परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III" | अंश 120

दीर्घ-और सूक्ष्म-दृष्टिकोण से परमेश्वर के अधिकार को समझना

परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। यह स्वयं परमेश्वर की पहचान की विलक्षण अभिव्यक्ति तथा विशिष्ट सार है। कोई सृजा गया या न सृजा गया प्राणी ऐसे विलक्षण अभिव्यक्ति और ऐसे सार को धारण नहीं करता है; केवल सृष्टिकर्ता ही इस प्रकार के अधिकार को धारण करता है। अर्थात, केवल सृष्टिकर्ता—अद्वितीय परमेश्वर—को ही इस तरह से अभिव्यक्त किया गया है और उसके पास ही यह सार है। परमेश्वर के अधिकार के बारे में बात क्यों करें? स्वयं परमेश्वर का अधिकार मनुष्य के मस्तिष्क में अधिकार से किस प्रकार भिन्न है? इसके बारे में विशेष क्या है? यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण क्यों है कि इसके विषय में यहाँ बात करें? तुम सब में से प्रत्येक को सावधानीपूर्वक इस मुद्दे पर ध्यान देना होगा? क्योंकि अधिकांश लोगों के लिए, "परमेश्वर का अधिकार" एक अस्पष्ट विचार है, एक ऐसा विचार है जिसे किसी के दिमाग में बैठाना बहुत ही कठिन है, और इसके बारे में कोई बात करना धुंध के समान हो सकता है। अतः परमेश्वर के अधिकार के ज्ञान और परमेश्वर के अधिकार के सार के मध्य लगभग हमेशा ही एक अन्तर होगा जिसे धारण करने में मनुष्य समर्थ है। इस अन्तर को भरने के लिए, किसी व्यक्ति को वास्तविक-जीवन के लोगों, घटनाओं, चीज़ों, या उन प्राकृतिक एवं सामाजिक घटनाओं की सहायता से धीरे धीरे परमेश्वर के अधिकार को जानना होगा जो मनुष्य की पहुँच के भीतर है, और जिसे समझने में मनुष्य समर्थ है। यद्यपि यह वाक्यांश "परमेश्वर का अधिकार" अथाह प्रतीत हो सकता है, फिर भी परमेश्वर का अधिकार बिलकुल भी काल्पनिक नहीं है। वह मनुष्य के जीवन के प्रत्येक क्षण में उसके साथ है, और प्रतिदिन उसका मार्गदर्शन करता है। अतः, हर मनुष्य के दैनिक जीवन में वह आवश्यक रूप से परमेश्वर के अधिकार के अत्यंत स्पर्शगम्य पहलू को देखेगा और अनुभव करेगा। यह स्पर्शगम्यता पर्याप्त प्रमाण है कि परमेश्वर का अधिकार असलियत में मौज़ूद है, और यह किसी व्यक्ति को इस तथ्य को पहचानने और समझने की अनुमति देता है कि परमेश्वर ने इस अधिकार को धारण किया है।

परमेश्वर ने सब कुछ की सृष्टी की, और इसकी सृष्टि करने के बाद, उसकी सभी चीज़ों के ऊपर प्रभुता है। सभी चीज़ों के ऊपर प्रभुता रखने के अतिरिक्त, वह हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है। यह विचार कि "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" इसका अर्थ क्या है? इसकी व्याख्या कैसे की जा सकती है? यह वास्तविक जीवन में किस प्रकार लागू होता है? इस सत्य को समझने के द्वारा कि "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" तुम लोग परमेश्वर के अधिकार को कैसे जान सकते हो? "परमेश्वर हर एक चीज़ को नियन्त्रण में रखता है" इस वाक्यांश से हमें देखना चाहिए कि जो कुछ परमेश्वर नियन्त्रित करता है वह ग्रहों का एक भाग, और सृष्टि का एक भाग नहीं है, मानवजाति का एक भाग तो बिलकुल भी नहीं है, परन्तु हर एक चीज़ है: अति विशाल से लेकर अति सूक्ष्म तक, दृश्य से लेकर अदृश्य तक, विश्व के सितारों से लेकर पृथ्वी के जीवित प्राणियों तक, साथ ही साथ अति सूक्ष्मजीव जिन्हें नंगी आँखों से देखा नहीं जा सकता है या ऐसे प्राणी जो अन्य रूपों में मौज़ूद हैं। यह "हर एक चीज़" की सही परिभाषा है जिसे परमेश्वर "नियन्त्रण में रखता है," और यह वह दायरा है जिसके ऊपर परमेश्वर अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, और यह उसकी संप्रभुता और उसके शासन का विस्तार है।

