सत्य का अनुसरण कैसे करें (20) भाग तीन
मुझे बताओ, जो लोग चढ़ावे को बरबाद करते हैं, उन्हें कड़ी सज़ा क्यों मिलनी चाहिए? हम अब इस पर संगति करेंगे। सबसे पहले, आओ बात करते हैं कि परमेश्वर का चढ़ावा कैसे आता है। सभी भाई-बहन जानते हैं कि परमेश्वर का चढ़ावा उसके चुने हुए लोगों द्वारा परमेश्वर को दिया जाता है। बाइबल के नियमों के अनुसार, लोगों को अपनी कमाई का दसवाँ हिस्सा भेंट करना चाहिए, बेशक आजकल बहुत से लोग दसवें हिस्से से भी अधिक भेंट करते हैं, और कुछ धनी व्यक्ति तो दसवें हिस्से से कहीं अधिक भेंट देते हैं। इसके अतिरिक्त, कुछ गरीब भाई-बहन जो दसवाँ हिस्सा भेंट देते हैं, उनका पैसा कहाँ से आता है? ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो मितव्ययी रूप से जीवन यापन करके बचत करते हैं। जैसे गाँवों और ग्रामीण इलाकों में, कुछ लोग अनाज बेचकर, कुछ अंडे बेचकर तो कुछ बकरी और मुर्गियाँ बेचकर अपनी कमाई का दसवाँ हिस्सा भेंट में देते हैं। बहुत से लोग दसवाँ हिस्सा या उससे अधिक भेंट में देने के लिए मितव्ययिता से जीवन जीते हैं—चढ़ावे का पैसा यहीं से आता है। अधिकतर लोग जानते हैं कि यह पैसा कमाना कठिन है। तो भाई-बहन भेंट क्यों देते हैं? क्या ऐसा परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित है? क्या ऐसा है कि भेंट दिए बिना उद्धार असंभव है? क्या यह बाइबल के नियमों का अनुपालन करना है? या क्या यह ये सोचकर परमेश्वर के घर की उसके काम में मदद करना है कि परमेश्वर के घर का काम महत्वपूर्ण है और वित्तपोषण के बिना इसे नहीं किया जा सकता है, और इसलिए उन्हें और अधिक भेंट देनी चाहिए? क्या यही उनका एकमात्र कारण है? (नहीं।) तो फिर, भाई-बहन भेंट क्यों देते हैं? क्या इसकी वजह यह है कि वे भोले हैं? या उनके पास अतिरिक्त पैसे हैं? क्या वे अतिरिक्त पैसे भेंट में दे रहे हैं, या वह पैसे दे रहे हैं जो वे खर्च नहीं कर पाए हैं? यह भेंटें किसे दी जा रही हैं? (परमेश्वर को।) लोग भेंटें क्यों देते हैं? बाकी कारणों को भूल जाओ, बहुत से लोगों द्वारा भेंट देने का सबसे बुनियादी कारण यह है कि वे परमेश्वर के कार्य को मानते हैं। परमेश्वर लोगों को स्वतंत्र रूप से जीवन और सत्य प्रदान करने और उन्हें राह दिखाने के लिए बोलता और कार्य करता है। इसलिए, लोगों को अपनी कमाई का दसवाँ हिस्सा देना चाहिए। यह चढ़ावा होता है। संपूर्ण इतिहास में, परमेश्वर ने लोगों को भोजन, पानी और जीवन यापन के लिए आवश्यक चीजों का आशीष दिया है, और उसने उनके लिए सब कुछ बनाया है। जब लोग इस सब का आनंद लेने में सक्षम होते हैं, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा प्रदान की गई चीजों का दसवाँ हिस्सा वेदी पर अर्पित करना चाहिए, जो उस हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है जो मनुष्य परमेश्वर को लौटाता है और परमेश्वर को अपनी फसल का आनंद प्रदान करता है। यह स्नेह का प्रतीक है जिसे सृजित प्राणी के तौर पर लोगों को धारण और अर्पित करना चाहिए। इस पहलू के अलावा एक और पहलू भी है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर का कार्य बहुत महान है, मैं अकेले बहुत कुछ नहीं कर सकता, इसलिए मैं अपने हिस्से को चढ़ावे के रूप में दे दूँगा।” इस तरह, वे परमेश्वर के घर के काम के लिए अपना समर्थन प्रदर्शित करते हैं, और समर्थक के रूप में कार्य करते हैं। वित्तीय भेंटों का स्रोत या राशि चाहे जो भी हो, ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जिन्होंने मितव्ययी जीवनयापन के माध्यम से पैसे बचाए हैं। संक्षेप में, यदि परमेश्वर और उसका कार्य नहीं होता, यदि केवल कलीसिया और ये मानव संगठन और संघ होते, तो लोगों की भेंटों का कोई मूल्य या महत्व नहीं होता, क्योंकि परमेश्वर का कार्य और उसके वचनों के बिना वे किसी काम के नहीं होते, वे जो धन भेंट करते हैं, उसका कोई उपयोग नहीं होता। लेकिन परमेश्वर के बोलने और कार्य करने के कारण, मानवजाति को बचाने के लिए उसके कार्य के आगे बढ़ने के कारण, लोग जो भेंट देते हैं, और चढ़ावे चढ़ाते हैं, वे विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं। उनके विशेष रूप से महत्वपूर्ण होने का कारण यह है कि इस भेंट राशि का उपयोग कलीसिया के कार्य के लिए किया जाता है, और गलत इरादों वाले लोगों को इसका गबन, इसे छीनना, इसका दुरुपयोग या इसे बरबाद नहीं करना चाहिए। