परमेश्वर के दैनिक वचन | "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II" | अंश 112

यहोवा परमेश्वर की चेतावनी नीनवे के लोगों तक पहुंचती है

आइए हम दूसरे अंश की ओर आगे बढ़ें, योना की पुस्तक का तीसरा अध्यायः "योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की, और यह प्रचार करता गया, 'अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।'" ये वे वचन हैं जिन्हें परमेश्वर ने नीनवे के लोगों को बताने के लिए सीधे योना को दिया था। वे स्वाभाविक रूप से वे वचन हैं जिन्हें यहोवा नीनवे के लोगों से कहना चाहता था। ये वचन हमें बताते हैं कि परमेश्वर ने नगर के लोगों से घृणा और नफरत करना शुरू कर दिया था क्योंकि उनकी दुष्टता परमेश्वर की नज़रों में आ गई थी, और इस प्रकार वह इस नगर का नाश करना चाहता था। फिर भी, इससे पहले कि परमेश्वर नगर को नष्ट करता, वह नीनवे के नागरिकों के लिए एक घोषणा करेगा, और इसके साथ-साथ वह उन्हें उनकी दुष्टता के लिए पश्चताप करने और नए सिरे से शुरुआत करने का एक अवसर देगा। यह अवसर चालीस दिन तक रहेगा। दूसरे शब्दों में, यदि नगर के भीतर के लोग चालीस दिनों के भीतर यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चाताप न करें, अपने पापों को न मानें या दंडवत न करें, तो परमेश्वर नगर को नष्ट करेगा जैसा उसने सदोम को नष्ट किया था। यह वह बात थी जिसे यहोवा परमेश्वर नीनवे के लोगों को बताना चाहता था। स्पष्ट रूप से, यह कोई सामान्य घोषणा नहीं थी। इसने न केवल यहोवा परमेश्वर के क्रोध को सूचित किया, बल्कि इसने नीनवे के लोगों के प्रति उसकी मनोवृत्ति को भी सूचित किया था; उसी समय इस सामान्य घोषणा ने नगर के भीतर रहनेवाले लोगों के लिए एक गम्भीर चेतावनी के रूप में भी काम किया था। इस चेतावनी ने उन्हें बताया था कि उनके बुरे कार्य से उन्होंने यहोवा परमेश्वर की नफरत को अर्जित किया था, और इसने उन्हें बताया था कि उनके बुरे कार्य शीघ्र ही उन्हें उनके सम्पूर्ण विनाश के कगार पर पहुंचा देंगे; इसलिए, नीनवे में हर एक का जीवन विनाश के अति निकट था।

यहोवा परमेश्वर की चेतावनी के प्रति नीनवे और सदोम की प्रतिक्रिया में सरासर अन्तर

उलट दिए जाने का क्या अर्थ है? बोलचाल की भाषा में, इसका अर्थ है लोप हो जाना। परन्तु किस प्रकार से? कौन एक नगर को पूर्ण रूप से उलट सकता है? किसी मनुष्य के लिए ऐसा काम करना असम्भव है, हाँ वास्तव में। ये लोग कोई मूर्ख नहीं थे; ज्यों ही उन्होंने इस घोषणा को सुना, त्यों ही उन्होंने उस उपाय को ग्रहण कर लिया। वे जानते थे कि यह परमेश्वर की ओर से आया था; वे जानते थे कि परमेश्वर अपना कार्य करने जा रहा था; वे जानते थे कि उनकी दुष्टता ने यहोवा परमेश्वर को क्रोधित किया और उसके क्रोध को नीचे अपने ऊपर उतारा था; जिससे वे शीघ्र ही अपने नगर के साथ नाश हो जाते। यहोवा परमेश्वर की चेतावनी को सुनने के पश्चात् नगर के लोगों ने किस प्रकार बर्ताव किया था? बाईबिल विशिष्ट विवरण के अंतर्गत वर्णन करती है कि इन लोगों ने, राजा से लेकर एक आम आदमी तक, कैसी प्रतिक्रिया की थी। जैसा पवित्र शास्त्र में लिखा हुआ है: "तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्‍वर के वचन की प्रतीति की; और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुँचा; और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवाया: 'क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें, और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें। ...'"

