ग़लतियों का सार निकलता है, और अपने जीवन में सृष्टिकर्ता के न्याय का इंतज़ार कर रहा है—यह उसकी परिपक्वता की समयावधि है। विभिन्न प्रकार के अनुभवों एवं उपलब्धियों पर विचार करने के बाद जिन्हें लोग इन तीन चरणों के दौरान अर्जित करते हैं, सामान्य परिस्थितियों के अधीन सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए उसके अवसर की खिड़की ज़्यादा बड़ी नहीं होती है। यदि कोई व्यक्ति साठ वर्ष की आयु तक जीवित रहता है, तो परमेश्वर की संप्रभुता को जानने ले लिए उसके पास केवल तीस वर्ष या इतना ही समय है; यदि वह और अधिक लम्बी समयावधि चाहता है, तो यह केवल तभी सम्भव है यदि उसका जीवन काफी लम्बाहै, यदि वह सौ वर्ष तक जीवित रहने के योग्य है। अतः मैं कहता हूँ, मानव अस्तित्व के सामान्य नियमों के अनुसार, हालाँकि यह एक बहुत ही लम्बी प्रक्रिया है जब कोई व्यक्ति पहले पहल सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के विषय का सामना करता है वहाँ से लेकर उस समय तक जब वह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के तथ्य को पहचानने के योग्य हो जाता है, और वहाँ से लेकर उस बिन्दु तक जब वह उसके अधीन होने के योग्य हो जाता है, यदि वह वास्तव में उन वर्षों को गिने, तो वे तीस या चालीस से अधिक नहीं होंगे जिनके दौरान उसके पास इन प्रतिफलों को हासिल करने का मौका होता है। और अकसर, कई बार लोग आशीषों को पाने के लिए अपनी इच्छाओं एवं महत्वाकांक्षाओं के द्वारा बहक जाते हैं; वे परख नहीं सकते हैं कि मानव जीवन का सार-तत्व कहाँ है, परमेश्वर की संप्रभुता को जानने के महत्व का आभास नहीं करते हैं, और इस प्रकार वे मानव जीवन का एवं सृष्टिकर्ता की संप्रभुता का अनुभव करने के लिए मानव संसार में प्रवेश करने हेतु इस मूल्यवान अवसर को अपने हृदय में संजोकर नहीं रख पाते हैं, और एहसास नहीं कर पाते हैं कि एक सृजे गए प्राणी के लिए सृष्टिकर्ता के व्यक्तिगत मार्गदर्शन को प्राप्त करना कितना बहुमूल्य है। अतः मैं कहता हूँ, ऐसे लोग जो चाहते हैं कि परमेश्वर का कार्य जल्दी से समाप्त हो जाए, जो इच्छा करते हैं कि जितना जल्दी हो सके परमेश्वर मनुष्य के अंत का इंतज़ाम करे, ताकि वे तुरन्त ही उसके वास्तविक व्यक्तित्व को देख सकें और जल्दी से आशीषित हो जाएं, वे इस प्रकार की बदतरीन अनाज्ञाकारिता एवं अत्याधिक मूर्खता के दोषी हैं। और ऐसे लोग जो अपने सीमित समय के दौरान सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को जानने के लिए इस अनोखे अवसर को समझने की इच्छा करते हैं, वे ही बुद्धिमान लोग हैं, और वे ही प्रतिभाशाली लोग हैं। ये दोअलग-अलग इच्छाएंदो बेहद ही अलग नज़रिए एवं उद्यमों (अनुसरण) का खुलासा करते हैं: ऐसे लोग जो आशीषों की खोज करते हैं वे स्वार्थी एवं नीच हैं; वे परमेश्वर की इच्छा के प्रति कोई विचार नहीं करते हैं, परमेश्वर की संप्रभुता की कभी खोज नहीं करते हैं, उसके प्रति समर्पित होने की कभी इच्छा नहीं करते हैं, और जैसा उनको अच्छा लगता है बस वैसे ही जीवन बिताते हैं। वे बेपरवाही से काम करनेवाले चरित्रहीन लोग हैं; वे ऐसे लोग हैं जिन्हें नष्ट किया जाना चाहिए। ऐसे लोग जो परमेश्वर को जानने का प्रयास करते हैं वे अपनी इच्छाओं को दरकिनार करने के योग्य हैं, वे परमेश्वर की संप्रभुता एवं परमेश्वर के इंतज़ामों के अधीन होने के लिए तैयार हैं; वे इस प्रकार के लोग होने की कोशिश करते हैं जो परमेश्वर के अधिकार के अधीन हैं और परमेश्वर की इच्छा को संतुष्ट करते हैं। ऐेसे लोग ज्योति में रहते हैं, परमेश्वर की आशीषों के बीच में रहते हैं; निश्चित तौर पर परमेश्वर के द्वारा उनकी प्रशंसा की जाएगी। चाहे कुछ भी हो जाए, मानव का चुनाव व्यर्थ है, मनुष्य यह नहीं कह सकता है कि परमेश्वर का कार्य कितना समय लेगा। लोगों के लिए यह अच्छा है कि वे अपने आपको परमेश्वर की दया पर छोड़ दें, और उसकी संप्रभुता के अधीन हो जाएं। यदि तू अपने आपको उसकी दया पर नहीं छोड़ता है, तो तू क्या कर सकता है? क्या परमेश्वर को नुकसान उठाना पड़ेगा? यदि तुम अपने आपको उसकी दया पर नहीं छोड़ते हो, यदि तुम उत्तरदायित्व लेने की कोशिश करते हो, तो तुम एक मूर्खतापूर्ण चुनाव कर रहे हो, और केवल तुम ही हो जो अंत में नुकसान उठाओगे। यदि लोग जितना जल्दी हो सके परमेश्वर के साथ सहयोग करेंगे, यदि वे उसके आयोजनों को स्वीकार करने के लिए, एवं उसके अधिकार को जानने के लिए शीघ्रता करेंगे, और वह सब जो उसने उनके लिए किया है उन्हें पहचानेंगे, केवल तभी उनके पास आशा होगी, केवल तभी वे अपने जीवन को व्यर्थ में नहीं बिताएंगे, केवल तभी वे उद्धार को हासिल करेंगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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