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।) चूँकि यह बहुत महत्वपूर्ण है, इसलिए पाई-पाई का उपयोग प्रमुख क्षेत्रों में किया जाना चाहिए; कुछ भी बरबाद या गैर-जिम्मेदाराना तरीके से खर्च नहीं किया जाना चाहिए। नतीजतन, जो लोग भेंट किए गए धन और चढ़ावों को बरबाद करते हैं, उनका दुरुपयोग करते हैं, उन्हें छीन लेते हैं या गबन करते हैं, हमें उनसे विशेष रूप से निपटना चाहिए और उन्हें गंभीर रूप से दंडित करना चाहिए। चूँकि यह भेंट किया गया धन और भेंटें परमेश्वर के कार्य के लिए महत्वपूर्ण हैं, और भाई-बहनों द्वारा भेंट किए गए इस धन और इन चढ़ावों को देने के पीछे के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, इस भेंट किए गए धन को सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आवंटित किया जाना चाहिए। पाई-पाई का उपयोग सिद्धांतों के साथ किया जाना चाहिए और उससे परिणाम प्राप्त होने चाहिए; इसे बरबाद नहीं किया जाना चाहिए, और निश्चित रूप से बुरे व्यक्तियों को इसे छीनने नहीं देना चाहिए। यह एक पहलू है। इसके अलावा, चाहे वित्तीय भेंटें बड़ी हों या छोटी, वे भाई-बहनों के चढ़ावे से ही आता है। इस धन का स्रोत कलीसिया द्वारा व्यावसायिक गतिविधियों में संलग्न होना, व्यवसाय खोलना या समाज से लाभ कमाने के लिए कारखाने चलाना नहीं है। यह किसी चीज का उत्पादन करके उससे अर्जित लाभांश से नहीं आता है, यह कलीसिया के लाभांश या आय से नहीं आता है, बल्कि लोगों की भेंटों से आता है। सरल शब्दों में, भेंट वह होती है जो परमेश्वर को भाई-बहन अर्पित करते हैं; परमेश्वर को अर्पित धन परमेश्वर का होना चाहिए। परमेश्वर का धन किस काम के लिए उपयोग किया जाता है? कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर का धन, चढ़ावे परमेश्वर के आनंद के लिए उपयोग किए जाते हैं।” क्या यह सब परमेश्वर के आनंद के लिए है? परमेश्वर इनमें से कितने का आनंद ले सकता है? यह काफी सीमित है, है न? उस दौरान जबकि परमेश्वर देहधारी होता है, उसका भोजन, वस्त्र, आश्रय, और जरूरतें, साथ ही उसका तीन समय का भोजन, औसत होते हैं, और वह सीमित आनंद लेता है। निःसंदेह, यह बिल्कुल सामान्य है। भाई-बहनों की भेंटों और चढ़ावों का मुख्य उपयोग कलीसिया के सामान्य कार्य संचालन को बनाए रखना है, न कि कुछ लोगों की खर्च करने की इच्छा को पूरा करना। चढ़ावा लोगों के खर्च करने के लिए नहीं होता, न ही वह लोगों द्वारा उपयोग के लिए होता है। ऐसा नहीं है कि जो कोई भी वित्त का प्रबंधन करता है, उसे इस धन का उपयोग करने के संबंध में प्राथमिकता दी जाती है, या जो भी अगुआ होता है, उसके पास धन आवंटित करने का विशेष अधिकार होता है। भले ही कोई भी व्यक्ति भेंटों का उपयोग करता हो, उसका उपयोग परमेश्वर के घर द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार किया जाना चाहिए। यही सिद्धांत है। तो, इस सिद्धांत का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति की प्रकृति क्या होती है? क्या उसने प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन नहीं किया है? (हाँ।) ऐसा क्यों कहा जाता है कि उसने प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन किया है? जो चढ़ावे लोग परमेश्वर को अर्पित करते हैं, वे परमेश्वर के आनंद के लिए होते हैं। तो परमेश्वर उनका उपयोग कैसे करता है? परमेश्वर उनका उपयोग कलीसिया के कार्य के लिए, सामान्य कार्य संचालन के लिए करता है। यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा परमेश्वर चढ़ावों का उपयोग करता है। लेकिन, मसीह-विरोधी और बुरे लोग इस तरह से चढ़ावों का उपयोग नहीं करते हैं। वे चढ़ावों का उपयोग करने के लिए इस सिद्धांत का खुले तौर पर उल्लंघन करते हुए, उसे लुटा देते हैं, बरबाद कर देते हैं या लापरवाही से दान कर देते हैं। क्या यह प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन नहीं है? क्या परमेश्वर ने तुम्हें उन्हें इस तरह से काम में लेने की अनुमति दी? क्या उसने तुम्हें उनका इस तरह से उपयोग करने का अधिकार दिया है? क्या उसने तुम्हें उनका इस तरह से उपयोग करने के लिए कहा था? उसने ऐसा नहीं कहा, है न? तो फिर तुम इस तरह से, इतनी लापरवाही से और बरबाद करने के ढंग से उनका उपयोग क्यों कर रहे हो? यह सिद्धांत का उल्लंघन है! यह कोई सामान्य सिद्धांत नहीं है; इसका संबंध प्रशासनिक आदेशों से है। चूँकि ये वित्तीय चढ़ावे व्यवसाय या वाणिज्यिक गतिविधियों द्वारा अर्जित नहीं किए जाते, बल्कि ये भाई-बहनों द्वारा परमेश्वर को अर्पित की गई भेंटें हैं, इसलिए हर खर्च को बारीकी से नियंत्रित और सख्ती से प्रबंधित करने की आवश्यकता होती है। कोई फिजूलखर्ची या बरबादी नहीं होनी चाहिए। किसी भी राशि की बरबादी या फिजूलखर्ची से न केवल परमेश्वर के घर के कार्य में उल्लेखनीय हानि होती है, बल्कि इससे परमेश्वर के घर का काफी वित्तीय नुकसान भी होता है। चढ़ावों को बरबाद करना केवल चढ़ावों को बरबाद करना नहीं है; यह भाई-बहनों