यहोवा परमेश्वर की घोषणा को सुनने के पश्चात्, नीनवे के लोगों ने एक ऐसी मनोवृत्ति का प्रदर्शन किया जो सदोम के लोगों से पूरी तरह विपरीत था—सदोम के लोगों ने खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध किया, और बुरे से बुरा करते चले गए, परन्तु इन वचन को सुनने के पश्चात्, नीनवे के लोगों ने इस विषय को नज़रअंदाज़ नहीं किया, न ही उन्होंने प्रतिरोध किया; उसके बजाए उन्होंने परमेश्वर पर विश्वास किया और उपवास की घोषणा की। "विश्वास किया" क्या संकेत करता है? यह शब्द स्वतः ही विश्वास और समर्पण का सुझाव देता है। यदि हम इस शब्द का वर्णन करने के लिए नीनवे के नागरिकों के वास्तविक व्यवहार का उपयोग करते हैं, तो इसका अर्थ यह है कि उन्होंने विश्वास किया कि परमेश्वर ने जैसा कहा था वैसा वह कर सकता है और करेगा, और यह कि वे पश्चाताप करने के लिए तैयार थे। क्या नीनवे के लोग सन्निकट विनाश के सामने भय महसूस करते थे? यह उनका विश्वास था जिसने उनके हृदयों में भय डाला था। ठीक है, तो नीनवे के लोगों के विश्वास और भय को प्रमाणित करने के लिए हम क्या उपयोग कर सकते है? यह ऐसा है जैसा बाईबिल कहती हैः "और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभों ने टाट ओढ़ा।" कहने का तात्पर्य है कि नीनवे के लोगों ने सचमुच में विश्वास किया था, और यह कि इस विश्वास से भय उत्पन्न हुआ, जिसने उसके बाद उपवास करने और टाट ओढ़ने के लिए प्रेरित किया था। इस प्रकार से उन्होंने अपने पश्चाताप की शुरूआत को दिखाया था। सदोम के लोगों के बिलकुल विपरीत, नीनवे के लोगों ने न केवल परमेश्वर का विरोध नहीं किया, बल्कि उन्होंने अपने व्यवहार और कार्यों के जरिए स्पष्ट रुप से अपने पश्चाताप को दिखाया भी था। हाँ वास्तव में, यह केवल नीनवे के आम लोगों पर ही लागू नहीं होता था; उनका राजा कोई अपवाद नहीं था।