मानवता के अस्तित्व में आने से पहले, विश्व—सभी ग्रह, आकाश के सभी सितारे—पहले से ही अस्तित्व में थे। दीर्घ स्तर पर, ये खगोलीय पिंड परमेश्वर के नियन्त्रण के अधीन नियमित रूप से अपनी कक्षा में परिक्रमा करते रहे हैं, अपने सम्पूर्ण अस्तित्व के दौरान चाहे इसे जितने भी वर्ष हो गए हों। कौन सा ग्रह कौन से निश्चित समय में कहाँ जाता है; कौन सा ग्रह कौन सा कार्य करता है, और कब करता है; कौन सा ग्रह कौन सी कक्षा में चक्कर लगाता है, और वह कब अदृश्य हो जाता है या कब उसका स्थान बदल दिया जाता है—ये सभी चीज़ें थोड़ी सी भी ग़लती के बगैर आगे बढ़ती रहती हैं। ग्रहों की स्थिति और उनके बीच की दूरियां सभी सख्त नमूनों का अनुसरण करती हैं, उन में से सभी का वर्णन सटीक आंकड़ों के द्वारा किया जा सकता है; वे पथ जिस पर वे परिभ्रमण करते हैं, उनकी कक्षाओं की गति एवं नमूने, वे समय जब वे विभिन्न स्थितियों में होते हैं उन्हें विशेष नियमों के द्वारा परिमाणित किया जा सकता है और उनकी व्याख्या की जा सकती है। युगों से ग्रहों ने इन नियमों का पालन किया है, और ज़रा सा भी विचलन नहीं किया है। कोई भी शक्ति उनकी कक्षाओं या नमूनों को बदल नहीं सकती है या उनको बाधित नहीं कर सकती है जिनका वे अनुसरण करते हैं। क्योंकि वे विशेष नियम जो उनकी गति को नियन्त्रित करते हैं और वह सटीक आंकड़ा जो उनका वर्णन करता है उन्हें सृष्टिकर्ता के अधिकार के द्वारा पूर्वनिर्धारित किया गया है, वे स्वयं ही सृष्टिकर्ता की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन इन नियमों का पालन करते हैं। दीर्घ स्तर पर, कुछ नमूनों, कुछ आंकड़ों, साथ ही साथ कुछ अजीब और अवर्णनीय नियमों या घटनाओं का पता लगाना मनुष्य के लिए कठिन नहीं है। हालाँकि मानवता यह नहीं मानती है कि परमेश्वर अस्तित्व में है, इस सत्य को स्वीकार नहीं करती है कि सृष्टिकर्ता ने हर एक चीज़ को बनाया है और हर एक चीज़ पर प्रभुता करता है, और इसके अतिरिक्त सृष्टिकर्ता के अधिकार के अस्तित्व को नहीं पहचानती है, फिर भी मानव वैज्ञानिक, खगोलशास्त्री, और भौतिक विज्ञानी और भी अधिक खोज कर रहे हैं कि इस विश्व में सभी चीज़ों का अस्तित्व, और वे सिद्धान्त और नमूने जो उनकी गतिविधियों का आदेश देते हैं, उन सभी पर एक विशाल और अदृश्य अंधकारमय ऊर्जा के द्वारा शासन और नियंत्रित किया जाता है। यह सत्य मनुष्य को बाध्य करता है कि वह इस बात का सामना करे और स्वीकार करे कि इन गतिविधियों के नमूनों के मध्य एक सामर्थी परमेश्वर है, जो हर एक चीज़ का आयोजन करता है। उसका सामर्थ्य असाधारण है, और हालाँकि कोई उसके असली चेहरे को नहीं देख सकता है, फिर भी वह प्रत्येक क्षण हर एक चीज़ पर शासन और नियन्त्रण करता है। कोई भी व्यक्ति या ताकत उसकी संप्रभुता से परे नहीं जा सकती है। इस सत्य का सामना करते हुए, मनुष्य को यह पहचानना चाहिए कि वे नियम जो सभी चीज़ों