द्वारा भेंट दिए जाते समय व्यक्त किए गए प्रेम के प्रति जिम्मेदार न होने को भी दर्शाता है। इसलिए, जो लोग चढ़ावा बरबाद करते हैं, उन्हें कठोर दंड दिया जाना चाहिए। कम गंभीर अपराध करने वाले लोगों को चेतावनी दो और साथ ही क्षतिपूर्ति की माँग करो। अधिक गंभीर अपराध वालों के संबंध में, क्षतिपूर्ति के अलावा, उन्हें हटाना या निष्कासित करना आवश्यक है। चढ़ावों की फिजूलखर्ची करने वालों को कठोर दंड दिए जाने का एक और मूल कारण है। कलीसिया किसी भी सामाजिक संगठन से अलग है। यह किसी भी देश और किसी भी सामाजिक परिवेश से अलग-थलग है, जिसे दुनिया और मानवता द्वारा त्याग दिया गया है। कलीसिया न केवल किसी भी देश से समर्थन या सुरक्षा प्राप्त करने में असमर्थ है, बल्कि उसे राज्य से भी कोई समर्थन या कल्याण प्राप्त नहीं हो सकता। ज्यादा-से-ज्यादा, पश्चिमी देशों में कलीसिया के पंजीकरण और स्थापना के बाद, कलीसिया को दिए जाने वाले दान पर व्यक्तिगत कर नहीं लगाया जाता, या दान की गई सामग्री का उपयोग कर में थोड़ी कटौती प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है। इसके अलावा, कलीसिया किसी भी देश से या किसी भी सामाजिक व्यवस्था के तहत कोई कल्याण या सहायता प्राप्त नहीं कर सकती है। यदि कलीसिया की मंडली छोटी हो जाती है और इसका संचालन नहीं हो पाता, तो राज्य उसकी सहायता के लिए नहीं आएगा। इसके बजाय, वह इसे अपने आप खत्म होने देगा क्योंकि कलीसिया से कोई आय नहीं होती और वह राज्य को कर नहीं दे सकती। इसलिए, कलीसिया का अस्तित्व है या नहीं, राज्य को इससे कोई मतलब नहीं होता। किसी भी सामाजिक व्यवस्था के अंतर्गत कलीसिया स्वयं को अपना अस्तित्व बनाए रखने की ऐसी ही अवस्था में पाती है। मुझे बताओ, क्या यह आसान है? (यह आसान नहीं है।) वास्तव में, यह आसान नहीं है। कलीसिया को समाज और मानवता द्वारा अस्वीकार कर दिया गया है, उसे किसी भी सामाजिक व्यवस्था से कोई मान्यता या सहानुभूति नहीं मिलती, समर्थन तो दूर की बात है। कलीसिया खुद को बनाए रखने की ऐसी परिस्थितियों के बीच अस्तित्व में रहती है। यदि अभी भी कोई चढ़ावों की फिजूलखर्ची कर रहा है, हृदयहीन हो रहा है, नाली में पैसा बहा रहा है, कोई जिम्मेदारी नहीं ले रहा है, बिना पलक झपकाए, किसी भी प्रकार की भर्त्सना महसूस किए बिना पलभर में 100,000 रुपए उड़ा रहा है, 1,000,000 रुपए ऐसे खर्च कर रहा है जैसे कि यह सिर्फ एक संख्या हो, तो क्या तुम्हें लगता है कि ऐसे व्यक्ति में मानवता है? क्या ऐसे लोग शाप पाने के योग्य नहीं हैं? (हाँ, वे हैं।) जो लोग चढ़ावों की फिजूलखर्ची करते हैं, उन्हें बरबाद करते हैं, या जो उनके प्रति बुरे इरादे रखते हैं, उनका गबन करना चाहते हैं या, उन्हें गबन करने की हिम्मत नहीं कर पाते तो उन्हें बरबाद कर देते हैं, उन लोगों के लिए ऊपर सूचीबद्ध विभिन्न परिस्थितियों का सारांश यह है : सभी को कठोर दंड दिया जाना चाहिए, उनके प्रति कोई नरमी नहीं दिखाई जानी चाहिए। मुझे बताओ, क्या यह सही रवैया है? (हाँ।) तो फिर, यदि भविष्य में तुम लोगों को चढ़ावों के उपयोग का अधिकार प्राप्त करने का अवसर मिले, तो तुम कैसा व्यवहार करोगे? यदि तुम स्वयं को नियंत्रित नहीं कर सकते, यदि तुम चढ़ावों को बरबाद कर देते हो, तो जब कलीसिया द्वारा तुम लोगों को गंभीर रूप से दंडित करने का समय आएगा, तो क्या तुम्हें कोई शिकायत होगी? (नहीं।) यह अच्छा है कि तुम्हें कोई शिकायत नहीं होगी। जो दंड मिलेगा तुम उसी के हकदार होगे!
क्या तुम लोग चढ़ावा बरबाद करने वालों से घृणा नहीं करते? क्या वे तुम्हें क्रोध नहीं दिलाते? क्या तुम उन पर निगरानी रखने या उन्हें रोकने में सक्षम हो? इससे चीजें एक पायदान ऊपर चली जाती हैं—यह तुम्हारे परीक्षण का समय है। यदि तुम्हारे आस-पास कोई ऐसा व्यक्ति है जो चढ़ावा बरबाद करता है, और एक ऐसी मशीन पर 20,000 रुपए खर्च करने पर जोर देता है जिसे 2,000 रुपए में खरीदा जा सकता है—जो सबसे अच्छी, शीर्षस्थ कोटि की, सबसे आधुनिक और सबसे आकर्षक मशीन खरीदना चाहता है, जो सबसे महंगी मशीन पर पैसा खर्च करना चाहता है, सिर्फ इसलिए कि पैसा परमेश्वर के घर का है, खुद उसकी जेब से नहीं जा रहा—तो क्या तुम उसे रोकने में सक्षम हो? यदि तुम उसे रोक नहीं भी सकते, तो क्या तुम उसे चेतावनी दे सकते हो? क्या तुम उच्च अधिकारियों को उसके बारे में बता सकते हो? यदि तुम चढ़ावों के प्रबंधन के प्रभारी हो, तो क्या तुम इस स्थिति में हस्ताक्षर करने से इनकार कर सकते हो? यदि तुम लोग इसमें से कुछ भी नहीं कर सकते, तो तुम्हें भी कठोर दंड दिया जाना चाहिए। तुम लोग भी चढ़ावा बरबाद कर रहे हो; तुम उस दुष्ट व्यक्ति के साथ मिले हुए हो, तुम उसके साथी हो, और तुम दोनों को कठोर दंड दिया जाना चाहिए। जो व्यक्ति चढ़ावों की बरबादी कर सकता है और उनके प्रति गैर-जिम्मेदार हो सकता है, उसका परमेश्वर के प्रति कैसा रवैया होगा? क्या उसके हृदय में परमेश्वर है? (नहीं।) मेरी राय में, इस तरह के लोगों का परमेश्वर के प्रति वही रवैया होता है जो शैतान का होता है। