परमेश्वर के दैनिक वचन | "क्या त्रित्व का अस्तित्व है?" | अंश 297

यदि त्रित्व की इस अवधारणा के अनुसार काम के तीन चरणों का मूल्यांकन किया जाता है, तो तीन परमेश्वर होने चाहिए क्योंकि प्रत्येक के द्वारा किए गए काम एकसमान नहीं हैं। यदि तुम लोगों में से कोई भी कहता है कि त्रित्व वास्तव में मौजूद है, तो वह समझाए कि तीन व्यक्तियों में यह एक परमेश्वर क्या है। पवित्र पिता क्या है? पुत्र क्या है? पवित्र आत्मा क्या है? क्या यहोवा पवित्र पिता है? क्या यीशु पुत्र है? फिर पवित्र आत्मा का क्या? क्या पिता एक आत्मा नहीं है? पुत्र का सार भी क्या एक आत्मा नहीं है? क्या यीशु का काम पवित्र आत्मा का काम नहीं था? एक समय आत्मा द्वारा किया गया यहोवा का काम यीशु के काम के ही समान नहीं था? परमेश्वर के पास कितनी आत्माएं हो सकती हैं? तुम्हारे स्पष्टीकरण के अनुसार, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के तीन जन एक हैं; यदि ऐसा है, तो तीन आत्माएं हैं, लेकिन तीन आत्माओं का अर्थ है कि तीन परमेश्वर हैं। इसका मतलब है कि कोई भी एक सच्चा परमेश्वर नहीं है; इस प्रकार के परमेश्वर के पास अभी भी परमेश्वर का निहित पदार्थ कैसे हो सकता है? यदि तुम मानते हो कि केवल एक ही परमेश्वर है, तो उसका एक पुत्र कैसे हो सकता है और वह पिता कैसे बन सकता है? क्या यह सब केवल तुम्हारी धारणाएं नहीं हैं? केवल एक परमेश्वर है, इस परमेश्वर में केवल एक ही व्यक्ति है, और परमेश्वर का केवल एक आत्मा है, वैसा ही जैसा कि बाइबल में लिखा गया है कि "केवल एक पवित्र आत्मा और केवल एक ही परमेश्वर है"। चाहे जिस पिता और पुत्र के बारे में तुम बोलते हो वे अस्तित्व में हों, फिर भी एक ही परमेश्वर है, और पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का सार जिसे तुम मानते हो, वह पवित्र आत्मा का सार है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर एक आत्मा है, लेकिन वह देहधारण में और मनुष्यों के बीच रहने के साथ-साथ सभी चीजों से ऊँचा होने में सक्षम है। उसका आत्मा समस्त-समावेशी और सर्वव्यापी है। वह एक ही समय पर देह में हो सकता है और पूरे विश्व में हो सकता है। चूंकि सभी लोग कहते हैं कि परमेश्वर एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, फिर एक ही परमेश्वर है, जो किसी की इच्छा पर विभाजित नहीं होता! परमेश्वर केवल एक आत्मा है, और केवल एक ही व्यक्ति; और वह परमेश्वर का आत्मा है। यदि तुम कहते हो, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, तो क्या वे तीन परमेश्वर नहीं हैं? पवित्र आत्मा एक तत्व है, पुत्र दूसरा है, और पिता एक और है। वे विशिष्ट सार के अलग-अलग व्यक्ति हैं, तो वे एक इकलौते परमेश्वर का हिस्सा कैसे हो सकते हैं? पवित्र आत्मा एक आत्मा है; यह मनुष्य के लिए समझने में आसान है। यदि ऐसा है तो, पिता और भी अधिक एक आत्मा है। वह पृथ्वी पर कभी नहीं उतरा और कभी भी देह नहीं बना; वह मनुष्यों के दिल में यहोवा परमेश्वर है, और वह निश्चित रूप से एक आत्मा भी है। तो उसके और पवित्र आत्मा के बीच संबंध क्या है? क्या यह पिता और पुत्र के बीच संबंध है? या यह पवित्र आत्मा और पिता के आत्मा के बीच का रिश्ता है? क्या प्रत्येक आत्मा