के अस्तित्व पर शासन करते हैं उन्हें मनुष्यों के द्वारा नियन्त्रित नहीं किया जा सकता है, किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; और उसी समय मनुष्य को मानना चाहिए कि मानव इन नियमों को पूरी तरह से समझ नहीं सकते हैं। और वे प्राकृतिक रूप से घटित नहीं होते हैं, बल्कि एक प्रभु और मालिक के द्वारा नियन्त्रित किए जाते हैं। ये सब परमेश्वर के अधिकारों की अभिव्यक्तियां हैं जिनका एहसास मानवजाति दीर्घ स्तर पर कर सकती है।

सूक्ष्म स्तर पर, सभी पहाड़ियाँ, नदियाँ, झीलें, समुद्र और भू-भाग जिन्हें मनुष्य पृथ्वी पर देखता है, सभी मौसम जिन्हें वह अनुभव करता है, सभी चीज़ें जो पृथ्वी पर पाई जाती हैं, जिनमें पेड़-पौधे, जानवर, सूक्ष्मजीव और मनुष्य शामिल हैं, ये सभी परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन हैं, और उन्हें परमेश्वर के द्वारा नियन्त्रित किया जाता है। परमेश्वर की संप्रभुता और नियन्त्रण के अधीन, सभी चीज़ें उसके विचारों की अनुरूपता में अस्तित्व में आती हैं या अदृश्य हो जाती हैं, उन सब के जीवन पर कुछ नियमों के द्वारा शासन किया जाता है, और वे उनके साथ बने रहते हुए बढ़ते हैं और बहुगुणित होते हैं। कोई भी मनुष्य या चीज इन नियमों के ऊपर नहीं है। ऐसा क्यों है? इसका एकमात्र उत्तर है, परमेश्वर के अधिकार के कारण। या, दूसरे रूप में कहें, तो परमेश्वर के विचार और परमेश्वर के वचनों के कारण; क्योंकि स्वयं परमेश्वर यह सब करता है। अर्थात, यह परमेश्वर का अधिकार और परमेश्वर का मन है जो इन नियमों को उत्पन्न करता है; ये उसके विचार के अनुसार स्थानांतरित होंगे एवं बदलेंगे, और ये सभी स्थानांतरण एवं बदलाव उसकी योजना के लिए घटित होंगे एवं लोप होंगे। उदाहरण के लिए, महामारियों को ही लीजिए। वे बिना चेतावनी दिए अचानक प्रकट हो जाते हैं, कोई भी उनके उद्भव को या सही कारणों को नहीं जानता है कि वे क्यों होते हैं, और जब कभी एक महामारी एक निश्चित स्थान पर आती है, तो ऐसे लोग जो अभागे हैं वे विपत्ति से बच नहीं सकते हैं। मानव विज्ञान समझता है कि महामारियां ख़तरनाक या हानिकारक सूक्ष्म रोगाणुओं के फैलने के द्वारा होती हैं, और उनकी गति, दायरे, और संक्रमण के तरीके का पूर्वानुमान या नियन्त्रण मानव विज्ञान के द्वारा नहीं किया जा सकता है। यद्यपि मानवता हर सम्भव तरीके से उनका प्रतिरोध करती है, फिर भी जब महामारियां अचानक प्रकट हो जाती हैं तो वे ऐसे लोगों और पशुओं को नियन्त्रित नहीं कर सकते हैं जो अपरिहार्य रूप से प्रभावित हो जाते हैं। एकमात्र कार्य जिसे मानव प्राणी कर सकते हैं वह है उन्हें दूर करने का प्रयास करना, उनका सामना करना, और उन पर शोध करना। परन्तु कोई भी उनका मूल कारण नहीं जानता है जो किसी विशिष्ट महामारी के प्रारम्भ और अंत का वर्णन कर सके, और कोई उन्हें नियन्त्रित नहीं कर सकता है। एक महामारी के उदय और फैलाव का सामना करते समय, पहला उपाय जो मनुष्य करते हैं वह है एक टीके को विकसित करना, परन्तु कई बार टीके के तैयार होने से पहले ही वह महामारी अपने आप ही खत्म हो जाती है। महामारियां क्यों समाप्त हो जाती हैं? कुछ लोग कहते हैं कि कीटाणुओं को नियन्त्रण में लाया जा चुका है, अन्य लोग कहते हैं कि ऋतुओं में बदलावों के कारण वे समाप्त हो जाती