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर से, उसके नाम से, उसके चढ़ावों से या उसकी गवाही से संबंधित कोई भी चीज—इनमें से किसी का भी मुझसे कोई सरोकार नहीं है। जो लोग चढ़ावा बरबाद करते हैं, उनका मुझसे क्या लेना-देना?” ये कैसे लोग हैं? कुछ अगुआ और निरीक्षक ऐसे होते हैं जो हर चीज पर हस्ताक्षर कर देते हैं, चाहे कलीसिया कुछ भी खरीदने के लिए आवेदन क्यों न करे। वे कभी भी आवेदनों पर सवाल नहीं उठाते या उनकी बारीकी से जाँच नहीं करते, या समस्याओं के लिहाज से उनकी जाँच नहीं करते; सामान खरीदने का हर आवेदन, चाहे सामान महंगा हो या सस्ता, व्यावहारिक हो या अव्यावहारिक, आवश्यक हो या अनावश्यक—हर आवेदन उनके हस्ताक्षर से अनुमोदित हो जाता है। तुम्हारा क्या मानना है? क्या यह सिर्फ एक हस्ताक्षर है? मेरे विचार में, यह परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया है। परमेश्वर के चढ़ावों के प्रति तुम्हारा जो रवैया होता है वही रवैया उसके प्रति भी होता है। तुम्हारे द्वारा हर बार कलम चलाना, हर बार अपना नाम लिखना, परमेश्वर की निंदा और अनादर करने के तुम्हारे पाप का प्रमाण है। इस प्रकार परमेश्वर की निंदा और अनादर करने वालों को कठोर दंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? उन्हें कठोर दंड मिलना ही चाहिए! परमेश्वर तुम्हें सत्य, जीवन, और वह सब कुछ प्रदान करता है जो तुम्हारे पास है, लेकिन तुम्हारा उससे और उसकी चीजों से पेश आने का रवैया ऐसा है—आखिर चीज क्या हो तुम? रसीद पर तुम्हारा हरेक हस्ताक्षर परमेश्वर की निंदा के तुम्हारे पाप और उसके प्रति तुम्हारे अपमानजनक रवैये का प्रमाण है; यह सबसे निर्णायक प्रमाण है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन-सी सामग्री खरीदी जा रही है, कितनी राशि है, तुम अनुमोदन फॉर्म की जाँच भी नहीं करते, और बस हस्ताक्षर करने के लिए अपनी कलम चला देते हो। तुम 100,000 या 200,000 रुपए की खरीदारी पर मनमाने ढंग से हस्ताक्षर करने के लिए तैयार रहते हो। तुम्हें किसी दिन अपने हस्ताक्षर की कीमत चुकानी पड़ेगी—जो भी हस्ताक्षर करता है वही जिम्मेदार होता है! चूँकि तुम इस तरह से व्यवहार करते हो, आवेदनों की समीक्षा किए बिना यूँ ही हस्ताक्षर कर सकते हो, और मनमाने ढंग से चढ़ावा बरबाद कर सकते हो, तो जिम्मेदारी भी तुम्हें ही उठानी चाहिए और अपने कार्यों की कीमत चुकानी चाहिए। यदि तुम परिणाम भुगतने से नहीं डरते, तो आगे बढ़ो, हस्ताक्षर करो। तुम्हारा हस्ताक्षर परमेश्वर के प्रति तुम्हारा रवैया दर्शाता है। यदि तुम परमेश्वर के प्रति भी इस तरह का व्यवहार कर सकते हो, उसके साथ खुले और निर्लज्ज तरीके से ऐसा व्यवहार कर सकते हो, तो तुम क्या उम्मीद करते हो, परमेश्वर तुमसे कैसा व्यवहार करे? वह पहले ही तुम्हारे प्रति काफी धैर्यवान रहा है, उसने तुम्हें सांसें और तुम्हें अब तक जीवित रहने की अनुमति दी है। परमेश्वर के साथ उसी रवैये से, वैसा ही व्यवहार करते रहने के बजाय, तुम्हें उसके प्रति अपना अपराध स्वीकार करना और पश्चाताप करना चाहिए, तथा अपने रवैये को बदलना चाहिए। आँख मूँद कर परमेश्वर से प्रतिस्पर्धा मत करते रहो। यदि तुम परमेश्वर के साथ उसी रवैये से और वैसा ही व्यवहार करना जारी रखते हो, तो तुम जानते ही हो कि परिणाम क्या होंगे। यदि तुम परमेश्वर की क्षमा प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो तुम्हारा विश्वास व्यर्थ हो जाएगा। तब तुम्हारा विश्वास क्या काम आएगा? तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो लेकिन खुद में उसके विश्वास और उसके आदेश को लुटा देते हो। मुझे बताओ, तुम चीज क्या हो? कुछ लोग परमेश्वर के घर में अगुआओं या निरीक्षकों के रूप में कार्य करते हैं। उन्होंने कई वर्षों तक अपने कर्तव्यों का पालन किया है, और यह कहा जा सकता है कि मैंने कई वर्षों तक उनके साथ बातचीत की है। अंततः, मैं उनके बारे में इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ : ये लोग कुत्तों से भी बदतर हैं। उनकी हरकतें न सिर्फ दिल तोड़ने वाली हैं, बल्कि इससे भी ज्यादा घृणित हैं। मुझे कुत्ते पालना और उनके साथ बातचीत करना पसंद है। पिछले कुछ वर्षों में मैंने जिन कुत्तों को पाला है, वे सभी बहुत अच्छे हैं। जो कुत्ते मुझे पसंद हैं वे आम तौर पर जानबूझकर लोगों को नाराज नहीं करते। यदि तुम