का सार एकसमान है? या पवित्र आत्मा पिता का एक साधन है? इसे कैसे समझाया जा सकता है? और फिर पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह दो आत्माओं का सम्बन्ध है या एक मनुष्य और आत्मा के बीच का संबंध है? ये सभी ऐसे मामले हैं जिनका कोई स्पष्टीकरण नहीं हो सकता है! यदि वे सभी एक आत्मा हैं, तो तीन व्यक्तियों की कोई बात नहीं हो सकती, क्योंकि वे एक आत्मा के हैं। यदि वे अलग-अलग व्यक्ति होते, तो उनकी आत्मा शक्ति में भिन्न होती, और बस वे एक ही आत्मा नहीं हो सकते थे। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह अवधारणा सबसे बेतुकी है! यह परमेश्वर को खंडित करता और उसे तीन व्यक्तियों में विभाजित करता है, प्रत्येक एक ओहदे और आत्मा के साथ है; तो कैसे वह अब भी एक आत्मा और एक परमेश्वर हो सकता है? मुझे बताओ, आकाश और पृथ्वी, और उसके भीतर की सारी चीज़ें क्या पिता, पुत्र या पवित्र आत्मा के द्वारा बनाई गई थीं? कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने यह सब एक साथ बनाया। फिर किसने मानवजाति को छुड़ाया? क्या यह पवित्र आत्मा था, पुत्र था या पिता? कुछ लोग कहते हैं कि वह पुत्र था जिसने मानवजाति को छुड़ाया था। फिर सार में पुत्र कौन है? क्या वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण नहीं है? एक सृजित आदमी के परिप्रेक्ष्य से देहधारी स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाता है। क्या तुम नहीं जानते हो कि यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भधारण से हुआ था? उसके भीतर पवित्र आत्मा है; तुम कुछ भी कहो, वह अभी भी स्वर्ग में परमेश्वर के साथ एकसार है, क्योंकि वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारण है। पुत्र का यह विचार असत्य है। यह एक आत्मा है जो सभी काम करता है; केवल परमेश्वर स्वयं, अर्थात, परमेश्वर का आत्मा अपना काम करता है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है जो यीशु में काम करता है? यदि काम पवित्र आत्मा (अर्थात, परमेश्वर का आत्मा) द्वारा नहीं किया गया था, तो क्या उसका काम स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था? जब प्रार्थना करते हुए यीशु ने स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया, तो यह केवल एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से किया गया था, केवल इसलिए कि परमेश्वर के आत्मा ने एक सामान्य और साधारण व्यक्ति का चोला पहना था और उसके पास एक सृजित प्राणी का बाह्य आवरण था। यद्यपि उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा था, उसका बाहरी स्वरूप अभी भी एक साधारण व्यक्ति का था; दूसरे शब्दों में, वह "मनुष्य का पुत्र" बन गया था, जिसके बारे में स्वयं यीशु समेत सभी मनुष्यों ने बात की थी। यह देखते हुए कि वह मनुष्य का पुत्र कहलाता है, वह एक व्यक्ति है (चाहे पुरुष हो या महिला, किसी भी हाल में एक इंसान के बाहरी कवच के साथ) जो सामान्य लोगों के साधारण परिवार में पैदा हुआ है। इसलिए, यीशु का स्वर्ग में परमेश्वर को पिता बुलाना, वैसा ही था जैसा कि तुम लोगों ने पहले उसे पिता कहा था; उसने सृष्टि के एक व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से