नीनवे के राजा का पश्चाताप यहोवा परमेश्वर की प्रशंसा पाता है

जब नीनवे के राजा ने यह सन्देश सुना, वह अपने सिंहासन से उठा खड़ा हुआ, अपने वस्त्र उतार डाले, टाट पहन लिया और राख में बैठ गया। तब उसने घोषणा की कि नगर में किसी को भी कुछ भी चखने की अनुमति नहीं दी जाएगी, और यह कि कोई मवेशी, भेड़-बकरी, और बैल घास नहीं चरेगा और पानी नहीं पिएगा। मनुष्य और पशु दोनों को एक समान टाट ओढ़ना था; लोग बड़ी लगन से परमेश्वर से विनती करेंगे। साथ ही राजा ने भी घोषणा की कि उनमें से हर एक अपने बुरे मार्गों से फिरे और अपने उपद्रव के कार्यों को छोड़ दे। पश्चाताप के कार्यों की इस श्रृंखला से आंकते हुए, नीनवे के राजा ने अपने हृदय से पश्चाताप का प्रदर्शन किया। कार्य की वह श्रृंखला जिसे उसने अंजाम दिया—अपने सिंहासन से उठा, अपने राजकीय वस्त्र को उतारा, टाट ओढ़ा और राख में बैठ गया—यह लोगों को बताती है कि नीनवे के राजा ने अपने शाही रुतबे को अलग रख दिया था और आम लोगों के साथ टाट ओढ़ लिया था। कहने का तात्पर्य है कि नीनवे के राजा ने यहोवा परमेश्वर से घोषणा को सुनने के पश्चात् अपने बुरे मार्ग या अपने उपद्रव के कार्यों को जारी रखने के लिए अपने शाही पद पर कब्ज़ा नहीं किया; उसके बजाए, उसने उस अधिकार को अलग रख दिया जो उसके पास था और यहोवा परमेश्वर के सामने पश्चाताप किया। इस समय नीनवे का राजा एक राजा के समान पश्चाताप नहीं कर रहा था; वह परमेश्वर की एक सामान्य प्रजा के रूप में अपने पापों का अंगीकार करने और पश्चाताप करने के लिए परमेश्वर के सामने आया था। उसके अलावा, उसने पूरे शहर से भी कहा कि वे उसके समान यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पापों का अंगीकार करें और पश्चाताप करें; इसके अतिरिक्त, उसके पास एक विशिष्ट योजना थी कि ऐसा कैसे करना है, जैसा पवित्र शास्त्र में देखा जाता है: "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाए; वे न खाएँ और न पानी पीएँ। ...और वे परमेश्‍वर की दोहाई चिल्‍ला-चिल्‍ला कर दें; और अपने कुमार्ग से फिरें; और उस उपद्रव से, जो वे करते हैं, पश्‍चाताप करें।" जबकि नगर का शासक, नीनवे का राजा उच्चतम पद और सामर्थ धारण करता था और जो वह चाहता था कर सकता था। जब उसने यहोवा परमेश्वर की घोषणा का सामना किया, तो वह उस मामले को नज़रअंदाज़ कर सकता था या बस यों ही अकेले अपने पापों का पश्चाताप और अंगीकार कर सकता था; जहाँ तक यह बात है कि उस शहर के लोगों ने पश्चाताप करने का चयन किया था या नहीं, वह उस मामले की पूर्ण रूप से उपेक्षा कर सकता था। फिर भी, नीनवे के राजा ने ऐसा कतई नहीं किया। वह न केवल अपने सिंहासन पर से उठा, बल्कि टाट एवं राख को ओढ़ा और यहोवा परमेश्वर के सामने अपने पापों का अंगीकार और पश्चाताप किया, उसने अपने नगर के भीतर के सभी लोगों और पशुओं को भी ऐसा करने हेतु आदेश दिया। यहाँ तक कि उसने लोगों को आदेश दिया कि "परमेश्वर की दोहाई चिल्ला चिल्लाकर दो।" कार्यों की इस श्रृंखला के जरिए, नीनवे के राजा ने सचमुच में उसे पूरा किया जिसे एक शासक को पूरा करना चाहिए; उसके कार्य की श्रृंखला एक ऐसी चीज़ है जिसे हासिल करना मानव इतिहास में किसी भी राजा के लिए कठिन था, और साथ ही यह एक ऐसी चीज़ भी है जिसे किसी ने भी हासिल नहीं किया था। इन कार्यों को मानव इतिहास में अभूतपूर्व उद्यम कहा जा सकता है; वे इस योग्य हैं कि मानवजाति के द्वारा उनका उत्सव मनाया और अनुसरण किया जाए। मनुष्य के अरुणोदय के समय से ही, प्रत्येक राजा ने परमेश्वर का प्रतिरोध और विरोध करने में अपनी प्रजा की अगुवाई की थी। किसी ने भी अपनी दुष्टता के निमित्त छुटकारे की खोज करने के लिए, यहोवा परमेश्वर की क्षमा को प्राप्त करने के लिए और सन्निकट दण्ड से बचने के लिए परमेश्वर से विनती करने हेतु अपनी प्रजा की अगुवाई नहीं की थी। फिर भी, नीनवे का राजा अपनी प्रजा को परमेश्वर की ओर ले जाने में, अपने अपने बुरे मार्गों को छोड़ने में और उपद्रव के कार्यों को रोकने में समर्थ था। इससे बढ़कर, वह अपने सिंहासन को छोड़ने के लिए भी समर्थ था, और इसके बदले, यहोवा परमेश्वर फिर गया और उसने अपना मन बदल लिया और उसने अपना क्रोध त्याग दिया, और उस नगर के लोगों को जीवित रहने की अनुमति दी और उन्हें सर्वनाश से बचा लिया। इस राजा के कार्यों को मानव इतिहास में केवल एक दुर्लभ आश्चर्य कर्म ही कहा जा सकता है; यहाँ तक कि उन्हें भ्रष्ट मानवता का आदर्श भी कहा जा सकता है जो परमेश्वर के सम्मुख अपने पापों का अंगीकार और पश्चाताप करती है।

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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