परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III" | अंश 76

जब तुम परमेश्वर के विचारों और मानवजाति के प्रति उसकी प्रवृत्तियों की सचमुच में प्रशंसा करते हो, और जब तुम सचमुच में प्रत्येक जीवधारी के प्रति परमेश्वर की भावनाओं और चिंता को समझ सकते हो, तो तुम उसके द्वारा सृजे गए मनुष्यों में से प्रत्येक के ऊपर खर्च किए जा रहे लगन और प्रेम को समझने में भी सक्षम हो सकते हैं। जब ऐसा होता है, तुम दो शब्दों को देखोगे जो परमेश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं—और वे दो शब्द क्या हैं? कुछ लोग कहते हैं "निःस्वार्थ," और कुछ लोग कहते हैं "मानव प्रेम।" इन दोनों में "मानव प्रेम" वह शब्द है जो परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने के लिए सबसे कम उपयुक्त है। यह एक शब्द है जिसे लोग एक व्यक्ति के व्यापक—मस्तिष्क के विचारों और भावनाओं की व्याख्या करने के लिए प्रयोग करते हैं। मैं सचमुच में इस शब्द से घृणा करता हूँ, क्योंकि यह बिना समझे बूझे, अव्यवस्थित रूप से, और सिद्धांतों की परवाह किए बगैर उदारता प्रदान करने की ओर संकेत करता है। यह मूर्ख और भ्रमित लोगों का अत्याधिक भावनात्मक प्रकटीकरण है। जब इस शब्द का प्रयोग परमेश्वर के प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए किया जाता है, तो वहाँ पर ईश्वर की निदा करने का एक इरादा अवश्य होता है। मेरे पास दो शब्द हैं जो और अच्छे से परमेश्वर के प्रेम को दर्शाते हैं—वे दो शब्द क्या हैं? पहला है "बहुत ज़्यादा" क्या यह शब्द पूर्णत: बुलाहट से भरा हुआ नहीं है? दूसरा है "अति विशाल।" इन दोनों शब्दों के पीछे वास्तविक अर्थ है जिन्हें मैंने परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए प्रयोग किया है। शब्दशः लेते हुए, "बहुत ज़्यादा" किसी चीज़ के घनफल और क्षमता की व्याख्या करता है, पर इससे फर्क नहीं पड़ता है कि वह चीज़ कितना बड़ा है—यह कुछ ऐसा है जिसे लोग छू और देख सकते हैं। यह इसलिए है क्योंकि वह अस्तित्व में है, वह एक अदृश्य पदार्थ नहीं है, और यह लोगों को आभास देता है कि यह अपेक्षाकृत यथार्थ और व्यावहारिक है। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम इसे एक समतल या त्रिआयामी कोण से देख रहे हो; तुम्हें इसकी मौजूदगी की कल्पना करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह एक ऐसी चीज़ है जो वास्तव में अस्तित्व में है। यद्यपि "बहुत ज़्यादा" शब्द का प्रयोग करते हुए परमेश्वर के प्रेम की व्याख्या करने से ऐसा महसूस होता है कि उसके प्रेम को तौला जा रहा है, फिर भी, यह हमें यह एहसास भी देता है कि उसके प्रेम को तौला नहीं जा सकता है। मैं कहता हूँ कि परमेश्वर के प्रेम को तौला जा सकता है क्योंकि उसका प्रेम एक प्रकार से अस्तित्वहीन नहीं है, और ना ही वह किसी पौराणिक कथा से आया है। उसके बजाए, यह कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर की अधीनता में सभी जीवधारियों के द्वारा आपस में बाँटा जाता है, और यह कुछ ऐसा है जिसका आनंद सभी जीवधारियों के द्वारा विभिन्न मात्राओं और विभिन्न दृष्टिकोणों के तहत लिया जाता है। यद्यपि लोग इसे देख या छू नहीं सकते हैं, फिर भी यह प्रेम सभी चीज़ों के लिए जीवन और आवश्यक सामग्रियाँ लेकर आता है जैसा कि यह थोड़ा थोड़ा करके उनकी जिन्दगियों में प्रकाशित होता रहता है, और वे परमेश्वर के उस प्रेम को गिनते हैं और उसकी गवाही देते हैं जिसका वे हर एक क्षण आनंद लेते हुए बिताते हैं। मैं कहता हूँ परमेश्वर के प्रेम को नापा तौला नहीं जा सकता है क्योंकि परमेश्वर का भेद कुछ ऐसा है जिसकी गहराई को मनुष्य नहीं नाप सकते हैं जो सभी चीज़ों के लिए प्रबन्ध करता है और उनका पालन पोषण करता है, सभी चीज़ों के लिए, और विशेषकर उस