ऐसा किया। क्या तुम लोगों को अभी भी प्रभु की प्रार्थना याद है जो यीशु ने तुम्हें याद करने के लिए सिखाई थी? "हे पिता हमारे, जो स्वर्ग में है...।" उसने सभी मनुष्यों से स्वर्ग में परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाने को कहा। और तब से उसने भी उसे पिता कहा, उसने ऐसा उस व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से किया था जो तुम सभी के साथ समान स्तर पर खड़ा था। चूंकि तुमने पिता के नाम से स्वर्ग में परमेश्वर को बुलाया था, इस से पता चलता है कि यीशु ने स्वयं को तुम सबके साथ समान स्तर पर देखा, और पृथ्वी पर परमेश्वर द्वारा चुने गए व्यक्ति (अर्थात परमेश्वर के पुत्र) के रूप में देखा। यदि तुम लोग परमेश्वर को "पिता" कहते हो, तो क्या यह इसलिए नहीं है कि तुम सब सृजित प्राणी हो? पृथ्वी पर यीशु का अधिकार चाहे जितना भी अधिक हो, क्रूस पर चढ़ने से पहले, वह मात्र मनुष्य का पुत्र था, वह पवित्र आत्मा (अर्थात, परमेश्वर) द्वारा नियंत्रित था, और पृथ्वी के सृजित प्राणियों में से एक था, क्योंकि उसने अभी भी अपना काम पूरा नहीं किया था। इसलिए, स्वर्ग में परमेश्वर को पिता बुलाना पूरी तरह से उसकी विनम्रता और आज्ञाकारिता थी। परमेश्वर (अर्थात, स्वर्ग में आत्मा) को उसका इस प्रकार संबोधन करना हालांकि, यह साबित नहीं करता कि वह स्वर्ग में परमेश्वर के आत्मा का पुत्र है। बल्कि, यह केवल यही है कि उसका दृष्टिकोण अलग है, न कि वह एक अलग व्यक्ति है। अलग व्यक्तियों का अस्तित्व एक मिथ्या है! क्रूस पर चढ़ने से पहले, यीशु मनुष्य का पुत्र था जो शरीर की सीमाओं से बंधा था, और उसके पास पूरी तरह से आत्मा का अधिकार नहीं था। यही कारण है कि वह केवल एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की इच्छा तलाश सकता था। यह वैसा ही है जैसा गेथसमनी में उसने तीन बार प्रार्थना की थी: "जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।" क्रूस पर रखे जाने से पहले, वह बस यहूदियों का राजा था; वह मसीह, मनुष्य का पुत्र था, और महिमा का शरीर नहीं था। यही कारण है कि, एक सृजित प्राणी के दृष्टिकोण से, उसने परमेश्वर को पिता बुलाया। अब, तुम यह नहीं कह सकते कि जो लोग परमेश्वर को पिता बुलाते हैं, वे पुत्र हैं। यदि ऐसा होता, तो क्या यीशु द्वारा प्रभु की प्रार्थना सिखाए जाने के बाद, क्या तुम सभी पुत्र नहीं बन गए होते? यदि तुम लोग अभी भी आश्वस्त नहीं हो, तो मुझे बताओ, वह कौन है जिसे तुम सब पिता कहते हो? यदि तुम लोग यीशु की बात कर रहे हो, तो तुम सबके लिए यीशु का पिता कौन है? एक बार जब यीशु चला गया, तो पिता और पुत्र का यह विचार अब और नहीं रहा। यह विचार केवल उन वर्षों के लिए उपयुक्त था जब यीशु देह बना था; अन्य सभी परिस्थितियों में, जब तुम परमेश्वर को पिता कहते हो तो यह रिश्ता वह है जो सृष्टि के परमेश्वर और सृजित प्राणी के बीच होता है। ऐसा कोई समय नहीं है जिस पर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व खड़ा रह सकता है; यह एक मिथ्या है जो युगों तक शायद ही कभी देखा गया है और अस्तित्व में नहीं है!

— 'वचन देह में प्रकट होता है' से उद्धृत

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