परमेश्वर के दैनिक वचन | "परमेश्वर के स्वभाव और उसका कार्य जो परिणाम हासिल करेगा, उसे कैसे जानें" | अंश 18

परमेश्वर का भय मानने का आरंभिक बिन्दु उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार करना है

अभी थोड़ी देर पहले, किसी ने एक प्रश्न उठाया था : ऐसा कैसे है कि हम परमेश्वर के बारे में अय्यूब से अधिक जानते हैं, फिर भी हम परमेश्वर का आदर नहीं कर पाते? हमने पहले ही इस मामले पर थोड़ी-बहुत चर्चा कर ली है, है न? वास्तव में इस प्रश्न के सार पर हम पहले भी चर्चा कर चुके हैं, हालाँकि तब अय्यूब परमेश्वर को नहीं जानता था, फिर भी उसने उसके साथ परमेश्वर के समान व्यवहार किया था, और उसे स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का मालिक माना था। अय्यूब ने परमेश्वर को शत्रु नहीं माना था; बल्कि, उसने सभी चीज़ों के सृष्टिकर्ता के रूप में उसकी आराधना की थी। ऐसा क्यों है कि आजकल लोग परमेश्वर का इतना अधिक विरोध करते हैं? वे परमेश्वर का आदर क्यों नहीं कर पाते? एक कारण तो यह है कि उन्हें शैतान ने बुरी तरह भ्रष्ट कर दिया है। गहरी शैतानी प्रकृति के कारण, लोग परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं। हालाँकि लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उसे स्वीकार करते हैं, तब भी वे परमेश्वर का विरोध करते हैं और उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। यह मानव प्रकृति द्वारा निर्धारित होता है। दूसरा कारण यह है कि लोग परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, पर वे उसके साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं करते। वे सोचते हैं कि परमेश्वर मनुष्य का विरोधी है, उसे मनुष्य का शत्रु मानते हैं, और सोचते हैं कि परमेश्वर के साथ उनका कोई मेल नहीं है। बस इतनी-सी बात है। क्या इस मामले को पिछले सत्र में नहीं उठाया गया था? इसके बारे में सोचो : क्या यही कारण नहीं है? तुम्हें परमेश्वर का थोड़ा-बहुत ज्ञान हो सकता है, फिर भी इस ज्ञान में क्या है? क्या हर कोई इसी के बारे में बात नहीं कर रहा है? क्या परमेश्वर ने तुम्हें इसी के बारे में नहीं बताया था? तुम केवल इसके सैद्धांतिक और मत-संबंधी पहलुओं को ही जानते हो; लेकिन क्या तुमने कभी परमेश्वर की सच्ची मुखाकृति को समझा है? क्या तुम्हारा ज्ञान आत्मनिष्ठ है? क्या तुम्हें व्यावहारिक ज्ञान और अनुभव है? यदि परमेश्वर तुम्हें न बताता, तो क्या तुम जान पाते? तुम्हारा सैद्धांतिक ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं दर्शाता। संक्षेप में, चाहे इसके बारे में तुमने कितना भी और कैसे भी जाना हो, जब तक तुम परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान प्राप्त नहीं करोगे, परमेश्वर तुम्हारा शत्रु ही बना रहेगा, और जब तक तुम परमेश्वर के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार नहीं करोगे, वह तुम्हारा विरोध करेगा, क्योंकि तुम शैतान के मूर्त रूप हो।