किसी कुत्ते पर थोड़ी-सी भी दया दिखाते हो, तो वह इसका दस गुना बदला चुकाएगा। जब तक तुम वास्तव में उसके प्रति अच्छे बने रहते हो, अगर तुम आँगन में अखबार या जूतों का एक जोड़ा भी रख दो, तो वह उनके बगल में पड़ा रहेगा और तुम्हारे लिए उनकी रक्षा करेगा। कभी-कभी, यदि तुम कोई ऐसी चीज फेंक देते हो जिसे तुम और रखना नहीं चाहते तो कुत्ता सोचेगा कि वह खो गई है और तुम्हारे लिए उसकी रक्षा करेगा, उस चीज को छोड़कर नहीं जाएगा। कुछ समय बाद, मैंने जो समझा, उसका सार निकालते हुए कहा, “लोग कुत्तों से भी बदतर हैं!” कुत्ते घरों की रक्षा करते हैं—वे अपनी क्षमताओं और कौशल का उपयोग, अपनी जान की बाजी लगाकर, तुम्हारे घर की रक्षा करने के लिए करते हैं। लोगों के पास तो दिल भी नहीं होता, जान की बाजी लगाकर चीजों की रक्षा करना तो दूर की बात है। वे कलीसिया के काम की सुरक्षा के लिए एक शब्द भी नहीं कहेंगे। वे किसी रक्षक कुत्ते से भी बदतर हैं! मैंने लोगों और कुत्तों के बीच यही अंतर पाया है। चढ़ावा बरबाद करने वाले रक्षक कुत्तों से भी बदतर हैं। क्या तुम सहमत हो कि उन्हें कठोर दंड दिया जाना चाहिए? (हाँ।) परमेश्वर लोगों पर भरोसा करता है, और उन्हें काम और कर्तव्य सौंपता है। यह परमेश्वर का उन्हें ऊँचा उठाना और उनके बारे में अच्छा सोचना है। ऐसा नहीं है कि वे वह कार्य करने लायक हैं, या वे क्षमतावान और मानवता से पूर्ण हैं, या वे उस कार्य के लिए योग्य हैं। और फिर भी, लोग उन पर किए गए उपकार को पहचानने में विफल रहते हैं, वे हमेशा सोचते हैं कि वे कलीसिया का काम करने में सक्षम हैं, कि उन्होंने इसे अपनी कड़ी मेहनत से और खुद को खपाकर अर्जित किया है। उनके पास जो कुछ भी है, वह उन्हें परमेश्वर द्वारा दिया गया है। उन्होंने क्या कमाया है? क्या यह सब उनकी उपलब्धियों के बल पर है? परमेश्वर लोगों को ऊँचा उठाता है ताकि वे अपने कर्तव्य निभा सकें, लेकिन वे खुद पर दिखाए गए उपकार को पहचानने में, या यह समझने में असफल रहते हैं कि उनके लिए क्या अच्छा है। वे उसके भरोसे और उत्कर्ष पर खरे नहीं उतरते। वे परमेश्वर के भरोसे और उसके उत्कर्ष को गँवा देते हैं। ऐसे मामलों में मुझे खेद है, लेकिन उन्हें कठोर दंड मिलना चाहिए। परमेश्वर लोगों को अवसर देता है, लेकिन लोग नहीं जानते कि उनके लिए क्या अच्छा है, वे उन अवसरों को संजोना नहीं जानते जो परमेश्वर उन्हें देता है। वह उन्हें एक मौका देता है, लेकिन उन्हें वह नहीं चाहिए। वे सोचते हैं कि परमेश्वर से काम निकलवाना आसान है, वह क्षमाशील है, वह न तो देखेगा और न ही जान सकेगा कि क्या हो रहा है। नतीजतन, वे बेईमानी से चढ़ावा बरबाद करने का साहस करते हैं, परमेश्वर के भरोसे को धोखा देते हैं, यहाँ तक कि उनमें सबसे बुनियादी मानवीय चरित्र और विवेक का भी अभाव होता है। वे अब भी किसलिए विश्वास कर रहे हैं? उन्हें विश्वास करने की जहमत नहीं उठानी चाहिए, उन्हें बस जाकर शैतान की पूजा करनी चाहिए। परमेश्वर को उनकी आराधना की आवश्यकता नहीं है। वे इस योग्य नहीं हैं!
क्या हमने करियर का त्याग कर देना—दान-पुण्य न करने के पहले विषय पर कमोबेश पर्याप्त संगति नहीं कर ली है? क्या तुम लोग इस विषय में निहित सत्य सिद्धांतों को समझ गए हो? इसमें कौन-से सिद्धांत हैं? (इसमें ये सिद्धांत हैं कि दान-पुण्य करना परमेश्वर द्वारा मनुष्यों को दिया गया लक्ष्य नहीं है। इसका सत्य के अभ्यास या उद्धार के अनुसरण से कोई संबंध नहीं है। जब कोई व्यक्ति कुछ अच्छे कार्य करता है, तो वे केवल उसके व्यक्तिगत व्यवहार का प्रतिबिंब होते हैं।) दान-पुण्य करने का संबंध सत्य के अनुसरण से नहीं है। यह गलती से भी मत मान लेना कि दान कार्य करके तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो, या एक ऐसे व्यक्ति हो जिसने उद्धार प्राप्त कर लिया है। यह एक बहुत बड़ी गलतफहमी है। सत्य के अभ्यास में दान करना शामिल नहीं है, न ही दान-पुण्य करना शामिल है। परमेश्वर में विश्वास करने का लक्ष्य उद्धार प्राप्त करना है। परमेश्वर में विश्वास करने का संबंध पुण्य संचित करने या अच्छे कार्य करने से नहीं है, इसका संबंध अच्छे कर्म या परोपकार करने से मिलने वाले आनंद से भी नहीं है, न ही इसका संबंध दान-पुण्य करने से है। परमेश्वर में विश्वास का दान-पुण्य करने से कोई संबंध नहीं है; इसका संबंध सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर के उद्धार को स्वीकार करने से है। इसलिए, लोगों के ये विचार कि परमेश्वर में विश्वास करने का संबंध दान-पुण्य करने या दान-पुण्य के कार्य में संलग्न होने से है, या उनका यह सोचना कि दान-पुण्य करना परमेश्वर में विश्वास करने और उसे संतुष्ट करने के बराबर है, सभी भयानक