मानवजाति के लिए परमेश्वर के विचार ऐसे ही हैं। ऐसा कहना चाहिए, कोई नहीं जानता है उस लहू और आसूँओं को जिसे परमेश्वर ने मानवजाति के लिए बहाया है। मानवजाति के लिए सृष्टिकर्ता के प्रेम की गहराई और बोझ को कोई भी नहीं बूझ सकता है, और कोई समझ नहीं सकता है, जिन्हें उसने अपने हाथों से बनाया था। परमेश्वर के प्रेम को अपरिमित के रूप में वर्णन करना लोगों की सहायता करना है ताकि वे उसकी व्यापकता और उसके अस्तित्व की सत्यता की तारीफ कर सकें और उसे समझ सकें। यह इसलिए भी है जिससे लोग अधिक गहराई से "सृष्टिकर्ता" शब्द के वास्तविक अर्थ को समझ सकें, और जिससे लोग "सृष्टि" के विशेष नाम के सच्चे अर्थ की एक गहरी समझ को प्राप्त कर सकें। "अति विशाल" शब्द सामान्यतः क्या प्रदर्शित करता है? यह साधारणतः महासागरों या विश्व के लिए प्रयुक्त होता है, जैसे अतिविशाल विश्व, या अतिविशाल महासागर। विश्व की व्यापकता और शांत गहराई मनुष्य की समझ से कहीं परे है, और यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य की कल्पनाओं को ऐसा आकर्षित करता है, कि वे उसके प्रति प्रशंसा से भर जाते हैं। उसका रहस्य और गंभीरता उनकी दृष्टि में तो हैं किन्तु उनकी पहुँच से बाहर हैं। जब तुम महासागर के बारे में सोचते हो, तुम उसकी व्यापकता के बारे में सोचते हो—तो वह असीमित दिखाई देता है, और तुम उसकी रहस्यमयता और उसके समावेश को देखते हो। इसीलिए मैंने परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए "अति विशाल" शब्द का प्रयोग किया है। यह लोगों को यह महसूस करने में सहायता करता है कि वह कितना बहुमूल्य है, और वे उसके प्रेम की अत्यंत सुंदरता का एहसास कर सकें, और यह कि परमेश्वर के प्रेम की ताकत असीमित एवं अति विस्तृत है। यह उनके प्रेम की पवित्रता, और परमेश्वर की प्रतिश्ठा और उसके उल्लंघन ना किए जा सकने वाले गुण का एहसास करने में उनकी सहायता करता है जो उसके प्रेम के जरिए प्रकाशित हुआ है। अब क्या तुम लोग सोचते हो कि परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए "अति विशाल" उपयुक्त शब्द है? क्या परमेश्वर का प्रेम इन दो शब्दों "बहुत ज़्यादा" और "अति विशाल" के अनुसार खरा उतरता है? बिल्कुल! मानवीय भाषा में, केवल ये दो शब्द ही अपेक्षाकृत उपयुक्त हैं, और परमेश्वर के प्रेम को दर्शाने के लिए अपेक्षाकृत करीब हैं। क्या तुम लोग ऐसा नहीं सोचते हो? यदि तुम लोग मुझे परमेश्वर के प्रेम के बारे में विवरण देते, तो क्या तुम लोग इन दो शब्दों का प्रयोग करते? बहुत संभव है कि तुम लोग नहीं कर सकते थे, क्योंकि परमेश्वर का प्रेम तुम लोगों की की समझ एवं मूल्यांकन के एक समतल दृष्टिकोण तक सीमित है, और अभी तक त्रि-आयामी स्तर की ऊँचाई तक नहीं पहुँचा है। इसलिए यदि मैं तुम लोगों से परमेश्वर के प्रेम का वर्णन करवाऊँ, तो तुम लोग महसूस करोगे कि तुम लोगों के पास शब्दों का अभाव है; और यहाँ तक कि तुम लोग निःशब्द भी हो जाओगे। आज जिन दो शब्दों के बारे में मैंने तुम लोगों से बात की है शायद तुम लोगों के लिए समझना कठिन हो, या हो सकता है कि तुम लोग यूँ ही उससे सहमत न हों। यह बस उस सच्चाई को बता सकती है कि परमेश्वर के प्रेम के विषय में तुम लोगों का मूल्यांकन और समझ सतही और एक सँकरे दायरे के भीतर है। मैंने पहले भी कहा है कि परमेश्वर निःस्वार्थ है—तुम लोगों को निःस्वार्थ शब्द याद है। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के प्रेम को केवल निःस्वार्थ रूप में दर्शाया जा सकता है? क्या यह एक बहुत संकुचित दायरा नहीं है? इससे कुछ प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को इस मामले पर और मनन करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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