हैं। जहाँ तक यह बात है कि इन निरर्थक कल्पनाओं पर विश्वास करें या नहीं, विज्ञान कोई स्पष्टीकरण प्रस्तुत नहीं कर सकता है, और कोई सटीक उत्तर नहीं दे सकता है। जिसका मानवता सामना करती है वह न केवल ये कल्पनाएँ हैं बल्कि महामारियों के विषय में मानवजाति की समझ और भय की कमी है। अंतिम विश्लेषणों में कोई नहीं जानता है, कि ये महामारियां क्यों शुरू होती हैं या वे क्यों समाप्त होती हैं। क्योंकि मानवता का विश्वास केवल विज्ञान में ही है, वह पूरी तरह से इस पर ही आश्रित है, परन्तु सृष्टिकर्ता के अधिकार को नहीं पहचानता है या उसकी संप्रभुता को स्वीकार नहीं करता है, उनके पास कभी कोई उत्तर नहीं होगा।

परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन, उस के अधिकार के कारण, और उसके प्रबन्ध के कारण सभी चीज़ें अस्तित्व में आती हैं और नाश हो जाती हैं। कुछ चीज़ें चुपके से आती हैं और चली जाती हैं, और मनुष्य नहीं बता सकता है कि वे कहां से आई थीं या उन नियमों का आभास नहीं कर सकता है जिनका वे अनुसरण करती हैं, और वह उन कारणों को तो बिलकुल भी नहीं समझ सकता है कि वे क्यों आती हैं और जाती हैं। यद्यपि मनुष्य वह सब कुछ देख, सुन, या अनुभव कर सकता है जो सभी हालातों के बीच घटित होती हैं; यद्यपि ये सब मनुष्य से सम्बन्धित हैं, और यद्यपि मनुष्य अवचेतन रूप से असाधारणता, नियमितता, या विभिन्न घटनाओं के अनोखेपन का आभास करता है, तब भी वह सृष्टिकर्ता की इच्छा और उसके मन के विषय में कुछ भी नहीं जानता है जो उनके पीछे होती हैं। उनके पीछे अनेक कहानियाँ हैं, और अनेक छिपी हुई सच्चाईयाँ हैं। क्योंकि मनुष्य सृष्टिकर्ता से दूर भटक गया है, क्योंकि वह इस तथ्य को नहीं स्वीकारता है कि सृष्टिकर्ता का अधिकार सभी चीज़ों पर शासन करता है, इसलिए वह हर एक चीज़ को कभी नहीं जानेगा और समझेगा जो उसकी संप्रभुता के अधीन है। क्योंकि अधिकांश भागों में, परमेश्वर का नियन्त्रण और संप्रभुता मानवीय कल्पना, मानवीय ज्ञान, मानवीय समझ, और जो कुछ मानव विज्ञान हासिल कर सकता है उसकी सीमाओं को पार कर देता है, सृजी गई मानवता की योग्यताएं इससे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकती हैं। कुछ लोग कहते हैं, "जबकि तुमने स्वयं ही परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं देखा है, तो तुम कैसे विश्वास कर सकते हो कि हर एक चीज़ उसके अधिकार के अधीन है?" देखना ही हमेशा विश्वास करना नहीं है; देखना ही हमेशा पहचानना या समझना नहीं है। अतः "विश्वास" कहाँ से आता है? मैं यकीन के साथ कह सकता हूँ, "विश्वास चीज़ों की वास्तविकता और मूल कारणों के प्रति लोगों की समझ, और अनुभव की मात्रा और गहराई से आता है।" यदि तुम विश्वास करते हो कि परमेश्वर अस्तित्व में है, परन्तु तुम पहचान नहीं सकते हो, और सभी चीज़ों के ऊपर परमेश्वर के नियन्त्रण और परमेश्वर की संप्रभुता का तो बिलकुल भी एहसास नहीं करते हो, तो तुम अपने हृदय में यह कभी स्वीकार नहीं करोगे कि परमेश्वर के पास ऐसा अधिकार है और यह कि परमेश्वर का अधिकार अद्वितीय है। तुम कभी सृष्टिकर्ता को अपना प्रभु, अपना परमेश्वर स्वीकार नहीं करोगे।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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