रूप से गलत हैं। तुम जिस भी दान-पुण्य के कार्य में शामिल होते हो, और दान-पुण्य संबंधी जो भी चीजें करते हो, वे केवल व्यक्तिगत रूप से तुम्हारा प्रतिनिधित्व करती हैं। चाहे वे कभी-कभार की जाने वाली चीजें हों या यह तुम्हारा करियर हो, ये चीजें केवल तुम्हारे अच्छे व्यवहार को दर्शाती हैं। इस व्यवहार का किसी धर्म, सामाजिक व्यवहार या नैतिक मानदंडों से संबंध हो सकता है, लेकिन इसका परमेश्वर में विश्वास करने और सत्य का अनुसरण करने, या परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करने से कोई संबंध नहीं है, और इसका उसकी अपेक्षाओं से बिल्कुल भी लेना-देना नहीं है। लेकिन फिर, किसी को दान-पुण्य क्यों नहीं करना चाहिए? परमेश्वर वह परमेश्वर है जो लोगों पर दया करता है, जिसमें दया और प्रेम है। उसे मानवता पर दया आती है, तो फिर परमेश्वर लोगों के दानार्थ किए गए कार्यों को अपनी स्मृति में क्यों नहीं संजोता? दान-पुण्य करने से परमेश्वर की स्मृति में स्थान क्यों नहीं मिलता? क्या यह समस्या नहीं है? क्या यह माँग करना कि लोग दान-पुण्य न करें, एक संकेत है कि परमेश्वर मानवता से प्रेम नहीं करता है? क्या यह मानवता के प्रति परमेश्वर की दया के विरोध में नहीं है? (नहीं।) क्यों नहीं? (क्योंकि परमेश्वर की करुणा और प्रेम के सिद्धांत हैं, और उसकी करुणा और प्रेम विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति निर्देशित है। इन्हें वह उन लोगों को प्रदान करता है जो सत्य को स्वीकार करते हैं, सत्य का अभ्यास करते हैं और वास्तव में पश्चात्ताप करते हैं। जहाँ तक उन छद्म-विश्वासियों की बात है जो सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते, वे उन लोगों में से नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर बचाना चाहता है।) परमेश्वर की करुणा और प्रेम के सिद्धांत हैं, और उसकी करुणा और प्रेम विशिष्ट व्यक्तियों के प्रति निर्देशित है। और बताओ, और क्या है? क्या दान-पुण्य करने और परमेश्वर में विश्वास करने के बीच कोई संबंध है? (नहीं।) तो, क्या दान-पुण्य करने और परमेश्वर में विश्वास करने के बीच टकराव है? किसी भी प्रकार के दान-पुण्य के कार्य में भाग लेते समय, क्या लोगों को समय, ऊर्जा और यहाँ तक कि धन भी निवेश करने की आवश्यकता नहीं होती? जब तुम दान-पुण्य करते हो, तो कार्य पर विचार किए या ध्यान दिए बिना केवल बड़ी-बड़ी बातें नहीं करते रह सकते। यदि तुम वास्तव में इसे एक पेशे के रूप में लेते हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से इसमें समय, ऊर्जा और यहाँ तक कि काफी धनराशि निवेश करने की आवश्यकता होगी। एक बार जब समय, ऊर्जा और पैसा निवेश कर देने पर क्या तुम उस दान-पुण्य के कार्य से बंध नहीं जाओगे और नियंत्रित नहीं होने लगोगे? क्या उसके बाद भी तुममें सत्य का अनुसरण करने की ऊर्जा बचेगी? क्या उसके बाद भी तुममें अपना कर्तव्य निभाने की ऊर्जा बची रहेगी? (नहीं।) जब तुम जीवन में किसी भी करियर को अपनाते हो, चाहे वह करियर कोई भी क्यों न हो, यदि तुम इसे पूर्णकालिक रूप से करते हो, तो तुम अनिवार्य रूप से अपने जीवन भर की ऊर्जा और अपने पूरे जीवन का निवेश और बलिदान करोगे। इसकी कीमत तुम्हारा घर, तुम्हारी भावनाएँ, तुम्हारा शारीरिक सुख और तुम्हारा समय होगा। इसी तरह, यदि तुम दान-पुण्य को वास्तव में एक पेशे के रूप में लेते हो और उसी हिसाब से इसे करते हो, तो तुम्हारा सारा समय और ऊर्जा इसी में खप जाएगी। एक व्यक्ति के पास सीमित मात्रा में ऊर्जा होती है। यदि तुम दान-पुण्य के कार्य से नियंत्रित होते हो, और दान-पुण्य के कार्य और परमेश्वर में अपने विश्वास, दोनों पर समान और संतुलित तरीके से विचार करना चाहते हो, और इसके अलावा, दोनों चीजों को अच्छी तरह से करना चाहते हो, तो यह कोई आसान कार्य नहीं होगा। यदि तुम एक ही समय में इन दोनों चीजों को संतुलित करना चाहते हो, लेकिन ऐसा करने में सक्षम नहीं हो, तो तुम्हें कोई एक विकल्प चुनना होगा। यदि तुम्हें यह चुनना है कि किसे रखना है और किसे त्यागना है, तो तुम यह कैसे तय करोगे? क्या तुम्हें सबसे सार्थक और मूल्यवान प्रयास को नहीं चुनना चाहिए? फिर यदि परमेश्वर में विश्वास करना और दान-पुण्य करना, दोनों एक ही समय में तुम्हारे जीवन में आते हैं, तो तुम्हें कौन-सा विकल्प चुनना चाहिए? (मुझे परमेश्वर में विश्वास करना चुनना चाहिए।) क्या अधिकतर लोग परमेश्वर में विश्वास करना नहीं चुनते हैं? यह देखते हुए कि तुम सभी ने यह चुनाव किया है, क्या यह सामान्य नहीं है कि परमेश्वर लोगों को दान-पुण्य नहीं करने देता? (हाँ।) दान-पुण्य करने से कई जीवित प्राणियों की मदद हुई है और कई लोगों को जीविका