जब तुम मसीह के साथ होते हो, तो शायद तुम उसे दिन में तीन बार भोजन परोस सकते हो या उसे चाय पिला सकते हो और उसके जीवन की आवश्यकताओं का ध्यान रख सकते हो; ऐसा लगेगा जैसे तुमने मसीह के साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार किया है। जब कभी कुछ होता है, तो लोगों का दृष्टिकोण हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण से विपरीत होता है; लोग हमेशा परमेश्वर के दृष्टिकोण को समझने और स्वीकारने में असफल रहते हैं। जबकि हो सकता है कि लोग केवल ऊपरी तौर पर परमेश्वर के साथ हों, इसका अर्थ यह नहीं है कि वे परमेश्वर के अनुरूप हैं। जैसे ही कुछ होता है, तो मनुष्य और परमेश्वर के बीच मौजूद शत्रुता की पुष्टि करते हुए, मनुष्य की अवज्ञा की असलियत प्रकट हो जाती है। यह शत्रुता ऐसी नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य का विरोध करता है या परमेश्वर मनुष्य का शत्रु होना चाहता है, न ही ऐसा है कि परमेश्वर मनुष्य को अपने विरोध में रखकर उसके साथ ऐसा व्यवहार करता है। बल्कि, यह परमेश्वर के प्रति ऐसे विरोधात्मक सार का मामला है जो मनुष्य की आत्मनिष्ठ इच्छा में, और मनुष्य के अवचेतन मन में घात लगाता है। चूँकि मनुष्य उस सब को अपने अनुसंधान की वस्तु मानता है जो परमेश्वर से आता है, किन्तु जो कुछ परमेश्वर से आता है और जिस चीज़ में भी परमेश्वर शामिल है उसके प्रति मनुष्य की प्रतिक्रिया, सर्वोपरि, अंदाज़ा लगाने, संदेह करने और उसके बाद तुरंत ऐसी प्रवृत्ति को अपनाने वाली होती है जो परमेश्वर से टकराव रखती है, और परमेश्वर का विरोध करती है। उसके तुरंत बाद, मनुष्य एक नकारात्मक मनोदशा में परमेश्वर से विवाद या स्पर्धा करता है, वह यहाँ तक संदेह करता है कि ऐसा परमेश्वर उसके अनुसरण के योग्य है भी या नहीं। इस तथ्य के बावजूद कि मनुष्य की तर्कशक्ति उसे कहती है कि ऐसी हरकत नहीं करनी चाहिए, वह न चाहते हुए भी ऐसा ही करेगा, और वह अंत तक बेहिचक ऐसी ही हरकतें जारी रखेगा। उदाहरण के तौर पर, कुछ लोगों की पहली प्रतिक्रिया क्या होती है जब वे परमेश्वर के बारे में कोई अफवाह या अपयश की बात सुनते हैं? उनकी पहली प्रतिक्रिया यह होती है कि ये अफवाहें सही हैं या नहीं, इनका कोई अस्तित्व है या नहीं, और तब वे प्रतीक्षा करके देखने वाला रवैया अपनाते हैं। और फिर वे सोचने लगते हैं : इसे सत्यापित करने का कोई तरीका नहीं है, क्या वाकई ऐसा हुआ है? यह अफवाह सच है या नहीं? हालाँकि ऐसे लोग ऊपरी तौर पर नहीं दिखाते, मन ही मन संदेह करने लगते हैं, वे पहले ही परमेश्वर पर संदेह करना और परमेश्वर को नकारना शुरू कर चुके होते हैं। ऐसी प्रवृत्ति और दृष्टिकोण का सार क्या है? क्या यह विश्वासघात नहीं है? जब तक उनका सामना किसी समस्या से नहीं होता, तुम ऐसे लोगों का दृष्टिकोण नहीं जान पाते; ऐसा प्रतीत होता है जैसे परमेश्वर से उनका कोई टकराव नहीं है, मानो वे परमेश्वर को शत्रु नहीं मानते। हालाँकि, जैसे ही उनके सामने कोई समस्या आती है, वे तुरंत शैतान के साथ खड़े होकर परमेश्वर का विरोध करने लगते हैं। यह क्या बताता है? यह बताता है कि मनुष्य और परमेश्वर विरोधी हैं! ऐसा नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य को अपना शत्रु मानता है, बल्कि मनुष्य का सार ही अपने आप में परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है। चाहे कोई व्यक्ति कितने ही लम्बे समय से परमेश्वर का अनुसरण करता रहा हो, उसने कितनी ही कीमत चुकाई हो; वह कैसे भी परमेश्वर की स्तुति करता हो, कैसे भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने से स्वयं को रोकता हो, यहाँ तक कि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए वह अपने आपसे कितनी भी सख्ती करता हो, लेकिन वह कभी भी परमेश्वर के साथ परमेश्वर के रूप में व्यवहार नहीं कर सकता। क्या यह मनुष्य के सार से निर्धारित नहीं होता? यदि तुम उसके साथ परमेश्वर जैसा व्यवहार करते हो, सचमुच मानते हो कि वह परमेश्वर है, तो क्या तब भी तुम उस पर संदेह कर सकते हो? क्या तब भी तुम्हारा हृदय उस पर कोई प्रश्नचिह्न लगा सकता है? नहीं लगा सकता, है न? इस संसार के चलन बहुत ही दुष्टतापूर्ण हैं, यह मनुष्यजाति भी बहुत बुरी है; तो ऐसा कैसे है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणा न हो? तुम स्वयं ही बहुत दुष्ट हो, तो ऐसा कैसे हो सकता है कि उसके बारे में तुम्हारी कोई अवधारणा न हो? फिर भी थोड़ी-सी अफवाहें और कुछ निंदा, परमेश्वर के बारे में इतनी बड़ी अवधारणाएँ उत्पन्न कर सकती हैं, और तुम्हारी कल्पना इतने सारे विचारों को उत्पन्न कर सकती हैं, जो दर्शाता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना अपरिपक्व है! क्या थोड़े से मच्छरों और कुछ घिनौनी मक्खियों की बस "भिनभिनाहट" ही काफी है तुम्हें धोखा देने के लिए? यह किस प्रकार का व्यक्ति है? तुम जानते हो परमेश्वर इस प्रकार के इंसान के बारे में क्या सोचता है? परमेश्वर इन लोगों से किस प्रकार व्यवहार करता है इस बारे में उसका दृष्टिकोण वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट है। ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर ठंडा रुख अपनाता है—उसकी प्रवृत्ति उन पर कोई ध्यान न देना है, और इन अज्ञानी लोगों को गंभीरता से न लेना है। ऐसा क्यों है? क्योंकि अपने हृदय में उसने ऐसे लोगों को प्राप्त करने की योजना कभी नहीं बनाई जिन्होंने अंत तक उसके प्रति शत्रुतापूर्ण होने की शपथ खाई है, और जिन्होंने कभी भी परमेश्वर के अनुरूप होने का मार्ग खोजने की योजना नहीं बनाई है। शायद मेरी इन बातों से कुछ लोगों को ठेस पहुँचे। अच्छा, क्या तुम लोग इस बात के लिए तैयार हो कि मैं तुम्हें हमेशा इसी तरह ठेस पहुँचाता रहूँ? तुम लोग तैयार हो या न हो, लेकिन जो कुछ भी मैं कहता हूँ वह सत्य है! यदि मैं हमेशा इसी तरह से तुम लोगों को ठेस पहुँचाऊँ, तुम्हारे कलंक उजागर करूँ, तो क्या इससे तुम्हारे हृदय में बसी परमेश्वर की ऊँची छवि प्रभावित होगी? (नहीं होगी।) मैं मानता हूँ कि नहीं होगी। क्योंकि तुम्हारे हृदय में कोई ईश्वर है ही नहीं। वह ऊँचा परमेश्वर जो तुम्हारे हृदय में निवास करता है, जिसका तुम लोग दृढ़ता से समर्थन और बचाव करते हो, वह परमेश्वर है ही नहीं। बल्कि वह मनगढ़ंत इंसानी कल्पना है; उसका अस्तित्व ही नहीं है। अतः यह और भी अच्छा है कि मैं इस पहेली के उत्तर का खुलासा करूँ; क्या यह संपूर्ण सत्य को उजागर नहीं करता? वास्तविक परमेश्वर वो नहीं जिसके होने की कल्पना मनुष्य करता है। मुझे आशा है कि तुम लोग इस वास्तविकता का सामना कर सकते हो, और यह परमेश्वर के बारे में तुम लोगों के ज्ञान में सहायता करेगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" से उद्धृत

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