मिली है, लेकिन अंततः इससे तुम्हें क्या लाभ होगा? तुम्हारा घमंड संतुष्ट होगा। क्या इससे सचमुच कुछ हासिल हो रहा है, और क्या यह वही है जो तुम्हें हासिल होना चाहिए? तुम्हारा आदर्श साकार हो चुका होगा, तुम्हारा मोल प्रदर्शित हो चुका होगा, बस इतना ही—लेकिन क्या यही वह मार्ग है जिस पर जीवन में तुम्हें चलना चाहिए? (नहीं।) अंततः तुम्हें इससे क्या हासिल होगा? (शून्यता।) तुम्हें कुछ भी हासिल नहीं होगा। तुम्हारा घमंड अस्थायी रूप से संतुष्ट हो जाएगा, तुम्हें दूसरों से थोड़ी प्रशंसा मिलेगी, या समाज में पदक और सम्मान मिलेगा, लेकिन बस इतना ही, पर तुम्हारी सारी ऊर्जा और समय खर्च हो जाएगा। तुम्हें क्या हासिल हुआ होगा? सम्मान, प्रतिष्ठा और प्रशंसा—ये सभी खोखली चीजें हैं। हालाँकि, जिन सत्यों को लोगों को समझना चाहिए और जिन जीवन पथों को उन्हें इस जीवन में अपनाना चाहिए, उन्हें केवल दान-पुण्य करने से समझा या प्राप्त नहीं किया जा सकता। परमेश्वर पर विश्वास करना अलग बात है। यदि तुम ईमानदारी से स्वयं को परमेश्वर के लिए खपाते हो और सत्य का अनुसरण करते हो, तो तुम्हारे समय और ऊर्जा के निवेश से अच्छे और सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। यदि तुम उन चीजों को जानते और समझते हो जिन्हें लोगों को सबसे अधिक समझना चाहिए—लोगों को कैसे रहना चाहिए, उन्हें परमेश्वर की आराधना कैसे करनी चाहिए, वे विभिन्न मामलों को कैसे देखते हैं, कार्य करते समय उनका दृष्टिकोण और रुख क्या होना चाहिए, आचरण का सबसे सही तरीका क्या है और किस प्रकार से आचरण किया जाए कि सृष्टिकर्ता उसे अपनी स्मृति में संजो ले, ऐसा आचरण जिसका अर्थ हो कि व्यक्ति उचित मार्ग पर चल रहा है—तो यही उचित मार्ग है और यही वास्तव में कुछ हासिल करना है। अपने जीवन में, तुमने बहुत कुछ हासिल किया होगा जो अविश्वासी नहीं सीख सकते, ऐसी चीजें जो मानवता वाले किसी व्यक्ति के पास होनी चाहिए। ये चीजें परमेश्वर से, सत्य से आती हैं, और ये तुम्हारा जीवन बन चुकी होंगी। इससे, तुम एक ऐसे व्यक्ति में बदल जाओगे जो सत्य को अपना जीवन मानता है; तुम्हारा जीवन अब खाली नहीं रहेगा, और तुम अब भ्रमित नहीं रहोगे या डगमगाओगे नहीं। क्या ये उच्चतर और अधिक मूल्यवान लाभ नहीं हैं? क्या ये तुम्हारे घमंड को क्षण भर के लिए संतुष्ट करने वाले कुछ दानार्थ कार्य करने से अधिक मूल्यवान नहीं हैं? (हाँ।) ये लाभ जिनमें सत्य और वह रास्ता शामिल है जिस पर लोगों को चलना चाहिए, तुम्हें एक नया जीवन प्रदान करेंगे। मानव जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसकी तुलना इस नए जीवन से की जा सके, और कोई भी चीज इसकी जगह नहीं ले सकती। निस्संदेह, यह नया जीवन अमूल्य और शाश्वत है। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम अपना समय, ऊर्जा और युवावस्था समर्पित करने के बाद, एक निश्चित कीमत चुकाने और कुछ बलिदान देने के बाद प्राप्त करते हो। क्या यह इसके योग्य नहीं है? यह निश्चित रूप से इसके योग्य है। लेकिन दान-पुण्य करने पर तुम्हें क्या लाभ होगा? तुम्हें कुछ हासिल नहीं होगा। वे सम्मान और पदक कोई लाभ नहीं हैं। दूसरों की स्वीकृति और पुष्टि, अन्य लोगों का यह कहना कि तुम एक अच्छे व्यक्ति या महान परोपकारी हो—क्या इन्हें लाभ माना जा सकता है? (नहीं।) ये सभी अस्थायी चीजें हैं, और जल्द ही समय के साथ धूमिल हो जाएँगी। जब तुम इन चीजों को और पकड़े नहीं रख पाओगे, जब इन्हें और महसूस नहीं कर पाओगे, तब तुम पछतावे से भरकर कहोगे, “मैंने अपने जीवन में क्या किया है? मैंने कुछ कुत्ते-बिल्लियों की देखभाल की है, कुछ अनाथ बच्चों को गोद लिया है, कुछ गरीब लोगों की अच्छा जीवन जीने, अच्छा खाना खाने और अच्छे कपड़े पहनने में मदद की है, लेकिन खुद मेरा क्या? मैं किसके लिए जिया हूँ? क्या यह संभव है कि मैं केवल उनके लिए जिया? क्या यही मेरा लक्ष्य है? क्या स्वर्ग ने मुझे यही जिम्मेदारी सौंपी थी? क्या यही वह दायित्व है जो स्वर्ग ने मुझे दिया था? निश्चित रूप से, नहीं। फिर, व्यक्ति जीवन किसके लिए जीता है? लोग कहाँ से आते हैं और भविष्य में कहाँ जाते हैं? मैं इन सबसे बुनियादी मुद्दों को नहीं समझता।” और इसलिए, जब तुम इस स्तर पर पहुँच जाओगे, तो तुम्हें महसूस होगा कि ये सम्मान कोई लाभ नहीं हैं, और ये सिर्फ बाहरी चीजें हैं। इसका कारण यह है कि यदि तुम दान-पुण्य में शामिल नहीं होते तो भी तुम वैसे ही व्यक्ति होते, जैसा कि उस दिन दान-पुण्य करने और उन सभी प्रशंसाओं और सम्मानों को प्राप्त करने के बाद हो—दोनों ही मामले में, तुम्हारा आंतरिक जीवन नहीं बदला होगा। तुम जिन चीजों को नहीं समझते हो, वे तब भी तुम्हारे लिए अज्ञात ही होंगी, तुम अब भी हैरान होगे और उलझन में रहोगे। और उस समय, तुम न केवल अधिक उलझे हुए और भ्रमित होगे, बल्कि और भी अधिक बेचैनी महसूस करोगे। इस बिंदु पर, पछतावे के लिए बहुत देर हो चुकी होगी। तुम्हारा जीवन बीत चुका होगा, तुम्हारा सबसे अच्छा समय चला गया होगा, और तुम गलत रास्ता चुन चुके होगे। इसलिए, इससे पहले कि तुम दान-पुण्य करने का निर्णय लो, या जब तुमने दान-पुण्य का कार्य शुरू ही किया हो, तब यदि तुम सत्य का अनुसरण करना और उद्धार प्राप्त करना चाहते हो, तो तुम्हें ऐसे विचारों को त्याग देना चाहिए। निश्चित रूप से, तुम्हें इस कार्य से संबंधित सभी गतिविधियों को भी त्याग देना चाहिए और अपने आप को पूरे दिल से परमेश्वर में विश्वास और उद्धार के अनुसरण के मार्ग पर झोंक देना चाहिए। अंत में, भले ही तुमने जो प्राप्त किया या पाया, वह उतना अधिक या फिर मूर्त नहीं है जितना कि तुमने शुरू में कल्पना की थी, पर कम-से-कम, तुम्हें पछतावा तो नहीं होगा। तुम कितना भी कम क्यों न हासिल करो, फिर भी यह उन लोगों से अधिक होगा जिन्होंने अपना पूरा जीवन प्रभु में विश्वास करते हुए धर्म में बिताया है। यह एक तथ्य है। इसलिए, करियर चुनते समय, एक संदर्भ में, लोगों को दान-पुण्य करने के अपने विचारों और योजनाओं को त्यागने की आवश्यकता है। दूसरे संदर्भ में, उन्हें अपने विचारों के संबंध में अपनी धारणाओं में भी सुधार करना चाहिए। उन्हें समाज में उन लोगों से ईर्ष्या करने की कोई जरूरत नहीं है जो दान-पुण्य के कार्य में लगे हुए हैं, या यह सोचने की जरूरत नहीं है कि वे कितने परोपकारी, महान, सदाचारी और निःस्वार्थ हैं, यह नहीं कहना चाहिए, “देखो अन्य लोगों की सहायता करते समय वे कितने नेक और निःस्वार्थ कार्य करते हैं। हम निःस्वार्थ क्यों नहीं हो सकते? हम इसे हासिल क्यों नहीं कर सकते?” पहली बात, तुम्हें उनसे ईर्ष्या करने की जरूरत नहीं है। दूसरी बात, तुम्हें स्वयं को धिक्कारने की जरूरत नहीं है। यदि परमेश्वर ने उन्हें नहीं चुना है, तो उनके पास अपने ध्येय और लक्ष्य हैं। चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण कर रहे हों, चाहे वह प्रसिद्धि और लाभ हो, या स्वयं के आदर्शों और इच्छाओं को साकार करना हो, तुम्हें इसके बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है। तुम्हें चिंता इस बात की होनी चाहिए कि तुम्हें क्या अनुसरण करना चाहिए और किस प्रकार का मार्ग अपनाना चाहिए। सबसे व्यावहारिक मुद्दा यह है कि चूँकि परमेश्वर ने तुम्हें चुना है, और तुम उसके घर में आ गए हो, और कलीसिया के सदस्य हो, और इसके अलावा, तुम अपने कर्तव्यों का पालन करने वालों की श्रेणी में हो, तो तुम्हें इस बात पर विचार करना चाहिए कि अपना कर्तव्य निभाते हुए उद्धार के मार्ग पर चलना कैसे शुरू करें, सत्य का अभ्यास कैसे करें, सत्य वास्तविकता में कैसे प्रवेश करें, और उस बिंदु तक कैसे पहुँचें जहाँ परमेश्वर के वचन तुम्हारे भीतर गढ़े जाएँ और तुम्हारे लक्ष्यों और तुम्हारे द्वारा चुकाई जाने वाली विभिन्न कीमतों के माध्यम से तुम्हारा जीवन बन जाएँ। निकट भविष्य में, जब तुम अपनी उस दशा को देखोगे जिसमें तुम पहली बार परमेश्वर में विश्वास करते समय थे, तो पाओगे कि तुम्हारा आंतरिक जीवन बदल गया है। अब तुम ऐसे व्यक्ति नहीं रहोगे जिसका जीवन उसके भ्रष्ट स्वभाव पर आधारित है। अब तुम पहले जैसे एक ऐसे अहंकारी, अज्ञानी, आक्रामक और मूर्ख व्यक्ति नहीं रहोगे जो खुद को किसी से कम नहीं समझता। इसके बजाय, परमेश्वर का वचन तुम्हारा नया जीवन बन गया होगा। तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण कैसे करना है, और यह भी कि जीवन में तुम्हारे सामने आने वाली हर चीज को परमेश्वर के इरादों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे संभालना है। तुम अपना हर दिन अत्यंत स्थिरता के साथ बिताओगे, और जो कुछ भी करोगे उसमें तुम्हारे पास एक सटीक लक्ष्य और दिशा होगी। तुम्हें पता होगा कि तुम्हें क्या करना चाहिए और क्या नहीं। ये सारी बातें तुम्हारे दिमाग में शीशे की तरह साफ हो जाएँगी। तुम्हारा दैनिक जीवन भ्रामक, थकाऊ या निराशाजनक नहीं होगा। इसके बजाय, यह प्रकाश से भरा होगा, इसमें एक लक्ष्य और दिशा होगी। साथ ही, तुम अपने दिल में एक प्रेरणा महसूस करोगे। तुम महसूस करोगे कि तुम बदल गए हो, तुमने एक नया जीवन प्राप्त कर लिया है, और तुम एक ऐसे व्यक्ति बन गए हो जिसने परमेश्वर के वचनों को अपना जीवन बना लिया है। क्या यह अच्छा नहीं है? (हाँ, है।) हम दान-पुण्य न करने पर अपनी संगति यहीं समाप्त करेंगे, जो कि करियर का त्याग करने के विषय में पहला सिद्धांत है।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?